संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 173, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १७७
गच्छन्नथ तदासौ तु हिमाद्रिवनगह्वरे । विवेश कंदरं रामो भाविकर्मप्रचोदितः ॥४६॥
उन प्रभु शिव ने भार्गव के लिए उसके नाम बीजमन्त्र के द्वारा सम्पूर्ण लोक में होने वाली ख्याति और महान् तप का प्रभाव दिया था ।४३। समस्त भूतगण और देवगण के सहित भगवान् चन्द्रशेखर ने हे राजन् ! अपने में यथोचित होने वाली भक्ति भी राम को प्रदान की थी ।४४। फिर उसी शरीर के द्वारा ही भगवान् शिव शीघ्र ही अन्तर्हित हो गये थे । फिर वह राम भी अपना सम्पूर्ण अभीप्सित प्राप्त करके कृतकृत्य हो गया था ।४५। भगवान् शंकर के अदृश्य हो जाने पर राम ने महोदर से कहा था । हे महोदर ! इन वस्तुओं को पूर्ण रूप से आप मेरे लिये अपने अधिकार में रखिए ।४६। आप ही इन रथ और चाप आदि की परीक्षा करने के लिए परम योग्य होते हैं । जिस समय में इन समस्त सामग्रियों से मुझे कार्य होगा उसी समय में मेरे द्वारा आप का स्मरण किया जायगा । तब रथ और चाप आदि सब सामान आप मेरे समीप में भेज दीजिएगा ।४७। वसिष्ठ जी ने कहा—महोदर ने कहा था कि मैं इसी प्रकार से सब कार्य करूँगा—यह कहकर उस महोदर के वहाँ से चले जाने पर भृगुवर राम कृत कृत्य हो गया था और फिर उसने अपने गुरुजन के दर्शन प्राप्त करने की इच्छा की थी । ।४८। उस समय में गमन करते हुए आगे आने वाले कर्मों के करने के लिए प्रेरित होकर परम गहन हिमवान् के वन में एक कन्दरा थी उस में राम ने प्रवेश किया था ।४६।
स तत्र ददृशे बालं धृतप्राणमनुद्रुतम् । व्याघ्रेण विप्रतनयं रुदंतं भीतभीतवत् ॥५०॥ दृष्ट्वानुकंपहृदयस्तत्परित्राणकातरः । तिष्ठतिष्ठेति तं व्याघ्रं वदन्नुच्चैरथान्वयात् ॥५१॥ तमनुद्रुत्य वेगेन चिरादिव भृगूद्वहः । आससाद वने घोरं शार्दूलमतिभीषणम् ॥५२॥ व्याघ्रेणानुद्रुतः सोऽपि पलायन्वनगह्वरे । निपपात द्विजसुतस्त्रस्तः प्राणभयातुरः ॥५३॥ रामोऽपि क्रोधरक्ताक्षो विप्रपुत्रपरीप्सया ।