भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174

१७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तृणमलं समादाय कुशास्त्रेणाभ्यमंत्रयत् ॥५४ तावत्तरक्षुलवानाद्रवत्पतितं द्विजम् । दृष्ट्वा ननाद रुभृशं रोदसी कम्पयन्निव ॥५५ दग्ध्वा त्वस्त्राग्निना व्याघ्रं प्रहरन्तं नखांकुरैः । अकृतव्रणमेवाशु मोक्षयामास तं द्विजम् ॥५६

वहाँ पर उस राम ने एक ब्राह्मण के पुत्र को देखा था जो बालक अवस्था का था और एक व्याघ्र उसके पीछे आते हुए खदेड़ रहा था जिसके कारण वह प्राण तो धारण किये हुए था किन्तु अत्यन्त डरे हुए की भाँति रुदन कर रहा था ।५। अपने हृदय में दया का भाव रखने वाला राम उसके परित्राण करने के लिए बहुत ही कातर हो गया था । उसने उस बालक के पीछे दौड़कर आते हुए व्याघ्र से बहुत ऊँची आवाज में 'ठहर जा-ठहर जा'—यह कहते हुए वह उस व्याघ्र के पीछे चल दिया था ।५१। बड़े ही वेग से उसके पीछे प्रभावित होकर उस भृगुकुल के उद्वहन करने वाले राम ने जैसे कुछ विलम्ब हो गया हो उस वन में अत्यन्त भयानक और घोर उस शार्दूल के पास अपनी पहुँच कर ली थी ।५२। उस परम गहन-गम्भीर वन में जिसके पीछे व्याघ्र दौड़ा चला आ रहा था वह ब्राह्मण का पुत्र अपने प्राणों की हानि के भय से बहुत ही आतुर होता हुआ अत्यधिक डरा हुआ था और दौड़ते हुए वह वहाँ पर भूमि में गिर गया था ।५३। राम भी ब्राह्मण के पुत्र की रक्षा की इच्छा से क्रोध से लाल नेत्रों वाला हो गया था और फिर उसने तृण मूल को ग्रहण कर कुशास्त्र से अभिमन्त्रित किया था ।५४। उसी समय के बीच में उस बलवान् व्याघ्र ने उस गिरे हुए द्विज पुत्र पर आक्रमण कर दिया था । उस दृश्य को देखकर राम ने अत्यन्त अधिक ध्वनि भूमि और आकाश को कँपाते हुए की थी अर्थात् घोरगर्जना की थी जिससे मानो भूमि और अन्तरिक्ष भी कम्पित हो गये थे ।५५। अपने नखों के अंकुरों द्वारा प्रहार करते हुए व्याघ्र को अस्त्राग्नि से भस्मीभूत करके उस विप्र सुत को छुड़ा दिया था जिसके शरीर में शीघ्रता से कोई बाघ के नखों से व्रण नहीं हो पाये थे ।५६।

सोऽपि ब्रह्माग्निनिर्दग्धदेहः पाप्मा नभस्तले । गान्धर्वं वपुरास्थाय राममाहेति सादरम् ॥५७ विप्रशापेन भो पूर्वमहं प्राप्तस्तरक्षुताम् ।