संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पर व्रण नहीं हुआ था । उस विनिहनन करने वाले व्याघ्र से वह राम के द्वारा सुरक्षित हुआ था ।७४। हे राजेन्द्र ! इसी कारण से इसका नाम भूमण्डल में प्रथित हो गया था फिर उस विप्र के पुत्र का अकृत व्रण ही नाम पड़ गया था ।७५। हे पार्थिव ! तभी से लेकर आतप के पीछे गमन करने वाली छाया के ही समान वह भूमि में सभी प्रकार की अवस्थाओं में उसका अत्यधिक प्रिय मित्र हो गया था ।७६। हे राजन् भृगु की सन्निधि को प्राप्त करके वह उसी के साथ अनुगत हो गया था और ख्याति को देखकर वह सामने उपस्थित हुआ था तथा विनय के साथ उसने अभिवादन किया था ।७७।
स ताभ्यां प्रियमाणाभ्यामाशीर्भिरभिनंदितः । दिनानि कतिचित्तत्र न्यवसत्तत्प्रियेप्सया ॥७८ ततस्तयोरनुमते च्यवनस्य महामुनेः । आश्रमं प्रतिचक्राम शिष्यसंघैः समावृतम् ॥७९ नियंत्रितांतः करणं तं च संशांतमानसम् । सुकन्या चापि तद्भार्यामवंदत महामनाः ॥८० ताभ्यां च प्रीतियुक्ताभ्यां रामः समभिनंदितः । और्वाश्रमं समापेदे द्रष्टुकामस्तपोनिधिम् ॥८१ तं चाभिवाद्य मेधावी तेन च प्रतिनंदितः । उवास तत्र तत्प्रीत्या दिनानि कतिचिन्नृप ॥८२ विसृष्टस्तेन शनकैऋँ चीकभवनं मुदा । प्रतस्थे भार्गवः श्रीमानकृतव्रणसंयुतः ॥८३ अवंवत पितुः पित्रोर्नत्वा पादौ पृथक् पृथक् । तौ च तं नृपसंहर्षाच्चाशिषा प्रत्यनन्दताम् ॥८४
परमप्रीति से समन्वित उन दोनों के द्वारा वह आशीर्वचनों से अभिनन्दित किया गया था । उसके प्रिय करने की अभिलाषा से उसने वहाँ पर कुछ दिन तक निवास किया था ।७८। इसके उपरान्त उन दोनों की अनुमति से शिष्यों के समुदायों से समावृत महामुनि च्यवन के आश्रम की ओर वह चला गया था ।७९। उस महान मन वाले ने अपने अन्तः-करण को नियन्त्रण में रहने वाले और परम शान्त मन वाले उस महा मुनि की तथा सुकन्या