संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १७५
समय में स्तुति की गयी थी। तब भगवान् शङ्कर हँसते हुए मेघ के समान परम गम्भीर वाणी से उससे बोले थे। ३२। भगवान् ने कहा—हे राम ! आपकी शौर्यशालिता से मैं आप पर बहुत ही प्रसन्न हो गया हूँ। आपकी तपश्चर्या से—मेरे अन्दर अनन्य भक्ति के भाव से और विशेष रूप से आपके द्वारा किये गये स्तोत्र से मैं बहुत ही प्रसन्न हुआ हूँ ।३३। इस कारण से आप किसी वरदान का वरण कर लो जो-जो भी आप अपने चित्त से चाहते हो। वही मैं आपकी पूर्ण रूप से सभी कुछ दे दूँगा ।३४। वसिष्ठ जी ने कहा—जब देवों के देवेश्वर ने उस राम से इस रीति से कहा था तो उस भृगुकुल के उद्वहन करने वाले ने उनके चरणों में प्रणाम किया था और हे राजन् ! उसने दोनों करों को जोड़कर प्रभु से यह कहा था ।३५।
यदि देव प्रसन्नस्त्वं वरार्होऽस्मि च यद्यहम् । भवतस्तदभीप्सामि हेतुमस्त्राण्यशेषतः ॥३६ अस्त्रे शस्त्रे च शास्त्रे च न मत्तोऽभ्यधिको भवेत् । लोकेषु मां रणे जेता न भवेत्त्वत्प्रसादतः ॥३७ वसिष्ठ उवाच—तथेत्युक्त्वा ततः शंभूरस्त्रशस्त्राण्यशेषतः । ददौ रामाय सुप्रीतः समंत्राणि क्रमान्नृप ॥३८ सप्रयोगं ससंहारमस्त्रग्रामं चतुर्विधम् । प्रसादाभिमुखो रामं ग्राहयामास शंकरः ॥३९ असंगवेगं शुभ्राश्वं सुध्वजं च रथोत्तमम् । इषुधी चाक्षयशरौ ददौ रामाय शंकरः ॥४० अभेद्यमजरं दिव्यं दृढज्यं विजयं धनुः । सर्वशस्त्रसहं चित्रं कवचं च महाधनम् ॥४१ अजेयत्वं च युद्धेषु शौर्यं चाप्रतिमं भुवि । स्वेच्छया धारणे शक्तिं प्राणानां च नराधिप ॥४२
हे देवेश्वर ! यदि आप मेरे ऊपर परम प्रसन्न हैं और यदि मैं आपके द्वारा वरदान देने के योग्य हूँ तो मैं आपसे उस हेतु को और सम्पूर्ण अस्त्रों को चाहता हूँ ।३६। मैं यही चाहता हूँ कि अस्त्र विद्या में—शस्त्रों के ज्ञान में और शास्त्रों की जानकारी में कोई भी मुझसे अधिक ज्ञाता न होवे मैं यह भी चाहता हूँ कि आपके प्रसाद से लोकों में युद्ध में कोई भी जीतने