संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भयसंमूढमनसो ममाद्यापि महामते ।
हतेऽपि तस्मिन्नखिला भान्ति वै तन्मया दिशः ॥६४
त्वामेव मन्ये सकलं पिता माता सुहृद्गुरुः ।
परमापदमापन्नं त्वं मां समुपजीवयन् ॥६५
आसीन्मुनिवरः कश्चिच्छांतो नाम महातपाः ।
पुत्रस्तस्यास्नितीर्थार्थी शालग्राममयासिषम् ॥६६
तस्मात्सं प्रस्थितश्शैलं दिदृक्षुर्गंधमादनम् ।
नानामुनिगणैर्जुष्टं पुण्यं बदरिकाश्रमम् ॥६७
गंतुकामोऽपहायाहं पंथानं तु हिमाचले ।
प्रविशन्गहनं रम्यं प्रदेशालोककाकुलम् ॥६८
दिशं प्राचीं समुद्दिश्य क्रोशमात्रमयासिषम् ।
ततो दिष्टवशेनार्हं प्राद्रवं भयपीडितः ॥६९
पतितश्च त्वया भूयो भूमेरुत्थापितोऽधुना ।
पित्रैव नितरां पुत्रः प्रेम्णात्यर्थं दयालुना ।
इत्येष मम वृत्तांतः साकल्येनोदितस्तव ॥७०
हे महती मति वाले ! अधिक भय के कारण संमूढ मन वाले मुझे अभी भी उसके मृत हो जाने पर भी समस्त दिशाएँ उसी से परिपूर्ण प्रतीत हो रही हैं अर्थात् सभी ओर मुझे वह ही दिखलाई दे रहा है ।६४। मुझे तो इस समय में ऐसा भान हो रहा है और मैं आपको ही अपना माता-पिता-सुहृद् और गुरु सब कुछ मानता हूँ क्योंकि मैं तो परमाधिक आपदा में फँस चुका था और आपने ही मुझको भली-भांति जीवन दान दिया है ।६५। कोई एक महान तपस्वी शान्त नामधारी श्रेष्ठ मुनि थे । मैं उनका ही पुत्र हूँ। मैं तीर्थाटन के प्रयोजन वाला शालग्राम के लिए गया था ।६६। वहाँ से मैंने फिर प्रस्थान किया था और मैं गन्धामादन पर्वत के देखने की इच्छा वाला हो गया था । अनेक महामुनियों के समुदायों के द्वारा सेवित परम पुनीत बदरिकाश्रम को गमन करने की कामना वाला मैं हो गया था । फिर हिमवान् जैसे महा विशाल पर्वत में समुचित मार्ग को छोड़कर परम रम्य और प्रदेश के आलोकन में आकुल गहन वन में प्रवेश कर रहा था ।६७-६८। पूर्व