भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १८१

दिशा कर उद्देश्य करके एक कोश भर हो गया था। वहाँ पर भाग्य के वशीभूत होकर मैं भय से उत्पीड़ित होकर भाग दिया था ।६६। मैं फिर भूमि पर गिर गया था। आपने कृपा करके इस समय मैं फिर मुझे भूमि से उठाया था। दयालु आपने पिता की ही भाँति मेरे पर कृपा की थी जैसे पिता अपने पुत्र पर अत्यधिक प्रेम किया करता है। मेरा यही इतना वृत्तान्त है जो कि मेरे द्वारा पूर्ण रूप से आपके समक्ष में कह दिया गया है ।७०।

वसिष्ठ उवाच—इति पृष्टस्तदा तेन स्ववृत्तांतमशेषतः ।
कथयामास राजेंद्र रामस्तस्मै यथाक्रमम् ॥७१
ततस्तौ प्रीतिसंयुक्तौ कथयंतौ परस्परम् ।
स्थित्वा नाति चिरं कालमथ गंतुमियेष सः ॥७२
अन्वीयमानस्तेनाथ रामस्तस्माद्गुहामुखात् ।
निष्क्रम्यावसथं पित्रोः स प्रतस्थे मुदान्वितः ॥७३
अकृतव्रण एवासौ व्याघ्रेण भुवि पातितः ।
रामेण रक्षितश्चाभूद्यस्माद्व्याघ्रं विनिघ्नता ॥७४
तस्मात्तदेव नामास्य बभूव प्रथितं भुवि ।
विप्रपुत्रस्य राजेंद्र तदेतत्सोऽकृतव्रणः ॥७५
तदा प्रभृति रामस्य छायेवातपगा भुवि ।
बभूव मित्रमत्यर्थं सर्वावस्थासु पार्थिव ॥७६
स तेनानुगतो राजन्भृगोरासाद्य सन्निधिम् ।
दृष्ट्वा ख्यातिं च सोऽभ्येत्य विनयेनाभ्यवादयत् ॥७७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—हे राजेन्द्र ! उस समय में इस प्रकार से उस विप्रसुत के द्वारा पूछे गये रामने कहकर सुना दिया था ।७१। इसके अनन्तर वे दोनों परस्पर में प्रीति से समन्वित होकर वार्त्तालाप करते रहे थे। अत्यधिक कालतक वहाँ न ठहरकर उसने गमन करने की इच्छा की थी ।७२। राम भी उसके पश्चात् उसी के पीछे गमन करने वाला हो गया था और उस गुफा के मुख से निकलकर बड़े आनन्द के साथ अपने माता-पिता के निवास स्थान की ओर उसने भी प्रस्थान कर दिया था ।७३। व्याघ्र के द्वारा भूमि में गिरा भी दिया गया था तो भी उसके देह में कोई भी कहीं

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