संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स्वभक्तहृदयांभोजकर्णिकामध्यवर्त्तिने । सकलागमसिद्धांतसाररूपाय ते नमः ॥१५ नमो निखिलयोगेंद्रबोधनायामृतात्मने । शंकरायाखिलव्याप्तमहिम्ने परमात्मने ॥१६ नमः शर्वाय शांताय ब्रह्मणे विश्वरूपिणे । आदिमध्यांतहीनाय नित्यायाव्यक्तमूर्त्तये ॥१७ व्यक्ताव्यक्तस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्मात्मने नमः । नमो वेदांतवेद्याय विश्वविज्ञानरूपिणे ॥१८ नमः सुरासुरश्र णिमोलिपुष्पार्चितांघ्रये । श्रीकंठाय जगद्धात्रे लोककर्त्रे नमोनमः ॥१९ रजोगुणात्मने तुभ्यं विश्वसृष्टिविधायिने । हिरण्यगर्भरूपाय हराय जगदादये ॥२० नमो विश्वात्मने लोकस्थिति व्यापारकारिणे । सत्वविज्ञानरूपाय पराय प्रत्यगात्मने ॥२१
अपने भक्तजनों के हृदय कमलों की कर्णिकाओं के मध्य में विराजमान रहने वाले और समस्त आगमों के सिद्धान्त स्वरूप वाले भगवान् शङ्कर के लिए प्रणिपात है ।१५। समस्त योगेन्द्रों को बोध देने वाले—अमृतात्मा-सबसे व्याप्त महिमा वाले परमात्मा भगवान् शङ्कर के लिए नमस्कार है ।१६। परम शान्त स्वरूप-विश्व के रूप वाले ब्रह्म-आदि मध्य और अन्त से रहित-नित्य और अव्यक्त मूर्त्ति से समन्वित भगवान् शिव के लिए मेरा अभिवादन है ।१७। व्यक्त (प्रकट) और अव्यक्त (अप्रकट) स्वरूप वाले तथा स्थूल और परम सूक्ष्म रूप वाले शम्भु के लिये मेरा प्रणाम है । वेदान्त शास्त्र के द्वारा ज्ञान प्राप्त करने के योग्य और विश्व के विज्ञान रूप के धारी शिव के लिए नमस्कार है ।१८। समस्त सुरगण और असुरों के मस्तकों में संलग्न पुष्पों से मस्तकों को चरण कमलों में झुकाने पर समचित पदों वाले-जगत् के धाता और सब लोकों की रचना करने वाले भगवान् श्रीकण्ठ के लिए बारम्बार नमस्कार निवेदित है ।१९। इस सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि की रचना करने वाले रजोगुण के स्वरूप से संयुत-इस जगत् के आदि स्वरूप-