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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

शैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १६७

यदि शक्रादिभिर्देवैरखिलैरमरारयः । न शक्या हंतुमेकस्य शक्याः स्युस्ते कथं मम ॥७१॥ अनस्त्रज्ञोऽस्मि देवेश युद्धानामप्यकोविदः । कथं हनिष्ये सकलान्सुरशत्रूननायुधः ॥७२ इत्युक्तस्तेन देवेशः सितं कालाग्निसप्रभम् । शैवमस्त्रमयं तेजो ददौ तस्मै महात्मने ॥७३ आत्मीयं परशुं दत्त्वा सर्वशस्त्राभिभावकम् । राममाह प्रसन्नात्मा गीर्वाणानां तु शृण्वताम् ॥७४ मत्प्रसादेन सकलान्सुरशत्रून्वनिघ्नतः । शक्तिर्भवतु ते सौम्य समस्तारिदुरासदा ॥७५ अनेनैवायुधेन त्वं गच्छ युध्यस्व शत्रुभिः । स्वयमेव च वेत्सि त्वं यथावद्युद्धकौशलम् ॥७६ वसिष्ठ उवाच—एवमुक्तस्ततो रामः शंभुना तं प्रणम्य च । जग्राह परशुं शैवं विबुधारिवधोद्यतः ॥७७

यदि इन्द्र आदि समस्त देवों के द्वारा देवों के शत्रुगण दैत्य लोग मारे नहीं जाते हैं तो मुझ एक के द्वारा वे सब कैसे मारे जा सकते हैं ॥७१॥ हे देवेश ! मैं तो अस्त्रों के विषय में भी अज्ञ हूँ और युद्धों के करने में भी पण्डित नहीं हूँ । बिना ही आयुधों वाला मैं किस तरह से समस्त देवों के शत्रु असुरों का अकेला हनन करूँगा ॥७२। उस राम के द्वारा इस रीति से कहे गये देवेश्वर शम्भु ने कालाग्नि के समान प्रभा वाले सित अब अस्त्रों से परिपूर्ण शैव तेज उस महान आत्मा वाले को दे दिया था ॥७३। उन्होंने सब शस्त्रों के अभिभावक अपने परशु को प्रदान कर प्रसन्न आत्मा वाले शिव ने समस्त देवगणों के सुनते हुए उस राम से कहा था ॥७४। हे सौम्य ! मेरे प्रसाद से समस्त देवों के शत्रुओं का हनन करते हुए तुम्हारे अन्दर ऐसी ही शक्ति हो जावेगी जो सब अरिओं को दुरासद अर्थात् अतीव असह्य होगी ॥७५। इसी एक मात्र आयुध को ग्रहण कर तुम चले जाओ और सब शत्रुओं के साथ युद्ध करो । तुम अपने ही आप स्वयं यथा रीति से युद्ध करने के कौशल को जान जाओगे ॥७६। श्री वसिष्ठजी ने कहा—इस तरह से जब भगवान्

१६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शिव के द्वारा राम से कहा गया तो उसने शम्भु को प्रणाम किया था और देवों के शत्रुओं के वध करने के लिये उद्यत होते हुए उस परशु का ग्रहण कर लिया था ।७७।

ततः स शुशुभे रामो विष्णुतेजोंऽशसंभवः ।
रुद्रभक्त्या समायुक्तो द्युत्येव सवितुर्महः ॥७८
सोऽनुज्ञातस्त्रिनेत्रेण देवैः सर्वैः समन्वितः ।
जगाम हंतुमसुरान्युद्धाय कृतनिश्चयः ॥७९
ततोऽभवत्पुनर्युद्धं देवानामसुरैः सह ।
त्रैलोक्यविजयोद्युक्तैराजन्यतिभयंकरम् ॥८०
अथ रामो महाबाहुस्तस्मिन्युद्धे सुदारुणे ।
क्रुद्धः परशुना तेन निजघान महासुरान् ॥८१
प्रहारैरशनिप्रख्यैर्निघ्नन्दैत्यान्सहस्रशः ।
चचार समरे रामः क्रुद्धः काल इवापरः ॥८२
हत्वा तु सकलान्दैत्यान्देवान्सर्वानहर्षयत् ।
क्षणेन नाशयामास रामः प्रहरतां वरः ॥८३
रामेण हन्यमानास्तु समस्ता दैत्यदानवाः ।
ददृशुः सर्वतो रामं हतशेषा भयान्विताः ॥८४
हतेष्वसुरसंघेषु विद्रुतेषु च कृत्स्नशः ।
राममामंत्र्य विबुधाः प्रययुस्त्रिदिवं पुनः ॥८५
रामोऽपि हत्वा दितिजानभ्यनुज्ञाप्यचामरान् ।
स्वमाश्रमं समापेदे तपस्यासक्तमानसः ॥८६
मृगव्याधप्रतिकृतिं कृत्वा शम्भोर्महामतिः ।
भक्त्या संपूजयामास स तस्मिन्नाश्रमे वशी ॥८७
गन्धैः पुष्पैस्तथा हृद्यैर्नैवेद्यैरभिवन्दनैः ।
स्तोत्रैश्च विधिवद्भक्त्या परां प्रीतिमुपानयत् ॥८८

इसके अनन्तर भगवान् विष्णु के तेज के अंश से समुत्पन्न वह राम

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १६६

बहुत ही शोभा युक्त हो गया था जो कि रुद्र की शक्ति से समन्वित था। वह सूर्य की द्युति से दिन के ही समान देदीप्यमान हो गया था।७८। वह राम त्रिनेत्र प्रभु के द्वारा अनुज्ञा प्राप्त कर सब देवों के साथ हो युद्ध करने के लिए निश्चय करते हुए असुरों के हनन को वहाँ से चल दिया था।७६। हे राजन् ! इसके पश्चात् सम्पूर्ण त्रैलोक्य के विजय करने के लिए समुद्यत उन असुरों के साथ देवगणों का महान भयङ्कर युद्ध फिर हुआ था।८०। इसके उपरान्त महान बाहुओं वाले राम ने उस महान दारुण युद्ध में क्रुद्ध होकर उसी परशु से बड़े-बड़े असुरों का हनन किया था।८१। वज्र के सदृश प्रहारों से सहस्रों दैत्यों का संहार करते हुए राम ने परम क्रोधित होकर दूसरे काल के ही समान उस युद्ध क्षेत्र में सञ्चरण किया था।८२। प्रहार करने वालों में परम श्रेष्ठ राम ने समस्त दैत्यों का हनन करके एक ही क्षण में सुर शत्रुओं का नाश कर दिया था और देवों को परम हर्षित कर दिया था।८३। राम के द्वारा मारे जाते हुए सब दैत्यों और दानवों ने जो भी कुछ मरने से बच गये थे बहुत भय से युक्त होकर सभी ओर राम को ही देख रहे थे।८४। समस्त असुरों के समुदायों के निहत हो जाने पर और वहाँ से पूर्णतया सबके भाग जाने पर देवगणों ने राम को आमन्त्रित किया था और वे सब फिर स्वर्गलोक को चले गये थे।८५। राम भी दैत्यों का पूर्णतया निहनन करके सब देवों की अनुज्ञा प्राप्त करके तपश्चर्या में आसक्त मन वाले होते हुए अपने आश्रम में प्राप्त हो गये थे।८६। उस महामति राम ने भगवान् शम्भु की मृगों के हनन करने वाले व्याध की ही प्रतिमूर्ति बनाकर उस वशी ने उसी आश्रम में बहुत ही भक्ति के भाव से उसकी पूजा की थी।८७। पूजन पुष्प-गन्ध-सुन्दर नैवेद्य-अभिनन्दन और स्तोत्रों के द्वारा विधि पूर्वक किया गया था और परमाधिक प्रीति की प्राप्ति का थी।८८।

—X—

॥ परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ॥

वसिष्ठ उवाच ततस्तद्भक्तियोगेन स प्रीतात्मा जगत्पतिः ।
प्रत्यक्षमगमत्तस्य सर्वैः सह मरुद्गणैः ॥१
तं दृष्ट्वा देवदेवेशं त्रिनेत्रं चंद्रशेखरम् ।
वृषैवाहनं शम्भुं भूतकोटिसमन्वितम् ॥२
ससंभ्रमं समुत्थाय हर्षेणाकुललोचनः ।

१७० । [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रणाममकरोद्भक्तया शर्वाय भुवि भार्गवः ॥३ उत्थायोत्थाय देवेशं प्रणम्य शिरसासकृत् । कृतांजलिपुटो रामस्तुष्टाव च जगत्पतिम् ॥४ राम उवाच-नमस्ते देवदेवेश नमस्ते परमेश्वर । नमस्ते जगतो नाथ नमस्ते त्रिपुरान्तक ॥५ नमस्ते सकलाध्यक्ष नमस्ते भक्तवत्सल । नमस्ते सर्वभूतेश नमस्ते वृषभध्वज ॥६ नमस्ते सकलाधीश नमस्ते करुणाकर । नमस्ते सकलावास नमस्ते नीललोहि ॥७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—इसके अनन्तर उसकी भक्ति भाव से प्रसन्न आत्मा वाले जगत् के स्वामी समस्त मरुद्गणों के सहित उसके समक्ष में प्रत्यक्ष रूप में हो गये थे ।१। तीन नेत्रों के धारण करने वाले चन्द्रशेखर और वृषभेन्द्र के वाहन वाले और करोड़ों भूतगणों से समन्वित देवों के भी देवेश्वर भगवान् शम्भु का राम ने दर्शन किया था ।२। शम्भु का दर्शन प्राप्त होते ही अत्यन्त हर्ष से समाकुलित लोचनों वाले राम ने सम्भ्रम के साथ उठकर (उस भार्गव ने) भूमि में पड़कर भक्तिभाव से भगवान् शर्व के लिए प्रणाम किया था।३। बारम्बार उठ उठकर शिर के बल से अनेक बार प्रणाम करके उन जगत् के स्वामी देवेश्वर को हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की थी ।४। राम ने कहा—हे परमेश्वर ! आप तो देवों के भी देव हैं। आपकी सेवा में मेरा बार-बार प्रणिपात है। आप तो जगत् के नाथ हैं। हे त्रिपुरासुर के हनन करने वाले ! आपके लिए मेरा बारम्बार प्रणाम है ।५। हे भक्तों पर प्यार करने वाले ! आप तो इस सम्पूर्ण विश्व के अध्यक्ष हैं। आपकी सेवा में मेरा अनेक बार प्रणाम स्वीकृत होवे । हे सब भूतों के स्वामिन् ! हे वृषभध्वज ! आपके लिए मेरा प्रणाम है ।६। हे करुणानिधि ! आप तो सबके अधीश हैं। हे नील लोहित ! आप सबमें निवास करने वाले हैं। आपकी चरण-सेवा में मेरा बारम्बार प्रणिपात स्वीकार होवे ।७।

नमः सकलदेवारिगणनाशाय शूलिने । कपालिने नमस्तुभ्यं सर्वलोकैकपालिने ॥८

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १५१

श्मशानवासिने नित्यं नमः कैलासवासिने ।
नमोऽस्तु पाशिने तुभ्यं कालकूटविपाशिने ॥६॥
विभवेऽमरवंद्याय प्रभवे ते स्वयंभुवे ।
नमोऽखिलजगत्कर्मसाक्षिभूताय शंभवे ॥१०॥
नमस्त्रिपथगाफेनभासिताद्धेन्दुमौलिने ।
महाभोगींद्रहाराय शिवाय परमात्मने ॥११॥
भस्मसंछन्नदेहाय नमोऽर्काग्नीन्दुचक्षुषे ।
कपर्दिने नमस्तुभ्यमंधकासुरमर्दने ॥११
त्रिपुरध्वंसिने दक्षयज्ञविध्वंसिते नमः ।
गिरिजाकुचकाश्मीरविरंजितमहोरसे ॥१३॥
महादेवाय महते नमस्ते कृत्तिवाससे ।
योगिध्येयस्वरूपाय शिवायार्चित्यतेजसे ॥१४॥

हे शम्भो ! आप समस्त लोकों के एक ही पालन करने वाले हैं । ऐसे कपाल के धारण करने वाले और समस्त देवों के शत्रुओं के विनाश के लिए शूल के धारी आपके लिए मेरा प्रणिपात स्वीकृत होवे ।८। श्मशान भूमि में निवास करने वाले तथा कैलास पर रहने वाले आपके लिये नित्य ही मेरा प्रणाम है । पाश के धारी तथा महान् कालकूट विष के अशन करने वाले आपके लिए मेरा प्रणाम है ।६। विभव में देवों के द्वारा वन्दना करने के योग्य और प्रभव में स्वयम्भु तथा सम्पूर्ण जगत् के कर्मों के साक्षी स्वरूप शम्भु के लिए मेरा नमस्कार है ।१०। त्रिपथगा के फेनों के आभास वाले अर्धचन्द्र को मस्तक पर धारण किये हुए तथा महान् सर्पों के हार से भूषित परमात्मा भगवान् शिव के लिए मेरा प्रणाम स्वीकृत होवे ।११। श्मशान की भस्म से संछन्न देह वाले—सूर्य और चन्द्र अग्नि के धारण करने वाले चक्षुओं से समन्वित-कपर्दी और अन्धकासुर के मर्दन करने वाले आपके लिए मेरा बार-बार प्रणाम स्वीकृत होगे ।१२। त्रिपुरासुर के विध्वंस करने वाले तथा प्रजापति दक्ष के महान् यज्ञ ध्वंस करने वाले और गिरिराज की पुत्री गौरी के स्तनों पर लगी हुई केशर के आश्लेष में विशेष रञ्जित महान् उरःस्थल वाले प्रभु के लिए मेरा नमस्कार है ।१३। गज चर्म के धारी-योगि जनों के द्वारा ध्यान करने के योग्य स्वरूप वाले—न चिन्तन करने के योग्य तेज से समन्वित महान् महादेव के लिए मेरा नमस्कार है ।१४।

१७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स्वभक्तहृदयांभोजकर्णिकामध्यवर्त्तिने । सकलागमसिद्धांतसाररूपाय ते नमः ॥१५ नमो निखिलयोगेंद्रबोधनायामृतात्मने । शंकरायाखिलव्याप्तमहिम्ने परमात्मने ॥१६ नमः शर्वाय शांताय ब्रह्मणे विश्वरूपिणे । आदिमध्यांतहीनाय नित्यायाव्यक्तमूर्त्तये ॥१७ व्यक्ताव्यक्तस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्मात्मने नमः । नमो वेदांतवेद्याय विश्वविज्ञानरूपिणे ॥१८ नमः सुरासुरश्र णिमोलिपुष्पार्चितांघ्रये । श्रीकंठाय जगद्धात्रे लोककर्त्रे नमोनमः ॥१९ रजोगुणात्मने तुभ्यं विश्वसृष्टिविधायिने । हिरण्यगर्भरूपाय हराय जगदादये ॥२० नमो विश्वात्मने लोकस्थिति व्यापारकारिणे । सत्वविज्ञानरूपाय पराय प्रत्यगात्मने ॥२१

अपने भक्तजनों के हृदय कमलों की कर्णिकाओं के मध्य में विराजमान रहने वाले और समस्त आगमों के सिद्धान्त स्वरूप वाले भगवान् शङ्कर के लिए प्रणिपात है ।१५। समस्त योगेन्द्रों को बोध देने वाले—अमृतात्मा-सबसे व्याप्त महिमा वाले परमात्मा भगवान् शङ्कर के लिए नमस्कार है ।१६। परम शान्त स्वरूप-विश्व के रूप वाले ब्रह्म-आदि मध्य और अन्त से रहित-नित्य और अव्यक्त मूर्त्ति से समन्वित भगवान् शिव के लिए मेरा अभिवादन है ।१७। व्यक्त (प्रकट) और अव्यक्त (अप्रकट) स्वरूप वाले तथा स्थूल और परम सूक्ष्म रूप वाले शम्भु के लिये मेरा प्रणाम है । वेदान्त शास्त्र के द्वारा ज्ञान प्राप्त करने के योग्य और विश्व के विज्ञान रूप के धारी शिव के लिए नमस्कार है ।१८। समस्त सुरगण और असुरों के मस्तकों में संलग्न पुष्पों से मस्तकों को चरण कमलों में झुकाने पर समचित पदों वाले-जगत् के धाता और सब लोकों की रचना करने वाले भगवान् श्रीकण्ठ के लिए बारम्बार नमस्कार निवेदित है ।१९। इस सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि की रचना करने वाले रजोगुण के स्वरूप से संयुत-इस जगत् के आदि स्वरूप-

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १७३

हिरण्यगर्भ रूप भगवान् हर के लिये नमस्कार है ॥२०॥ सम्पूर्ण लोकों की स्थिति के वास्ते व्यापार करने वाले-सत्व विज्ञान के स्वरूप से समन्वित प्रत्यगात्मा—पर और विश्वात्मा के लिए मेरा प्रणाम निवेदित है ॥२१॥

तमोगुणविकाराय जगत्संहारकारिणे । कल्पान्ते रुद्ररूपाय परापरविदे नमः ॥२२

अविकाराय नित्याय नमः सदसदात्मने । बुद्धिबुद्धिप्रबोधाय बुद्धींद्रियविकारणे ॥२३

वस्वादित्यमरुद्भिश्च साध्यरुद्राश्विभेदतः । यन्मायाभिन्नमतयो देवास्तस्मै नमोनमः ॥२४

अविकारमजं नित्यं सूक्ष्मरूपमनौपमम् । तव यत्तन्न जानंति योगिनोऽपि सदाऽमलाः ॥२५

त्वामविज्ञाय दुर्ज्ञेयं सम्यग्ब्रह्मादयोऽपि हि । संसरंति भवे नूनं न तत्कर्मात्मकाश्चिरम् ॥२६

यावन्नोपैति चरणौ तवाज्ञानविघातिनः । तावद्भ्रमति संसारे पण्डितोऽचेतनोऽपि वा ॥२७

स एव दक्षः स कृती स मुनिः स च पंडितः । भवतश्चरणांभोजे येन बुद्धिः स्थिरीकृता ॥२८

तमोगुण के विकार रूप वाले-इस जगत् के संहार कर्त्ता-कल्प के अन्त में रुद्र रूप वाले और पर तथा अपर के ज्ञाता भगवान् शङ्कर के लिए नमस्कार है ॥२२॥ विकारों से रहित-नित्य-सत् और असत् रूप वाले बुद्धि की बुद्धि के प्रबोध रूप तथा बुद्धि और इन्द्रियों में विकार करने वाले शम्भु के लिए प्रणाम है ॥२३॥ वसु-आदित्य और मरुद्गणों से तथा साध्य रुद्र और अश्विनीकुमार-इनके भेदों से देवगण भी जिस की माया से भिन्न मति वाले होते हैं उन परम देव शिव के लिए नमस्कार है और पुनः नमस्कार है ॥२४॥ आपके जिस विकार से रहित-अजन्मा-नित्य और अनुपम सूक्ष्म स्वरूप को सदा अमल योगीजन भी नहीं जानते हैं ॥२५॥ ब्रह्मा आदि भी दुःख से जानने के योग्य आपको न जानकर निश्चय ही इस संसार में संसरण किया करते हैं और तत्कर्मक चिरकाल तक नहीं रहते हैं ॥२६॥ अज्ञान के विघात

१७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

करने वाले आपके जब तक चरण कमलों की प्राप्ति नहीं करता है अर्थात् आपके चरणों का समाश्रय नहीं ग्रहण करता है तब तक चाहे कोई पण्डित हो अथवा अज्ञानी हो इस संसार में भ्रमण किया करता है ।२७। इस भूमण्डल में वह ही परम दक्ष है—कृती है—मुनि है और वही महान् पण्डित है जिसने आपके चरण कमलों में अपनी बुद्धि को स्थिर करके लगा दिया है ।२८।

सुसूक्ष्मत्वेन गहनः सद्भावस्ते त्रयीमयः । विदुषामपि मूढेन स मया ज्ञायते कथम् ॥२९ अशब्दगोचरत्वेन महिम्नस्तव सांप्रतम् । स्तोतुमप्यनलं सम्यक्त्वामहं जडधीर्यतः ॥३० तस्मादज्ञानतो वापि मया भक्त्यर्थैव संस्तुतः । प्रीतश्च भव देवेश तनु त्वं भक्तवत्सलः ॥३१ वसिष्ठ उवाच-इति स्तुतस्तदा तेन भक्त्या रामेण शंकरः । मेघगंभीरया वाचा तमुवाच हसन्निव ॥३२ भगवानुवाच-रामाहं सुप्रसन्नोऽस्मि शौर्यशालितया तव । तपसा मयि भक्त्या च स्तोत्रेण च विशेषतः ॥३३ वरं वरय तस्मात्वं यद्यदिच्छसि चेतसा । तुभ्यं तत्तदशेषेण दास्याम्यहमशेषतः ॥३४ वसिष्ठ उवाच-इत्युक्तो देवदेवेन तं प्रणम्य भृगूद्वहः । कृतांजलिपुटो भूत्वा राजन्निदमुवाच ह ॥३५

आपका त्रयीमय सद्भाव परम सूक्ष्म होने से अत्यन्त गहन है और बड़े-बड़े विद्वानों के लिए भी अतीव गहन होता है वह आपका सद्भाव महामूढ़ मेरे द्वारा कैसे जाना जाता है ।२९। इस समय में आपकी महिमा शब्दों के द्वारा गोचर न होने के कारण जड़ बुद्धि वाला आपकी भली भाँति से स्तुति करने में भी असमर्थ हूँ ।३०। इससे अज्ञान से मैंने केवल भक्ति के भाव से ही आपकी संस्तुति की है। हे देवेश्वर ! आप मुझ पर प्रीतिमान् हो जाइए क्योंकि आप तो अपने भक्तों पर प्यार करने वाले हैं ।३१। श्री वसिष्ठ जी ने कहा—इस प्रकार से राम के द्वारा भक्ति की भावना से उस

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १७५

समय में स्तुति की गयी थी। तब भगवान् शङ्कर हँसते हुए मेघ के समान परम गम्भीर वाणी से उससे बोले थे। ३२। भगवान् ने कहा—हे राम ! आपकी शौर्यशालिता से मैं आप पर बहुत ही प्रसन्न हो गया हूँ। आपकी तपश्चर्या से—मेरे अन्दर अनन्य भक्ति के भाव से और विशेष रूप से आपके द्वारा किये गये स्तोत्र से मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ हूँ ।३३। इस कारण से आप किसी वरदान का वरण कर लो जो-जो भी आप अपने चित्त से चाहते हो। वही मैं आपकी पूर्ण रूप से सभी कुछ दे दूँगा ।३४। वसिष्ठ जी ने कहा—जब देवों के देवेश्वर ने उस राम से इस रीति से कहा था तो उस भृगुकुल के उद्वहन करने वाले ने उनके चरणों में प्रणाम किया था और हे राजन् ! उसने दोनों करों को जोड़कर प्रभु से यह कहा था ।३५।

यदि देव प्रसन्नस्त्वं वरार्होऽस्मि च यद्यहम् । भवतस्तदभीप्सामि हेतुमस्त्राण्यशेषतः ॥३६ अस्त्रे शस्त्रे च शास्त्रे च न मत्तोऽभ्यधिको भवेत् । लोकेषु मां रणे जेता न भवेत्त्वत्प्रसादतः ॥३७ वसिष्ठ उवाच—तथेत्युक्त्वा ततः शंभूरस्त्रशस्त्राण्यशेषतः । ददौ रामाय सुप्रीतः समंत्राणि क्रमान्नृप ॥३८ सप्रयोगं ससंहारमस्त्रग्रामं चतुर्विधम् । प्रसादाभिमुखो रामं ग्राहयामास शंकरः ॥३९ असंगवेगं शुभ्राश्वं सुध्वजं च रथोत्तमम् । इषुधी चाक्षयशरौ ददौ रामाय शंकरः ॥४० अभेद्यमजरं दिव्यं दृढज्यं विजयं धनुः । सर्वशस्त्रसहं चित्रं कवचं च महाधनम् ॥४१ अजेयत्वं च युद्धेषु शौर्यं चाप्रतिमं भुवि । स्वेच्छया धारणे शक्तिं प्राणानां च नराधिप ॥४२

हे देवेश्वर ! यदि आप मेरे ऊपर परम प्रसन्न हैं और यदि मैं आपके द्वारा वरदान देने के योग्य हूँ तो मैं आपसे उस हेतु को और सम्पूर्ण अस्त्रों को चाहता हूँ ।३६। मैं यही चाहता हूँ कि अस्त्र विद्या में—शस्त्रों के ज्ञान में और शास्त्रों की जानकारी में कोई भी मुझसे अधिक ज्ञाता न होवे मैं यह भी चाहता हूँ कि आपके प्रसाद से लोकों में युद्ध में कोई भी जीतने

१७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वाला न होवे ।३७। वसिष्ठ जी ने कहा- भगवान् शंकर ने कहा था कि जो भी तुमने चाहा है, सभी तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायगी । इसके उपरान्त उन्होंने पूर्ण अस्त्र और शस्त्र भी हे नृप ! मन्त्रों के सहित क्रम से परम प्रसन्न होते हुए राम के लिये प्रदान कर दिये थे ।३८। भगवान् शंकर ने प्रयोग करने के और संहार करने के साथ चार प्रकार के अस्त्रों के समुदाय को प्रसाद से परिपूर्ण होकर राम को ग्रहण करा दिया था ।३६। भगवान् शंकर ने असङ्ग वेग से समन्वित-शुभ्र रङ्ग वाले अश्वों से युक्त और सुन्दर ध्वजा वाले उत्तम रथ-धनुष और अक्षर शर राम के लिए दिये थे ।४०। एक ऐसा धनुष भी दिया था जो भेदन करने के अयोग्य-जीर्ण न होने वाला-परम सुदृढ़ ज्या (प्रत्यञ्चा) वाला और विजय करने वाला था । तथा सभी प्रकार के शस्त्रों के घात को सहन करने वाला-परम अद्भुत महाधन सम्पन्न एक कवच भी प्रदान किया था ।४१। हे नराधिप ! इसके अतिरिक्त भगवान् शंकर ने उस अपने परम भक्त राम के लिए युद्धों में अजेय होना-भूलोक में अनुपम शूर वीरता और अपनी ही इच्छा से प्राणों के धारण करने में शक्ति भी प्रदान की थी ।४२।

ख्यातिं च बीजमन्त्रेण तन्नाम्नां सर्वलौकिकीम् ।
तपःप्रभावं च महत्प्रददौ भार्गवाय सः ॥४३
भक्तिं चात्मनि रामाय दत्वा राजन्यथोचिताम् ।
सहितः सकलैर्भूश्चामरैश्चन्द्रशेखरः ॥४४
तेनैव वपुषा शंभुः क्षिप्रमंतरधाद्धरः ।
कृतकृत्यस्ततो रामो लब्ध्वा सर्वमभीप्सितम् ॥४५
अदृश्यतां गते शर्वे महोदरमुवाच ह ।
महोदर मदर्थे त्वमिदं सर्वमशेषतः ॥४६
रथचापादिकं तावत्परिरक्षितुमर्हसि ।
यदा कृत्यं ममैतेन तदानीं त्वं मया स्मृतः ।
रथचापादिकं सर्वं प्रहिणु त्वं मदंतिकम् ॥४७
वसिष्ठ उवाच-तथेत्युक्त्वा गते तस्मिन्भृगुवर्यो महोदरे ।
कृतकृत्यो गुरुजनं द्रष्टुं गंतुमियेष सः ॥४८

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १७७

गच्छन्नथ तदासौ तु हिमाद्रिवनगह्वरे । विवेश कंदरं रामो भाविकर्मप्रचोदितः ॥४६॥

उन प्रभु शिव ने भार्गव के लिए उसके नाम बीजमन्त्र के द्वारा सम्पूर्ण लोक में होने वाली ख्याति और महान् तप का प्रभाव दिया था ।४३। समस्त भूतगण और देवगण के सहित भगवान् चन्द्रशेखर ने हे राजन् ! अपने में यथोचित होने वाली भक्ति भी राम को प्रदान की थी ।४४। फिर उसी शरीर के द्वारा ही भगवान् शिव शीघ्र ही अन्तर्हित हो गये थे । फिर वह राम भी अपना सम्पूर्ण अभीप्सित प्राप्त करके कृतकृत्य हो गया था ।४५। भगवान् शंकर के अदृश्य हो जाने पर राम ने महोदर से कहा था । हे महोदर ! इन वस्तुओं को पूर्ण रूप से आप मेरे लिये अपने अधिकार में रखिए ।४६। आप ही इन रथ और चाप आदि की परीक्षा करने के लिए परम योग्य होते हैं । जिस समय में इन समस्त सामग्रियों से मुझे कार्य होगा उसी समय में मेरे द्वारा आप का स्मरण किया जायगा । तब रथ और चाप आदि सब सामान आप मेरे समीप में भेज दीजिएगा ।४७। वसिष्ठ जी ने कहा—महोदर ने कहा था कि मैं इसी प्रकार से सब कार्य करूँगा—यह कहकर उस महोदर के वहाँ से चले जाने पर भृगुवर राम कृत कृत्य हो गया था और फिर उसने अपने गुरुजन के दर्शन प्राप्त करने की इच्छा की थी । ।४८। उस समय में गमन करते हुए आगे आने वाले कर्मों के करने के लिए प्रेरित होकर परम गहन हिमवान् के वन में एक कन्दरा थी उस में राम ने प्रवेश किया था ।४६।

स तत्र ददृशे बालं धृतप्राणमनुद्रुतम् । व्याघ्रेण विप्रतनयं रुदंतं भीतभीतवत् ॥५०॥ दृष्ट्वानुकंपहृदयस्तत्परित्राणकातरः । तिष्ठतिष्ठेति तं व्याघ्रं वदन्नुच्चैरथान्वयात् ॥५१॥ तमनुद्रुत्य वेगेन चिरादिव भृगूद्वहः । आससाद वने घोरं शार्दूलमतिभीषणम् ॥५२॥ व्याघ्रेणानुद्रुतः सोऽपि पलायन्वनगह्वरे । निपपात द्विजसुतस्त्रस्तः प्राणभयातुरः ॥५३॥ रामोऽपि क्रोधरक्ताक्षो विप्रपुत्रपरीप्सया ।

१७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तृणमलं समादाय कुशास्त्रेणाभ्यमंत्रयत् ॥५४ तावत्तरक्षुलवानाद्रवत्पतितं द्विजम् । दृष्ट्वा ननाद रुभृशं रोदसी कम्पयन्निव ॥५५ दग्ध्वा त्वस्त्राग्निना व्याघ्रं प्रहरन्तं नखांकुरैः । अकृतव्रणमेवाशु मोक्षयामास तं द्विजम् ॥५६

वहाँ पर उस राम ने एक ब्राह्मण के पुत्र को देखा था जो बालक अवस्था का था और एक व्याघ्र उसके पीछे आते हुए खदेड़ रहा था जिसके कारण वह प्राण तो धारण किये हुए था किन्तु अत्यन्त डरे हुए की भाँति रुदन कर रहा था ।५। अपने हृदय में दया का भाव रखने वाला राम उसके परित्राण करने के लिए बहुत ही कातर हो गया था । उसने उस बालक के पीछे दौड़कर आते हुए व्याघ्र से बहुत ऊँची आवाज में 'ठहर जा-ठहर जा'—यह कहते हुए वह उस व्याघ्र के पीछे चल दिया था ।५१। बड़े ही वेग से उसके पीछे प्रभावित होकर उस भृगुकुल के उद्वहन करने वाले राम ने जैसे कुछ विलम्ब हो गया हो उस वन में अत्यन्त भयानक और घोर उस शार्दूल के पास अपनी पहुँच कर ली थी ।५२। उस परम गहन-गम्भीर वन में जिसके पीछे व्याघ्र दौड़ा चला आ रहा था वह ब्राह्मण का पुत्र अपने प्राणों की हानि के भय से बहुत ही आतुर होता हुआ अत्यधिक डरा हुआ था और दौड़ते हुए वह वहाँ पर भूमि में गिर गया था ।५३। राम भी ब्राह्मण के पुत्र की रक्षा की इच्छा से क्रोध से लाल नेत्रों वाला हो गया था और फिर उसने तृण मूल को ग्रहण कर कुशास्त्र से अभिमन्त्रित किया था ।५४। उसी समय के बीच में उस बलवान् व्याघ्र ने उस गिरे हुए द्विज पुत्र पर आक्रमण कर दिया था । उस दृश्य को देखकर राम ने अत्यन्त अधिक ध्वनि भूमि और आकाश को कँपाते हुए की थी अर्थात् घोरगर्जना की थी जिससे मानो भूमि और अन्तरिक्ष भी कम्पित हो गये थे ।५५। अपने नखों के अंकुरों द्वारा प्रहार करते हुए व्याघ्र को अस्त्राग्नि से भस्मीभूत करके उस विप्र सुत को छुड़ा दिया था जिसके शरीर में शीघ्रता से कोई बाघ के नखों से व्रण नहीं हो पाये थे ।५६।

सोऽपि ब्रह्माग्निनिर्दग्धदेहः पाप्मा नभस्तले । गान्धर्वं वपुरास्थाय राममाहेति सादरम् ॥५७ विप्रशापेन भो पूर्वमहं प्राप्तस्तरक्षुताम् ।

परशुराम द्वारा द्विज-सुत_रक्षण ] [ १७६

गच्छामि मोचितः शापात्त्वयाऽहमधुना दिवम् ॥५८ इत्युक्त्वा तु गते तस्मिन्नामो वेगेन विस्मितः । पतितं द्विजपुत्रं तं कृपया व्यपपद्यत ॥५६ माभैरेवं वदन्वाणीमारादेव द्विजात्मजम् । परामृशत्तदंगानि शनैरुज्जीवयन्नृप ॥६० रामेणोत्थापितश्चैवं स तदोन्मील्य लोचने । विलोकयन्ददर्शग्रे भृगुश्रेष्ठमवस्थितम् ॥६१ भस्मीकृतं च शार्दूलं दृष्ट्वा विस्मयमागतः । गतभीराह कस्त्वं भोः कथं वेह समागतः ॥६२ केन चायं निहंतुं मामुद्यतो भस्मसात्कृतः । तरक्षुर्भीषणाकारः साक्षान्मृत्यु रिवापरः ॥६३

वह व्याघ्र भी महा पापी ब्रह्माग्नि से दग्ध शरीर वाला आकाश में एक गन्धर्व का शरीर धारण करके बड़े ही आदर के साथ राम से बोला था ।५७। हे राम ! एक विप्र के शाप से पूर्व में इस तरक्षु के स्वरूप को प्राप्त करने वाला हुआ था । इस समय में आपके द्वारा उस शाप से छुड़ाया गया मैं अब स्वर्गलोक में गमन कर रहा हूँ ।५८। इतना ही कहकर बड़े वेग से उसके चले जाने पर राम को बड़ा विस्मय हुआ था और फिर दया के वशी-भूत होकर वह उस भूमि पर पड़े हुए द्विज पुत्र के पास पहुँचा था ।५६। हे नृप ! समीप में ही उस द्विज के पुत्र से 'डरो मत'—यह वाणी बोलते हुए धीरे-धीरे उसको उज्जीवित करते हुए उस बालक के अङ्गों को सहलाया ।६०। इस प्रकार से राम के द्वारा उठाये हुए उसने उस समय में अपने नेत्रों को खोला था । इधर-उधर अवलोकन करते हुए उसने अपने सामने अव-स्थित भृगुकुल में परम श्रेष्ठ राम को देखा था ।६१। और अपने समीप में ही भस्मीभूत शार्दूल को देखकर उस बालक को बड़ा भारी विस्मय हुआ था । जब उसका भय बिल्कुल समाप्त हो गया था तो उसने राम से कहा था—आप कौन हैं अथवा यहाँ पर आप कैसे समागत हुए हैं ? ।६२। और मुझको मारने के लिए उद्यत यह शार्दूल किसके द्वारा निर्दग्ध करके भस्मी-भूत कर दिया गया है ? यह तरक्षु तो महा भीषण आकार वाला साक्षात् दूसरे काल के ही सदृश था ।६३।

१८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भयसंमूढमनसो ममाद्यापि महामते ।
हतेऽपि तस्मिन्नखिला भान्ति वै तन्मया दिशः ॥६४
त्वामेव मन्ये सकलं पिता माता सुहृद्गुरुः ।
परमापदमापन्नं त्वं मां समुपजीवयन् ॥६५
आसीन्मुनिवरः कश्चिच्छांतो नाम महातपाः ।
पुत्रस्तस्यास्नितीर्थार्थी शालग्राममयासिषम् ॥६६
तस्मात्सं प्रस्थितश्शैलं दिदृक्षुर्गंधमादनम् ।
नानामुनिगणैर्जुष्टं पुण्यं बदरिकाश्रमम् ॥६७
गंतुकामोऽपहायाहं पंथानं तु हिमाचले ।
प्रविशन्गहनं रम्यं प्रदेशालोककाकुलम् ॥६८
दिशं प्राचीं समुद्दिश्य क्रोशमात्रमयासिषम् ।
ततो दिष्टवशेनार्हं प्राद्रवं भयपीडितः ॥६९
पतितश्च त्वया भूयो भूमेरुत्थापितोऽधुना ।
पित्रैव नितरां पुत्रः प्रेम्णात्यर्थं दयालुना ।
इत्येष मम वृत्तांतः साकल्येनोदितस्तव ॥७०

हे महती मति वाले ! अधिक भय के कारण संमूढ मन वाले मुझे अभी भी उसके मृत हो जाने पर भी समस्त दिशाएँ उसी से परिपूर्ण प्रतीत हो रही हैं अर्थात् सभी ओर मुझे वह ही दिखलाई दे रहा है ।६४। मुझे तो इस समय में ऐसा भान हो रहा है और मैं आपको ही अपना माता-पिता-सुहृद् और गुरु सब कुछ मानता हूँ क्योंकि मैं तो परमाधिक आपदा में फँस चुका था और आपने ही मुझको भली-भांति जीवन दान दिया है ।६५। कोई एक महान तपस्वी शान्त नामधारी श्रेष्ठ मुनि थे । मैं उनका ही पुत्र हूँ। मैं तीर्थाटन के प्रयोजन वाला शालग्राम के लिए गया था ।६६। वहाँ से मैंने फिर प्रस्थान किया था और मैं गन्धामादन पर्वत के देखने की इच्छा वाला हो गया था । अनेक महामुनियों के समुदायों के द्वारा सेवित परम पुनीत बदरिकाश्रम को गमन करने की कामना वाला मैं हो गया था । फिर हिमवान् जैसे महा विशाल पर्वत में समुचित मार्ग को छोड़कर परम रम्य और प्रदेश के आलोकन में आकुल गहन वन में प्रवेश कर रहा था ।६७-६८। पूर्व

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १८१

दिशा कर उद्देश्य करके एक कोश भर हो गया था। वहाँ पर भाग्य के वशीभूत होकर मैं भय से उत्पीड़ित होकर भाग दिया था ।६६। मैं फिर भूमि पर गिर गया था। आपने कृपा करके इस समय मैं फिर मुझे भूमि से उठाया था। दयालु आपने पिता की ही भाँति मेरे पर कृपा की थी जैसे पिता अपने पुत्र पर अत्यधिक प्रेम किया करता है। मेरा यही इतना वृत्तान्त है जो कि मेरे द्वारा पूर्ण रूप से आपके समक्ष में कह दिया गया है ।७०।

वसिष्ठ उवाच—इति पृष्टस्तदा तेन स्ववृत्तांतमशेषतः ।
कथयामास राजेंद्र रामस्तस्मै यथाक्रमम् ॥७१
ततस्तौ प्रीतिसंयुक्तौ कथयंतौ परस्परम् ।
स्थित्वा नाति चिरं कालमथ गंतुमियेष सः ॥७२
अन्वीयमानस्तेनाथ रामस्तस्माद्गुहामुखात् ।
निष्क्रम्यावसथं पित्रोः स प्रतस्थे मुदान्वितः ॥७३
अकृतव्रण एवासौ व्याघ्रेण भुवि पातितः ।
रामेण रक्षितश्चाभूद्यस्माद्व्याघ्रं विनिघ्नता ॥७४
तस्मात्तदेव नामास्य बभूव प्रथितं भुवि ।
विप्रपुत्रस्य राजेंद्र तदेतत्सोऽकृतव्रणः ॥७५
तदा प्रभृति रामस्य छायेवातपगा भुवि ।
बभूव मित्रमत्यर्थं सर्वावस्थासु पार्थिव ॥७६
स तेनानुगतो राजन्भृगोरासाद्य सन्निधिम् ।
दृष्ट्वा ख्यातिं च सोऽभ्येत्य विनयेनाभ्यवादयत् ॥७७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—हे राजेन्द्र ! उस समय में इस प्रकार से उस विप्रसुत के द्वारा पूछे गये रामने कहकर सुना दिया था ।७१। इसके अनन्तर वे दोनों परस्पर में प्रीति से समन्वित होकर वार्त्तालाप करते रहे थे। अत्यधिक कालतक वहाँ न ठहरकर उसने गमन करने की इच्छा की थी ।७२। राम भी उसके पश्चात् उसी के पीछे गमन करने वाला हो गया था और उस गुफा के मुख से निकलकर बड़े आनन्द के साथ अपने माता-पिता के निवास स्थान की ओर उसने भी प्रस्थान कर दिया था ।७३। व्याघ्र के द्वारा भूमि में गिरा भी दिया गया था तो भी उसके देह में कोई भी कहीं

१८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पर व्रण नहीं हुआ था । उस विनिहनन करने वाले व्याघ्र से वह राम के द्वारा सुरक्षित हुआ था ।७४। हे राजेन्द्र ! इसी कारण से इसका नाम भूमण्डल में प्रथित हो गया था फिर उस विप्र के पुत्र का अकृत व्रण ही नाम पड़ गया था ।७५। हे पार्थिव ! तभी से लेकर आतप के पीछे गमन करने वाली छाया के ही समान वह भूमि में सभी प्रकार की अवस्थाओं में उसका अत्यधिक प्रिय मित्र हो गया था ।७६। हे राजन् भृगु की सन्निधि को प्राप्त करके वह उसी के साथ अनुगत हो गया था और ख्याति को देखकर वह सामने उपस्थित हुआ था तथा विनय के साथ उसने अभिवादन किया था ।७७।

स ताभ्यां प्रियमाणाभ्यामाशीर्भिरभिनंदितः । दिनानि कतिचित्तत्र न्यवसत्तत्प्रियेप्सया ॥७८ ततस्तयोरनुमते च्यवनस्य महामुनेः । आश्रमं प्रतिचक्राम शिष्यसंघैः समावृतम् ॥७९ नियंत्रितांतः करणं तं च संशांतमानसम् । सुकन्या चापि तद्भार्यामवंदत महामनाः ॥८० ताभ्यां च प्रीतियुक्ताभ्यां रामः समभिनंदितः । और्वाश्रमं समापेदे द्रष्टुकामस्तपोनिधिम् ॥८१ तं चाभिवाद्य मेधावी तेन च प्रतिनंदितः । उवास तत्र तत्प्रीत्या दिनानि कतिचिन्नृप ॥८२ विसृष्टस्तेन शनकैऋँ चीकभवनं मुदा । प्रतस्थे भार्गवः श्रीमानकृतव्रणसंयुतः ॥८३ अवंवत पितुः पित्रोर्नत्वा पादौ पृथक् पृथक् । तौ च तं नृपसंहर्षाच्चाशिषा प्रत्यनन्दताम् ॥८४

परमप्रीति से समन्वित उन दोनों के द्वारा वह आशीर्वचनों से अभिनन्दित किया गया था । उसके प्रिय करने की अभिलाषा से उसने वहाँ पर कुछ दिन तक निवास किया था ।७८। इसके उपरान्त उन दोनों की अनुमति से शिष्यों के समुदायों से समावृत महामुनि च्यवन के आश्रम की ओर वह चला गया था ।७९। उस महान मन वाले ने अपने अन्तः-करण को नियन्त्रण में रहने वाले और परम शान्त मन वाले उस महा मुनि की तथा सुकन्या

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १८३

नाम धारिणी जो उनकी भार्या थी उसकी वन्दना की थी ।८०। परम प्रीति से सुसम्पन्न उन दोनों के द्वारा राम का भली-भाँति अभिनन्दन किया गया था। तप की निधि का दर्शन करने की कामना वाले उसने और्व के आश्रम को प्राप्त किया था ।८१। हे नृप ! मेधावी राम ने उनका अभिवादन किया था और और्व महामुनि के द्वारा राम का अभिनन्दन किया गया था। वहाँ पर उनकी प्रीति होने से वह कतिपय दिनों तक रहा था ।८२। फिर धीरे से आनन्द के साथ उस मुनि के द्वारा राम की विदाई की गयी थी और अकृतव्रण के ही सहित श्रीमान् भार्गव ने वहाँ से प्रस्थान किया था ।८३। पिता के पिता-माता के चरणों में पृथक्-पृथक् वन्दना की थी। हे नृप ! उन दोनों ने उसका बड़े ही हर्ष से अभिनन्दन किया था ।८४।

पृष्टश्च ताभ्यामखिलं निजवृत्तमुदारधीः । कथयामास राजेंद्र यथावृत्तमनुक्रमात् ॥८५ स्थित्वा दिनानि कतिचित्तत्रापि तदनुज्ञया । जगामावसथं पित्रोर्मुदा परमया युतः ॥८६ अभ्येत्य पितरौ राजन्नासीनावाश्रमोत्तमे । अवंदत तयोः पादौ यथावद्भृगुनन्दनः ॥८७ पादप्रणामावनतं समुत्थाय च सादरम् । आश्लिष्य नेत्रसलिलेनैतदंतो पर्यषिंचताम् ॥८८ आशीर्भिरभिनन्द्यांके समारोप्य मुहुर्मुखम् । वीक्षंतौ तस्य चांगानि परिस्पृश्यापतुर्मुदम् ॥८९ अपृच्छतां च तौ रामं कालेनैतावता त्वया । किं कृतं पुत्र को वायं कुत्र वा त्वमुपस्थितः ॥९० कथं सह सकाशे त्वमास्थितो वात्र वागतः । त्वयैतदखिलं वत्स कथ्यतां तथ्यमावयोः ॥९१

फिर उन दोनों के द्वारा उदार बुद्धि वाले उससे अपना वृत्तान्त पूर्ण रूप से पूछा गया था। हे राजेन्द्र ! जो कुछ भी जिस तरह से हुआ था वह अनुक्रम के साथ राम ने कहा था ।८५। वहाँ पर भी कुछ दिन तक स्थित रहकर फिर उनकी अनुज्ञा से परम आनन्द से संयुक्त होकर माता-पिता के

१८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

निवास स्थान को वह चला गया था ।८६। हे राजन् ! उस परमोत्तम आश्रम में माता-पिता विराजमान थे । उनके सामने उपस्थित होकर भृगुनन्दन ने उन दोनों के चरणों में यथोचित रीति से वन्दना की थी ।८७। उन्होंने अपने चरणों में मस्तक झुकाने वाले राम को आदर के साथ उठाकर आश्लेषण किया था और परमानन्दित होते हुए अपने वात्सल्य के कारण आये हुए प्रेमाश्रुओं से उसका परिषिञ्चन किया था ।८८। आशीर्वादों के द्वारा अभि-नन्दन करके उन्होंने अपनी गोद में बिठा लिया था और बारम्बार उस अपने पुत्र के मुख का अवलोकन करते हुए उसके अङ्गों का परिस्पर्श करके परमाधिक आनन्द को प्राप्त हुए थे ।८९। उन दोनों ने राम से पूछा था हे पुत्र ! इतने लम्बे समय तक आपने क्या किया था और यह दूसरा कौन तुम्हारे साथ में है तथा तुम कहाँ इतने समय पर्यन्त रहे थे ? ।६०। किस प्रकार से तुम सकाश में साथ समास्थित हुए थे अथवा यहाँ पर कहाँ से इस समय में समागत हुए थे ? हे वत्स ! आपको हम दोनों के सामने जो भी सत्य-सत्य हो वह सब बतला देना चाहिए ।६१।

—×—

कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन

वशिष्ठ उवाच–इति पृष्टस्तदा ताभ्यां रामो राजन्कृतांजलिः।
तयोरकथयत्सर्वमात्मना यदनुष्ठितम् ॥१
निदेशाद्वै कुलगुरोस्तपश्चरणमात्मनः ।
शंभोर्निदेशात्तीर्थानामटनं च यथाक्रमम् ॥२
तदाज्ञयैव दैत्यानां वधं चामरकारणात् ।
हरप्रसादादत्रापि ह्यकृतव्रणदर्शनम् ॥३
एतत्सर्वमशेषेण यदन्यच्चात्मना कृतम् ।
कथयामास तद्रामः पित्रोः संप्रीयमाणयोः ॥४
तौ च तेनोदितं सर्वं श्रुत्वा तत्कर्मविस्तरम् ।
हृष्टौ हर्षांतरं भूयो राजन्नाप्नुवतावुभौ ॥५
एवं पित्रोर्महाराज शुश्रूषां भृगुपुंगवः ।
प्रकुर्वंस्तद्विधेयात्मा भ्रातृणां चाविशेषतः ॥६

कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १८५

एतस्मिन्नेव काले तु कदाचिद्धैहयेश्वरः । इयेष मृगयां गंतुं चतुरंगबलान्वितः ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा—हे राजन् ! जब उस समय में इस प्रकार से राम से पूछा गया था तो उसने अपने दोनों करों को जोड़कर उन दोनों के समक्ष में वह सम्पूर्ण अपना घटित घटनाओं का इतिवृत्त कह दिया था जो भी कुछ अपने द्वारा अब तक किया था ।१। अपने कुलदेव की आज्ञा से अपनी तपश्चर्या का समाचरण तथा भगवान शम्भु के निर्देश से यथाक्रम तीर्थों का पर्यटन जो किया था—वह सभी कुछ निवेदित कर दिया था ।२। फिर शंकर की ही आज्ञा से देवों की सुरक्षा करने के कारण से जो दैत्यों का वध किया था वह भी सुना दिया था । यहाँ पर भी भगवान हर के प्रसाद से ही अकृत व्रण का दर्शन हुआ था ।३। यह सम्पूर्ण पूर्णतया जो हुआ था वह और जो अपने द्वारा कुछ भी किया गया था वह सब परम प्रसन्न माता-पिता के सामने राम ने कहकर सुना दिया था ।४। उन दोनों ने राम के द्वारा कहा हुआ सब उसके कर्मों का विस्तार श्रवण किया था और परम प्रसन्न हुए थे । हे राजन् ! फिर वे दोनों एक दूसरे हर्ष को भी प्राप्त हुए थे ।५। हे महाराज ! इस रीति से उस भृगुकुल में परम श्रेष्ठ राम ने अपने माता-पिता की शुश्रूषा करते हुए पूर्णतया उनके प्रति अपने कर्त्तव्य का सविनय पालन किया था और अपने भाइयों की भी सेवा उसी भाव से उसने की थी ।६। इसी समय में किसी वक्त हैहयेश्वर चतुरङ्गिणी सेना के सहित मृगया करने को गमन करने वाला हुआ था ।७।

संरज्यमाने गगने बंधूककुसुमारुणैः । ताराजालद्युतिहरैः समंतादरुणांशुभिः ॥८ मंदं वीजति प्रोद्भूतकेतकीवनराजिभिः । प्राभातिके गंधवहे कुमुदाकरसंस्पृशि ॥९ वयांसि नर्मदातीरतरुनीडाश्रयेषु च । व्याहरन्स्वाकुला वाचो मनः श्रोत्रसुखावहाः ॥१० नर्मदातीरतीर्थं तदवतीर्याघहारिणि । तत्तोये मुनिवृंदेषु गृणत्सु ब्रह्म शाश्वतम् ॥११

१८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विधिवत्कृतमैत्रेषु सन्निवृत्य सरित्तटात् । आश्रमं प्रति गच्छत्सु मुनिमुख्येषु कर्मिषु ॥१२ प्रत्येकं वीरपत्नीषु व्यग्रासु गृहकर्मसु । होमार्थं मुनिकल्पाभिर्दुह्यमानासु धेनुषु ॥१३ स्थाने मुनिकुमारेषु तं दोहं हि नयत्सु च । अग्निहोत्राकुले जाते सर्वभूतसुखावहे ॥१४

अब उस वेला की अद्भुत छटा का वर्णन किया जाता है—उस समय में चारों ओर अरुण अंशुओं वाली और तारागण की द्युति का हरण करने वाली बन्धूक पुष्पों की अरुणता से आकाश मण्डल संरज्यमान हो रहा था ।८। विकसित केतकी के वनों की पंक्तियों के द्वारा मद को समुद्भूत करते हुए तथा कुमुदों से युक्त सरोवरों का स्पर्श करने वाला प्रातः काल का सुन्दर एवं सुख स्पर्श वायु वहन कर रहा था ।६। पक्षीगण उस समय में नर्मदा के तट पर उगे हुए तरुवरों के नीड़ों के आश्रमों में अपनी समाकुल और मन तथा कानों को परम सुख प्रदान करने वाली वाणियां बोल रहे थे ।१०। नर्मदा का तट तीर्थ है उस तीर्थ में उतर कर पापों के हरण करने वाले उस जल में मुनिवृन्द निरन्तर ब्रह्म अर्थात् वेद वचनों का गान कर रहे थे ।११। विधि-विधान के साथ नित्यानुष्ठान करके नर्मदा नदी के तीर से वापिस लौट कर कर्मों के करने वाले प्रमुख मुनिगण अपने-अपने आश्रमों की ओर गमन कर रहे थे ।१२। प्रत्येक वीरों की पत्नियां अपने-अपने गृहों के आवश्यक कर्मों में उस समय में संलग्न हो रही थीं । सर्वथा मुनियों के ही सदृश बहुत सी मुनि पत्नियां होम कर्म के सम्पादन करने के लिए धेनुओं का दोहन कर रही थीं ।१३। मुनियों के कुमार दोहन किये हुए दुग्ध को समुचित स्थानों पर पहुँचा रहे थे तथा समस्त प्राणियों को सुख का आवाहन करने वाले होम के होने पर अग्निहोत्र में सभी समाकुल हो रहे थे ।१४।

विकसत्सु सरोजेषु गायत्सु भ्रमरेषु च । वाशत्सु नीडान्निष्पत्य पतात्रिषु समंततः ॥१५ अनतिव्यग्रमत्तेभतुरंगरथगामिनाम् । गात्राह्लादविवर्द्धिन्यां वेलायां मंदवायुना ॥१६ इच्छत्सु चाश्रमोपांतं प्रसूनजलहारिषु ।