भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

करने वाले आपके जब तक चरण कमलों की प्राप्ति नहीं करता है अर्थात् आपके चरणों का समाश्रय नहीं ग्रहण करता है तब तक चाहे कोई पण्डित हो अथवा अज्ञानी हो इस संसार में भ्रमण किया करता है ।२७। इस भूमण्डल में वह ही परम दक्ष है—कृती है—मुनि है और वही महान् पण्डित है जिसने आपके चरण कमलों में अपनी बुद्धि को स्थिर करके लगा दिया है ।२८।

सुसूक्ष्मत्वेन गहनः सद्भावस्ते त्रयीमयः । विदुषामपि मूढेन स मया ज्ञायते कथम् ॥२९ अशब्दगोचरत्वेन महिम्नस्तव सांप्रतम् । स्तोतुमप्यनलं सम्यक्त्वामहं जडधीर्यतः ॥३० तस्मादज्ञानतो वापि मया भक्त्यर्थैव संस्तुतः । प्रीतश्च भव देवेश तनु त्वं भक्तवत्सलः ॥३१ वसिष्ठ उवाच-इति स्तुतस्तदा तेन भक्त्या रामेण शंकरः । मेघगंभीरया वाचा तमुवाच हसन्निव ॥३२ भगवानुवाच-रामाहं सुप्रसन्नोऽस्मि शौर्यशालितया तव । तपसा मयि भक्त्या च स्तोत्रेण च विशेषतः ॥३३ वरं वरय तस्मात्वं यद्यदिच्छसि चेतसा । तुभ्यं तत्तदशेषेण दास्याम्यहमशेषतः ॥३४ वसिष्ठ उवाच-इत्युक्तो देवदेवेन तं प्रणम्य भृगूद्वहः । कृतांजलिपुटो भूत्वा राजन्निदमुवाच ह ॥३५

आपका त्रयीमय सद्भाव परम सूक्ष्म होने से अत्यन्त गहन है और बड़े-बड़े विद्वानों के लिए भी अतीव गहन होता है वह आपका सद्भाव महामूढ़ मेरे द्वारा कैसे जाना जाता है ।२९। इस समय में आपकी महिमा शब्दों के द्वारा गोचर न होने के कारण जड़ बुद्धि वाला आपकी भली भाँति से स्तुति करने में भी असमर्थ हूँ ।३०। इससे अज्ञान से मैंने केवल भक्ति के भाव से ही आपकी संस्तुति की है। हे देवेश्वर ! आप मुझ पर प्रीतिमान् हो जाइए क्योंकि आप तो अपने भक्तों पर प्यार करने वाले हैं ।३१। श्री वसिष्ठ जी ने कहा—इस प्रकार से राम के द्वारा भक्ति की भावना से उस