संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १७३
हिरण्यगर्भ रूप भगवान् हर के लिये नमस्कार है ॥२०॥ सम्पूर्ण लोकों की स्थिति के वास्ते व्यापार करने वाले-सत्व विज्ञान के स्वरूप से समन्वित प्रत्यगात्मा—पर और विश्वात्मा के लिए मेरा प्रणाम निवेदित है ॥२१॥
तमोगुणविकाराय जगत्संहारकारिणे । कल्पान्ते रुद्ररूपाय परापरविदे नमः ॥२२
अविकाराय नित्याय नमः सदसदात्मने । बुद्धिबुद्धिप्रबोधाय बुद्धींद्रियविकारणे ॥२३
वस्वादित्यमरुद्भिश्च साध्यरुद्राश्विभेदतः । यन्मायाभिन्नमतयो देवास्तस्मै नमोनमः ॥२४
अविकारमजं नित्यं सूक्ष्मरूपमनौपमम् । तव यत्तन्न जानंति योगिनोऽपि सदाऽमलाः ॥२५
त्वामविज्ञाय दुर्ज्ञेयं सम्यग्ब्रह्मादयोऽपि हि । संसरंति भवे नूनं न तत्कर्मात्मकाश्चिरम् ॥२६
यावन्नोपैति चरणौ तवाज्ञानविघातिनः । तावद्भ्रमति संसारे पण्डितोऽचेतनोऽपि वा ॥२७
स एव दक्षः स कृती स मुनिः स च पंडितः । भवतश्चरणांभोजे येन बुद्धिः स्थिरीकृता ॥२८
तमोगुण के विकार रूप वाले-इस जगत् के संहार कर्त्ता-कल्प के अन्त में रुद्र रूप वाले और पर तथा अपर के ज्ञाता भगवान् शङ्कर के लिए नमस्कार है ॥२२॥ विकारों से रहित-नित्य-सत् और असत् रूप वाले बुद्धि की बुद्धि के प्रबोध रूप तथा बुद्धि और इन्द्रियों में विकार करने वाले शम्भु के लिए प्रणाम है ॥२३॥ वसु-आदित्य और मरुद्गणों से तथा साध्य रुद्र और अश्विनीकुमार-इनके भेदों से देवगण भी जिस की माया से भिन्न मति वाले होते हैं उन परम देव शिव के लिए नमस्कार है और पुनः नमस्कार है ॥२४॥ आपके जिस विकार से रहित-अजन्मा-नित्य और अनुपम सूक्ष्म स्वरूप को सदा अमल योगीजन भी नहीं जानते हैं ॥२५॥ ब्रह्मा आदि भी दुःख से जानने के योग्य आपको न जानकर निश्चय ही इस संसार में संसरण किया करते हैं और तत्कर्मक चिरकाल तक नहीं रहते हैं ॥२६॥ अज्ञान के विघात