संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १८३
नाम धारिणी जो उनकी भार्या थी उसकी वन्दना की थी ।८०। परम प्रीति से सुसम्पन्न उन दोनों के द्वारा राम का भली-भाँति अभिनन्दन किया गया था। तप की निधि का दर्शन करने की कामना वाले उसने और्व के आश्रम को प्राप्त किया था ।८१। हे नृप ! मेधावी राम ने उनका अभिवादन किया था और और्व महामुनि के द्वारा राम का अभिनन्दन किया गया था। वहाँ पर उनकी प्रीति होने से वह कतिपय दिनों तक रहा था ।८२। फिर धीरे से आनन्द के साथ उस मुनि के द्वारा राम की विदाई की गयी थी और अकृतव्रण के ही सहित श्रीमान् भार्गव ने वहाँ से प्रस्थान किया था ।८३। पिता के पिता-माता के चरणों में पृथक्-पृथक् वन्दना की थी। हे नृप ! उन दोनों ने उसका बड़े ही हर्ष से अभिनन्दन किया था ।८४।
पृष्टश्च ताभ्यामखिलं निजवृत्तमुदारधीः । कथयामास राजेंद्र यथावृत्तमनुक्रमात् ॥८५ स्थित्वा दिनानि कतिचित्तत्रापि तदनुज्ञया । जगामावसथं पित्रोर्मुदा परमया युतः ॥८६ अभ्येत्य पितरौ राजन्नासीनावाश्रमोत्तमे । अवंदत तयोः पादौ यथावद्भृगुनन्दनः ॥८७ पादप्रणामावनतं समुत्थाय च सादरम् । आश्लिष्य नेत्रसलिलेनैतदंतो पर्यषिंचताम् ॥८८ आशीर्भिरभिनन्द्यांके समारोप्य मुहुर्मुखम् । वीक्षंतौ तस्य चांगानि परिस्पृश्यापतुर्मुदम् ॥८९ अपृच्छतां च तौ रामं कालेनैतावता त्वया । किं कृतं पुत्र को वायं कुत्र वा त्वमुपस्थितः ॥९० कथं सह सकाशे त्वमास्थितो वात्र वागतः । त्वयैतदखिलं वत्स कथ्यतां तथ्यमावयोः ॥९१
फिर उन दोनों के द्वारा उदार बुद्धि वाले उससे अपना वृत्तान्त पूर्ण रूप से पूछा गया था। हे राजेन्द्र ! जो कुछ भी जिस तरह से हुआ था वह अनुक्रम के साथ राम ने कहा था ।८५। वहाँ पर भी कुछ दिन तक स्थित रहकर फिर उनकी अनुज्ञा से परम आनन्द से संयुक्त होकर माता-पिता के