संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वाला न होवे ।३७। वसिष्ठ जी ने कहा- भगवान् शंकर ने कहा था कि जो भी तुमने चाहा है, सभी तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायगी । इसके उपरान्त उन्होंने पूर्ण अस्त्र और शस्त्र भी हे नृप ! मन्त्रों के सहित क्रम से परम प्रसन्न होते हुए राम के लिये प्रदान कर दिये थे ।३८। भगवान् शंकर ने प्रयोग करने के और संहार करने के साथ चार प्रकार के अस्त्रों के समुदाय को प्रसाद से परिपूर्ण होकर राम को ग्रहण करा दिया था ।३६। भगवान् शंकर ने असङ्ग वेग से समन्वित-शुभ्र रङ्ग वाले अश्वों से युक्त और सुन्दर ध्वजा वाले उत्तम रथ-धनुष और अक्षर शर राम के लिए दिये थे ।४०। एक ऐसा धनुष भी दिया था जो भेदन करने के अयोग्य-जीर्ण न होने वाला-परम सुदृढ़ ज्या (प्रत्यञ्चा) वाला और विजय करने वाला था । तथा सभी प्रकार के शस्त्रों के घात को सहन करने वाला-परम अद्भुत महाधन सम्पन्न एक कवच भी प्रदान किया था ।४१। हे नराधिप ! इसके अतिरिक्त भगवान् शंकर ने उस अपने परम भक्त राम के लिए युद्धों में अजेय होना-भूलोक में अनुपम शूर वीरता और अपनी ही इच्छा से प्राणों के धारण करने में शक्ति भी प्रदान की थी ।४२।
ख्यातिं च बीजमन्त्रेण तन्नाम्नां सर्वलौकिकीम् ।
तपःप्रभावं च महत्प्रददौ भार्गवाय सः ॥४३
भक्तिं चात्मनि रामाय दत्वा राजन्यथोचिताम् ।
सहितः सकलैर्भूश्चामरैश्चन्द्रशेखरः ॥४४
तेनैव वपुषा शंभुः क्षिप्रमंतरधाद्धरः ।
कृतकृत्यस्ततो रामो लब्ध्वा सर्वमभीप्सितम् ॥४५
अदृश्यतां गते शर्वे महोदरमुवाच ह ।
महोदर मदर्थे त्वमिदं सर्वमशेषतः ॥४६
रथचापादिकं तावत्परिरक्षितुमर्हसि ।
यदा कृत्यं ममैतेन तदानीं त्वं मया स्मृतः ।
रथचापादिकं सर्वं प्रहिणु त्वं मदंतिकम् ॥४७
वसिष्ठ उवाच-तथेत्युक्त्वा गते तस्मिन्भृगुवर्यो महोदरे ।
कृतकृत्यो गुरुजनं द्रष्टुं गंतुमियेष सः ॥४८