भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 175

परशुराम द्वारा द्विज-सुत_रक्षण ] [ १७६

गच्छामि मोचितः शापात्त्वयाऽहमधुना दिवम् ॥५८ इत्युक्त्वा तु गते तस्मिन्नामो वेगेन विस्मितः । पतितं द्विजपुत्रं तं कृपया व्यपपद्यत ॥५६ माभैरेवं वदन्वाणीमारादेव द्विजात्मजम् । परामृशत्तदंगानि शनैरुज्जीवयन्नृप ॥६० रामेणोत्थापितश्चैवं स तदोन्मील्य लोचने । विलोकयन्ददर्शग्रे भृगुश्रेष्ठमवस्थितम् ॥६१ भस्मीकृतं च शार्दूलं दृष्ट्वा विस्मयमागतः । गतभीराह कस्त्वं भोः कथं वेह समागतः ॥६२ केन चायं निहंतुं मामुद्यतो भस्मसात्कृतः । तरक्षुर्भीषणाकारः साक्षान्मृत्यु रिवापरः ॥६३

वह व्याघ्र भी महा पापी ब्रह्माग्नि से दग्ध शरीर वाला आकाश में एक गन्धर्व का शरीर धारण करके बड़े ही आदर के साथ राम से बोला था ।५७। हे राम ! एक विप्र के शाप से पूर्व में इस तरक्षु के स्वरूप को प्राप्त करने वाला हुआ था । इस समय में आपके द्वारा उस शाप से छुड़ाया गया मैं अब स्वर्गलोक में गमन कर रहा हूँ ।५८। इतना ही कहकर बड़े वेग से उसके चले जाने पर राम को बड़ा विस्मय हुआ था और फिर दया के वशी-भूत होकर वह उस भूमि पर पड़े हुए द्विज पुत्र के पास पहुँचा था ।५६। हे नृप ! समीप में ही उस द्विज के पुत्र से 'डरो मत'—यह वाणी बोलते हुए धीरे-धीरे उसको उज्जीवित करते हुए उस बालक के अङ्गों को सहलाया ।६०। इस प्रकार से राम के द्वारा उठाये हुए उसने उस समय में अपने नेत्रों को खोला था । इधर-उधर अवलोकन करते हुए उसने अपने सामने अव-स्थित भृगुकुल में परम श्रेष्ठ राम को देखा था ।६१। और अपने समीप में ही भस्मीभूत शार्दूल को देखकर उस बालक को बड़ा भारी विस्मय हुआ था । जब उसका भय बिल्कुल समाप्त हो गया था तो उसने राम से कहा था—आप कौन हैं अथवा यहाँ पर आप कैसे समागत हुए हैं ? ।६२। और मुझको मारने के लिए उद्यत यह शार्दूल किसके द्वारा निर्दग्ध करके भस्मी-भूत कर दिया गया है ? यह तरक्षु तो महा भीषण आकार वाला साक्षात् दूसरे काल के ही सदृश था ।६३।

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