संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १८३
नाम धारिणी जो उनकी भार्या थी उसकी वन्दना की थी ।८०। परम प्रीति से सुसम्पन्न उन दोनों के द्वारा राम का भली-भाँति अभिनन्दन किया गया था। तप की निधि का दर्शन करने की कामना वाले उसने और्व के आश्रम को प्राप्त किया था ।८१। हे नृप ! मेधावी राम ने उनका अभिवादन किया था और और्व महामुनि के द्वारा राम का अभिनन्दन किया गया था। वहाँ पर उनकी प्रीति होने से वह कतिपय दिनों तक रहा था ।८२। फिर धीरे से आनन्द के साथ उस मुनि के द्वारा राम की विदाई की गयी थी और अकृतव्रण के ही सहित श्रीमान् भार्गव ने वहाँ से प्रस्थान किया था ।८३। पिता के पिता-माता के चरणों में पृथक्-पृथक् वन्दना की थी। हे नृप ! उन दोनों ने उसका बड़े ही हर्ष से अभिनन्दन किया था ।८४।
पृष्टश्च ताभ्यामखिलं निजवृत्तमुदारधीः । कथयामास राजेंद्र यथावृत्तमनुक्रमात् ॥८५ स्थित्वा दिनानि कतिचित्तत्रापि तदनुज्ञया । जगामावसथं पित्रोर्मुदा परमया युतः ॥८६ अभ्येत्य पितरौ राजन्नासीनावाश्रमोत्तमे । अवंदत तयोः पादौ यथावद्भृगुनन्दनः ॥८७ पादप्रणामावनतं समुत्थाय च सादरम् । आश्लिष्य नेत्रसलिलेनैतदंतो पर्यषिंचताम् ॥८८ आशीर्भिरभिनन्द्यांके समारोप्य मुहुर्मुखम् । वीक्षंतौ तस्य चांगानि परिस्पृश्यापतुर्मुदम् ॥८९ अपृच्छतां च तौ रामं कालेनैतावता त्वया । किं कृतं पुत्र को वायं कुत्र वा त्वमुपस्थितः ॥९० कथं सह सकाशे त्वमास्थितो वात्र वागतः । त्वयैतदखिलं वत्स कथ्यतां तथ्यमावयोः ॥९१
फिर उन दोनों के द्वारा उदार बुद्धि वाले उससे अपना वृत्तान्त पूर्ण रूप से पूछा गया था। हे राजेन्द्र ! जो कुछ भी जिस तरह से हुआ था वह अनुक्रम के साथ राम ने कहा था ।८५। वहाँ पर भी कुछ दिन तक स्थित रहकर फिर उनकी अनुज्ञा से परम आनन्द से संयुक्त होकर माता-पिता के
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निवास स्थान को वह चला गया था ।८६। हे राजन् ! उस परमोत्तम आश्रम में माता-पिता विराजमान थे । उनके सामने उपस्थित होकर भृगुनन्दन ने उन दोनों के चरणों में यथोचित रीति से वन्दना की थी ।८७। उन्होंने अपने चरणों में मस्तक झुकाने वाले राम को आदर के साथ उठाकर आश्लेषण किया था और परमानन्दित होते हुए अपने वात्सल्य के कारण आये हुए प्रेमाश्रुओं से उसका परिषिञ्चन किया था ।८८। आशीर्वादों के द्वारा अभि-नन्दन करके उन्होंने अपनी गोद में बिठा लिया था और बारम्बार उस अपने पुत्र के मुख का अवलोकन करते हुए उसके अङ्गों का परिस्पर्श करके परमाधिक आनन्द को प्राप्त हुए थे ।८९। उन दोनों ने राम से पूछा था हे पुत्र ! इतने लम्बे समय तक आपने क्या किया था और यह दूसरा कौन तुम्हारे साथ में है तथा तुम कहाँ इतने समय पर्यन्त रहे थे ? ।६०। किस प्रकार से तुम सकाश में साथ समास्थित हुए थे अथवा यहाँ पर कहाँ से इस समय में समागत हुए थे ? हे वत्स ! आपको हम दोनों के सामने जो भी सत्य-सत्य हो वह सब बतला देना चाहिए ।६१।
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कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन
वशिष्ठ उवाच–इति पृष्टस्तदा ताभ्यां रामो राजन्कृतांजलिः।
तयोरकथयत्सर्वमात्मना यदनुष्ठितम् ॥१
निदेशाद्वै कुलगुरोस्तपश्चरणमात्मनः ।
शंभोर्निदेशात्तीर्थानामटनं च यथाक्रमम् ॥२
तदाज्ञयैव दैत्यानां वधं चामरकारणात् ।
हरप्रसादादत्रापि ह्यकृतव्रणदर्शनम् ॥३
एतत्सर्वमशेषेण यदन्यच्चात्मना कृतम् ।
कथयामास तद्रामः पित्रोः संप्रीयमाणयोः ॥४
तौ च तेनोदितं सर्वं श्रुत्वा तत्कर्मविस्तरम् ।
हृष्टौ हर्षांतरं भूयो राजन्नाप्नुवतावुभौ ॥५
एवं पित्रोर्महाराज शुश्रूषां भृगुपुंगवः ।
प्रकुर्वंस्तद्विधेयात्मा भ्रातृणां चाविशेषतः ॥६
कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १८५
एतस्मिन्नेव काले तु कदाचिद्धैहयेश्वरः । इयेष मृगयां गंतुं चतुरंगबलान्वितः ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—हे राजन् ! जब उस समय में इस प्रकार से राम से पूछा गया था तो उसने अपने दोनों करों को जोड़कर उन दोनों के समक्ष में वह सम्पूर्ण अपना घटित घटनाओं का इतिवृत्त कह दिया था जो भी कुछ अपने द्वारा अब तक किया था ।१। अपने कुलदेव की आज्ञा से अपनी तपश्चर्या का समाचरण तथा भगवान शम्भु के निर्देश से यथाक्रम तीर्थों का पर्यटन जो किया था—वह सभी कुछ निवेदित कर दिया था ।२। फिर शंकर की ही आज्ञा से देवों की सुरक्षा करने के कारण से जो दैत्यों का वध किया था वह भी सुना दिया था । यहाँ पर भी भगवान हर के प्रसाद से ही अकृत व्रण का दर्शन हुआ था ।३। यह सम्पूर्ण पूर्णतया जो हुआ था वह और जो अपने द्वारा कुछ भी किया गया था वह सब परम प्रसन्न माता-पिता के सामने राम ने कहकर सुना दिया था ।४। उन दोनों ने राम के द्वारा कहा हुआ सब उसके कर्मों का विस्तार श्रवण किया था और परम प्रसन्न हुए थे । हे राजन् ! फिर वे दोनों एक दूसरे हर्ष को भी प्राप्त हुए थे ।५। हे महाराज ! इस रीति से उस भृगुकुल में परम श्रेष्ठ राम ने अपने माता-पिता की शुश्रूषा करते हुए पूर्णतया उनके प्रति अपने कर्त्तव्य का सविनय पालन किया था और अपने भाइयों की भी सेवा उसी भाव से उसने की थी ।६। इसी समय में किसी वक्त हैहयेश्वर चतुरङ्गिणी सेना के सहित मृगया करने को गमन करने वाला हुआ था ।७।
संरज्यमाने गगने बंधूककुसुमारुणैः । ताराजालद्युतिहरैः समंतादरुणांशुभिः ॥८ मंदं वीजति प्रोद्भूतकेतकीवनराजिभिः । प्राभातिके गंधवहे कुमुदाकरसंस्पृशि ॥९ वयांसि नर्मदातीरतरुनीडाश्रयेषु च । व्याहरन्स्वाकुला वाचो मनः श्रोत्रसुखावहाः ॥१० नर्मदातीरतीर्थं तदवतीर्याघहारिणि । तत्तोये मुनिवृंदेषु गृणत्सु ब्रह्म शाश्वतम् ॥११
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विधिवत्कृतमैत्रेषु सन्निवृत्य सरित्तटात् । आश्रमं प्रति गच्छत्सु मुनिमुख्येषु कर्मिषु ॥१२ प्रत्येकं वीरपत्नीषु व्यग्रासु गृहकर्मसु । होमार्थं मुनिकल्पाभिर्दुह्यमानासु धेनुषु ॥१३ स्थाने मुनिकुमारेषु तं दोहं हि नयत्सु च । अग्निहोत्राकुले जाते सर्वभूतसुखावहे ॥१४
अब उस वेला की अद्भुत छटा का वर्णन किया जाता है—उस समय में चारों ओर अरुण अंशुओं वाली और तारागण की द्युति का हरण करने वाली बन्धूक पुष्पों की अरुणता से आकाश मण्डल संरज्यमान हो रहा था ।८। विकसित केतकी के वनों की पंक्तियों के द्वारा मद को समुद्भूत करते हुए तथा कुमुदों से युक्त सरोवरों का स्पर्श करने वाला प्रातः काल का सुन्दर एवं सुख स्पर्श वायु वहन कर रहा था ।६। पक्षीगण उस समय में नर्मदा के तट पर उगे हुए तरुवरों के नीड़ों के आश्रमों में अपनी समाकुल और मन तथा कानों को परम सुख प्रदान करने वाली वाणियां बोल रहे थे ।१०। नर्मदा का तट तीर्थ है उस तीर्थ में उतर कर पापों के हरण करने वाले उस जल में मुनिवृन्द निरन्तर ब्रह्म अर्थात् वेद वचनों का गान कर रहे थे ।११। विधि-विधान के साथ नित्यानुष्ठान करके नर्मदा नदी के तीर से वापिस लौट कर कर्मों के करने वाले प्रमुख मुनिगण अपने-अपने आश्रमों की ओर गमन कर रहे थे ।१२। प्रत्येक वीरों की पत्नियां अपने-अपने गृहों के आवश्यक कर्मों में उस समय में संलग्न हो रही थीं । सर्वथा मुनियों के ही सदृश बहुत सी मुनि पत्नियां होम कर्म के सम्पादन करने के लिए धेनुओं का दोहन कर रही थीं ।१३। मुनियों के कुमार दोहन किये हुए दुग्ध को समुचित स्थानों पर पहुँचा रहे थे तथा समस्त प्राणियों को सुख का आवाहन करने वाले होम के होने पर अग्निहोत्र में सभी समाकुल हो रहे थे ।१४।
विकसत्सु सरोजेषु गायत्सु भ्रमरेषु च । वाशत्सु नीडान्निष्पत्य पतात्रिषु समंततः ॥१५ अनतिव्यग्रमत्तेभतुरंगरथगामिनाम् । गात्राह्लादविवर्द्धिन्यां वेलायां मंदवायुना ॥१६ इच्छत्सु चाश्रमोपांतं प्रसूनजलहारिषु ।
कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १८७
स्वाध्यायदक्षैर्बहुभिरजिनांबरधारिभिः ॥१७ सम्यक् प्रयोज्यमानेषु मंत्रेषूच्चावचेषु च । प्रैषेषूच्चार्यमाणेषु हूयमानेषु वह्निषु ॥१८ यथावन्मंत्रतंत्रोक्तक्रियासु विततासु च । ज्वलदग्निशिखाकारे तमस्तपनतेजसि ॥१९ प्रतिहत्य दिशः सर्वा विवृण्वाने च मेदिनीम् । सवितुर्युदयं याति नैशे तमसि नश्यति ॥२० तारकासु विलीनासु काष्ठासु विमलासु च । कृतमैत्रादिको राजा मृगयां हैहयेश्वरः ॥२१
उस प्रातःकालीन वेला में सभी ओर कमल खिले उठे थे और विकसित पंकजों के ऊपर भ्रमरों के वृन्द गुञ्जार रहे थे । सभी ओर से अपने-अपने घोंसलों से पक्षीगण नीचे उतर कर अपना अशन कर रहे थे ।१५। उस समय में मन्द वायु वहन कर रही थी और सुमधुर बेला में जो भी विशेष व्यग्र नहीं थे ऐसे मदोन्मत्त हाथी-अश्व और रथों द्वारा गमन करने वालों के शरीर को आह्लाद का विवर्द्धन हो रहा था ।१६। बहुत से कर्मनिष्ठ जन पुष्प और तीर्थजल का आहरण करके अपने-अपने आश्रमों की ओर गमन कर रहे थे । वेदों के स्वाध्याय करने में परम दक्ष बहुत से मृगचर्मों के धारण करने वालों के द्वारा भली-भाँति उच्चावच मन्त्रों के प्रयोग किये जा रहे थे तथा प्रैषों का उच्चारण किया जा रहा था । अग्नि में आहुतियाँ दी जा रही थीं ।१७-१८। रीति के अनुसार मन्त्र शास्त्र और तन्त्रशास्त्र में वर्णित क्रियाओं का विस्तार हो रहा था । जलती हुई अग्नि की शिखा के आकार वाले तपन के तेज में समस्त दिशाओं में तप को प्रतिहत करके वसुन्धरा पर वह फैला हुआ था । सूर्यदेव के उदित हो जाने पर उस समय में रात्रि के समय का अन्धकार विनष्ट हो रहा था ।१९-२०। जिस समय में समस्त तारागण विलीन हो गये थे और सभी दिशाएँ एकदम स्वच्छ दिखलाई दे रही थीं । उस समय में हैहयेश्वर राजा प्रातःकालीन सब कृत्य पूर्ण करके शिकार करने के लिए चल दिया था ।२१।
निर्ययौ नगरात्तस्मात्पुरोहितसमन्वितः । बलैः सर्वैः समुदितैः सवाजिरथकुंजरैः ॥२२
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सचिवैः सहितः श्रीमान् सवयोभिश्च राजभिः । महता बलभारेण नमयन्वसुधातलंम् ॥२३ नादयन् रथघोषेण ककुभः सर्वतो नृपः । स्वबलौघपदक्षेपप्रक्षुण्णावनिरेणुभिः ॥२४ ययौ संच्छादयन्व्योम विमानशतसंकुलम् । संप्रविश्य वनं घोरं विंध्याद्रेर्बलसंचयैः ॥२५ भृशं विलोलयामास समंताद्राजसत्तमः । परिवार्य वनं तत्तु स राजा निजसैनिकैः ॥२६ मृगान्रानाविधान्हिंस्रान्निजघान शितैः शरैः । आकर्णकृष्टकोदंडयोधमुक्तैः शितेषुभिः ॥२७ निकृत्तगात्राः शार्दूला न्यपतन्भुवि केचन । उदग्रवेगपादातखड्गखंडितविग्रहाः ॥२८
रथ-हाथी और अश्वों से समन्वित समस्त सैनिकों से युक्त होकर अपने पुरोहित के साथ वह राजा हैहयेश्वर अपने नगर से शिकार करने के लिए निकल दिया था ।२२। अपने सभी सचिवों के साथ और वयोवृद्ध अन्य कितने ही राजाओं को साथ में लेकर श्रीमान् वह बड़ी भारी सेना के वीरों के भार से समस्त वसुधा को नीचे की ओर झुकाते हुए वह चल रहा था ।२३। वह राजा अपनी सेना के रथों के चलने की ध्वनि से सभी दिशाओं को गुञ्जित कर रहा था और अपनी सेना के समुदायों के सहित प्रवेश करके सैकड़ों विमानों (वायुयानों) से आकाश को संछादित करता हुआ वह राजा था । उस राजेश्वर ने अपने सैनिकों के द्वारा उस सम्पूर्ण वन घेरकर परमश्रेष्ठ नृप वे उस स्थल को अत्यन्त विलोलित कर दिया था ।२५-२६। उस नृप ने अपने कानों तक समाकृष्ट धनुषों की प्रत्यञ्चा वाले योद्धाओं के द्वारा छोड़े हुए तीक्ष्ण बाणों से वहाँ पर अनेक प्रकार के हिंस्रक पशुओं का हनन किया था ।२७। अतीव उदग्र वेग से युक्त पदातियों के खड्गों से खण्डित शरीर वाले जिनके शरीर के भाग कट गये हैं ऐसे कुछ शार्दूल यहाँ पर भूमि में गिर गये थे ।२८।
वराहयूथपाः केचिद्रुधिरार्द्रा धरामगुः । प्रचंडशाक्तिकोन्मुक्तशक्तिनिर्भिन्नमस्तकाः ॥२९
कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १८६
मृगौघाः प्रत्यपद्यंत पर्वता इव मेदिनीम् ।
नाराचा विद्धसर्वांगाः सिंहर्क्षरशभादयः ॥३०
वसुधामन्वकीर्यंत शोणिताद्रीः समंततः ।
एवं सवागुरैः कैश्चित्पतद्भिः पतितैरपि ॥३१
श्वभिश्चानुद्रुतैः कैश्चिद्धावमानैस्तथा मृगैः ।
आर्त्तैर्विक्रोशमानैश्च भीतैः प्राणभयातुरैः ॥३२
युगापाये यथात्यर्थं वनमाकुलमाबभौ ।
वराहसिंहशार्दूलश्वाविच्छशकुलानि च ॥३३
चमरीरुरुगोमायुगवयर्क्षवृकान्बहून् ।
कृष्णसारान्द्वीपिमृगानुक्तखड्गमृगानपि ॥३४
विचित्रांगान्मृगानन्यान्यंकूनपि च सर्वशः ।
बालान्स्तनंधयान्यूनः स्थविरान्मिथुनान्गणान् ॥३५
बहुत ही प्रचण्ड शक्तिशाली वीरों के द्वारा छोड़ी हुई शक्तियों से कटे हुए मस्तक वाले कुछ वराहों के यूथ रुधिर से लथपथ होकर पृथ्वी पर गिर गये थे ।२६। मृगों के समुदाय पर्वतों के ही समान भूमि पर पड़े हुए थे और सिंह-रीछ और शरभ आदिक धनुषों के तीरों से विद्ध समस्त अङ्गों वाले हो गये थे ।३०। इस प्रकार से कुछ सवागुर गिरते हुए और गिरे हुओं के द्वारा सभी ओर सम्पूर्ण पृथ्वी तल को रक्त से भीगी हुई करके अनुकीर्ण कर दिया था । कुछ मृग कुत्तों के द्वारा खदेड़े हुए होकर भाग रहे थे और और आर्त्त होकर चीखें मारते हुए प्राणों के भय से अति आतुर और भयभीत हो रहे थे ।३१-३२। जिस तरह से युग के अन्त समय में सर्वत्र विभीषिका से पूर्ण स्थिति हुआ करती है ठीक उस समय से अत्यन्त आतुर हो रहे थे जिसके कारण वह सम्पूर्ण वन समाकुल होकर शोभित हो रहा था ।३३। वहाँ पर चमरी-रुरु-गोमायु-गवय-रीछ और बहुत से वृक-कृष्णसार-द्वीपी-मृग रक्त खड्ग मृग-विचित्र अङ्गों वाले मृग और न्यंकु आदि सभी ओर मारे जा रहे थे जिनमें दूध पीने वाले बहुत से बहुत छोटे पशु थे और बालक वृद्ध तथा जवान पशुओं के जोड़े भी थे । वहाँ पर सभी का निहनन किया जा रहा था ।३४-३५।
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निजघ्नुर्निशितैः शस्त्रैः शस्त्रवध्यान्हि सैनिकाः । एवं हत्वा मृगान् घोरान्हिंस्रप्रायानशेषतः ॥३६ श्रमेण महता युक्ता बभूवुर्नृपसैनिकाः । मध्ये दिनकरे प्राप्ते ससैन्यः स तदा नृपः ॥३७ नर्मदां घर्मसंतप्तः पितासुरगमच्छनैः । अवतीर्य ततस्तस्यास्तोये सबलवाहनः ॥३८ विजगाह शुभे राजा क्षुत्तृष्णापरिपीडितः । स्नात्वा पीत्वा च सलिलं स तस्याः सुखशीतलम् ॥३९ बिसांकुराणि शुभ्राणि स्वादूनि प्रजघास च । विक्रीड्य तोये सुचिरमुत्तीर्य सबलो नृपः ॥४० बिशश्राम च तत्तीरे तरुखंडोपमंडिते । आलंबमाने तिग्मांशौ ससैन्यः सानुगो नृपः ॥४१ निश्चक्राम पुरं गंतुं विंध्याद्रिवनगह्वरात् । स गच्छन्नेव ददृशे नर्मदा तीरमाश्रितम् ॥४२
राजा के सैनिकों ने शस्त्रों के द्वारा वध करने के जो भी पशु योग्य थे उन सबका पैने शस्त्रों से हनन कर दिया था । इस प्रकार से प्रायः हिंसा करने वाले महान घोर पशुओं का वहाँ पर पूर्ण रूप से हनन किया था ।३६। इस तरह से शिकार करने से शिकार करने से नृप के सैनिक बड़े भारी श्रम से थक गये थे । भुवन भास्कर सूर्यदेव मध्य में प्राप्त हो गये थे । उस समय दोपहरी के वक्त में राजा अपनी सेना के सहित सूर्यातप से बेचैन हो गया था ।३७। घाम से संतप्त होकर प्यासा राजा धीरे से नर्मदा के तट पर चला गया था और फिर वह उस नर्मदा के जल में सब वाहनों और संनिकों के सहित उतर गया था ।३८। भूख और प्यास से उत्पीड़ित राजा ने उस शुभ जल में अवगाहन किया था और उस नदी के परम शीतल जल में स्नान किया था और उसका पान भी किया था ।३९। अपनी समस्त सेना के सहित राजा ने उसके जल के भीतर उतर कर बहुत काल पर्यन्त विशेष रूप से जल-क्रीड़ा की थी तथा परम स्वादिष्ट शुभ्र विस के तन्तुओं का अशन भी किया था ।४०। जब सूर्यदेव आलम्बमाने हो गये थे तो सब अनुचरों और
कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १६१
सैनिकों सहित राजा ने तरुवरों के समूह से मण्डित उस सरिता के तट पर विश्राम किया था। फिर उन विन्ध्याचल के गहन वन से अपने नगर में जाने के लिये राजा निकल दिया था। वहाँ से गमन करते हुए ही उसने नर्मदा के तट पर समाश्रित एक आश्रम का दर्शन दिया था ।४१-४२।
आश्रमं पुण्यशीलस्य जमदग्नेर्महात्मनः ।
ततो निवृत्त्य सैन्यानि दूरेऽवस्थाप्य पार्थिवः ॥४३
परिचारैः कतिपयैः सहितोऽयात्तदाश्रमम् ।
गत्वा तदाश्रमं रम्यं पुरोहितसमन्वितः ॥४४
उपेत्य मुनिशार्दूलं ननाम शिरसा नृपः ।
अभिनंद्याशिषा तं वै जमग्निर्नृपोत्तमम् ॥४५
पूजयामास विधिवदर्घपाद्यासनादिभिः ।
संभावयित्वा तां पूजां विहितां मुनिना तदा ॥४६
निषसादासने शुभ्रे पुरस्तस्य महामुनेः ।
तमासीनं नृपवरं कुशासनगतो मुनिः ॥४७
पप्रच्छ कुशलप्रश्नं पुत्रमित्रादिबंधुषु ।
सह संकथयंस्तेन राज्ञा मुनिवरोत्तमः ॥४८
स्थित्वा नातिचिरं कालमातिथ्यार्थं न्यमंत्रयत् ।
ततः स राजा सुप्रीतो जमदग्निमभाषत ॥४९
वह एक महान् आत्मा वाले और पुण्यशील जमदग्नि मुनि का आश्रम था। राजा ने वहाँ से लौटकर कुछ दूरी पर अपनी सेनाओं को अब स्थापित कर दिया था ।४३। अपने साथ में कतिपय परिचारकों को लेकर ही वह उस आश्रम में गया। पुरोहित के सहित ही राजा ने उस परम रम्य आश्रम में गमन किया था ।४४। राजा ने वहाँ पर पहुँच कर उस मुनिशार्दूल के चरणों में शिर झुकाकर प्रणाम किया था। जमदग्नि ने उस श्रेष्ठ राजा का आशीर्वचनों के द्वारा अभिनन्दन किया था ।४५। मुनि ने अर्घ्य-पाद्य और आसन आदि के द्वारा उस राजा का अर्चन किया था। उस समय में मुनि के द्वारा की हुई पूजा को स्वीकार किया था ।४६। फिर राजा उन महामुनि के सामने परम शुभ्र आसन पर विराजमान हो गया था। जब राजा अपने
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आसन पर उपविष्ट हो गये तो वे मुनिवर जमदग्नि एक कुशा के आसन पर संस्थित हो गये थे ।४७। महामुनि ने उस राजा के साथ संलाप करते हुए पुत्र-मित्र और बन्धु आदि के विषय में राजा से क्षेम-कुशल पूछा था ।४८। थोड़े ही समय तक स्थित होकर महामुनि ने अपना अतिथि-सत्कार करने के लिए राजा को निमन्त्रित किया था। इसके अनन्तर राजा परम प्रीतिमान् होकर जमदग्नि मुनि से बोला था ।४६।
महर्षे देहि मेऽनुज्ञां गमिष्यामि स्वकं पुरम् ।
समग्रवाहनबलो ह्यहं तस्मान्महामुने ।।५०
कर्तुं न शक्यमातिथ्यं त्वया वन्याशिना वने ।
अथवा त्वं तपः शक्त्या कर्तुमातिथ्यमद्य मे ।।५१
शक्नोष्यापि पुरीं गंतुं मामनुज्ञातुमर्हसि ।
अन्यथा चेत्खलैः सैन्यैरत्यर्थं मुनिसत्तम ।।५२
तपस्विनां भवेत्पीडा नियमक्षयकारिका ।
वसिष्ठ उवाच—
इत्येवमुक्तः स मुनिस्तं प्राह स्थीयतां क्षणम् ।।५३
सर्वं संपादयिष्येऽहमातिथ्यं सानुगस्य ते ।
इत्युक्त्वाहूय तां दोग्ध्रीमुवाचायं ममातिथिः ।।५४
उपागतस्त्वया तस्मात्क्रियतामद्य सत्कृतिः ।
इत्युक्ता मुनिना दोग्ध्री सातिथेयमशेषतः ।
दुदोह नृपतेराशु यद्योग्यं मुनिगौरवात् ।।५५
अथाश्रमं तत्सुरराजसद्मनिकाशमासीद्भृगुपुंगवस्य ।
विभूतिभेदैरविचिन्तरूपमनन्यसाध्यं सुरभिप्रभावात् ।।५६
हैहयेश्वर राजा ने महामुनि से प्रार्थना की थी कि हे महर्षे ! आप मुझे अपनी आज्ञा दीजिए । मैं अब अपने पुर को गमन करूँगा । हे महामुने ! कारण यह है कि मेरे साथ समस्त सेनाएँ वाहन भी हैं ।५०। इस वन में वन्य फल मूलों का अशन करने वाले आपके द्वारा आतिथ्य नहीं किया जा सकता है। अथवा यह भी हो सकता है कि आप अपनी तपश्चर्या की
कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १६३
शक्ति से मेरा आतिथ्य करने की सामर्थ्य रखते हैं तो भी यह उचित नहीं है और आप मुझे मेरी नगरों की ओर गमन करने की आज्ञा देने के योग्य हैं। अन्य प्रकार से अर्थात् यदि मैं ठहर भी जाऊँ तो हे मुनि श्रेष्ठ ! ये सैनिक बड़े ही दुष्ट स्वभाव वाले हैं। इनके द्वारा तपस्वियों के नियमों क्षय करने वाली बहुत ही अधिक आप लोगों को पीड़ा हो जायगी ।५१। वसिष्ठ जी ने कहा—इस तरह से जब राजा के द्वारा मुनिवर से कहा गया था तो उन महामुनि ने राजा से कहा था कि आप कुछ क्षण के लिए यहाँ पर विराजमान तो रहिए ।५२-५३। मैं आपका समस्त अनुगामियों के ही सहित पूरा आतिथ्य सत्कार सम्पन्न कर दूँगा। इतना राजा से कहकर उस महा- मुनि ने दोग्ध्री धेनु को बुलाकर उससे कहा था कि यह राजा आज मेरे अतिथि के स्वरूप में समागत हो गये हैं ।५४। जब यह यहाँ पर समागत हो गये हैं तो इसी कारण से आप इनका आज पूर्णतया सत्कार करिए। इस रीति से मुनि के द्वारा कही हुई उस दोग्ध्री ने महामुनि के गौरव के कारण पूर्णरूप से राजा का आतिथेय किया था और जो-जो भी राजा के आतिथ्य के योग्य पदार्थ थे वे सभी बहुत शीघ्र दोहन करके उपस्थित कर दिये थे ।५५। इसके अनन्तर उस सुरभि के प्रभाव से उस श्रेष्ठ मुनि का आश्रम सुरराज के सद्म के समान वैभवों के अनेक भेदों के द्वारा ऐसा न सोचने के योग्य स्वरूप वाला हो गया था कि जो अन्य किसी के भी द्वारा साध्य नहीं हो सकता है ।५६।
अनेकरत्नोज्ज्वलचित्रहेमप्रकाशमालापरिवीतमुच्चैः । पूर्णेन्दुशुभ्राभ्रविषक्तशृंगैः प्रासादसंघैः परिवीतमंतः ॥५७ कांस्यारकूटारसिताग्रहेमदुर्वर्णसौधोपलदारुमृद्भिः । पृथग्विभिन्नैर्भवनैरनेकः सद्भासितं नेत्रमनोभिरामैः ॥५८ महार्हरत्नोज्ज्वलहेमवेदिका निष्कूटसोपानकुटीविटंकैः । तुलाकपाटार्गलकुड्यदेहली निशांतशाला- जिरशोभितंभृं शम् ।।५६ वलभ्यलिन्दांगणचारुतोरणैरदभ्रपर्यन्तचतुष्किकादिभिः । कुड्येषु संशोभित दिव्यरत्नैर्विचित्रचित्रैः परिशोभमानैः ॥६० उच्चावचै रत्नवरैर्विचित्रसुवर्णसिंहासनपीठिकाद्यैः ।
१६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स भक्ष्यभोज्यादिभिरन्नपानैरुपेतभांडोपगतैकदेशः ॥६१ गृहैरमर्त्योचिपसर्वसंपत्समन्वितैर्नेत्रमनोऽभिरामै । तस्याश्रमं संन्नगरोपमानं बभौ वधूभिश्च मनोहराभिः ॥६२
अब सुरभि की महिमा के आश्रम की जैसी परम विशाल शोभा हुई थी उसकी छटा का वर्णन किया जाता है--उस आश्रम के अन्दर का भाग नाना भाँति के रत्नों की देदीप्यमान द्युति से विचित्र हो गया था और सुवर्ण के चाकचिक्य से संयुत प्रकाश माला से घिरा हुआ था तथा पूर्ण चन्द्र के समान परम शुभ्र ओर अत्युच्च अन्तरिक्ष को छूने वाली शिखरों से समन्वित प्रासादों से चारों ओर परिपूर्ण वह आश्रम हो गया था ।५७। कांस्य-आरकूट-ताम्र-हेम-सुवर्णं सौधोपल-दारु और मृत्तिका के पृथक्-पृथक् और मिश्रित नेत्रों तथा मन को परम अभिराम प्रतीत होने वाले अनेक भवनों से वह आश्रम समुद्भासित हो गया था ।५८। उस महामुनि का वह आश्रम उस समय में महा मूल्यवान रत्नों से समुज्ज्वल था और हेम की वेदिका-निष्कूट-सोपान-कुटी और विटंककों से समन्वित था। तुला-कपाट-अर्गला-कुड्य (भीत)-देहली-निशान्तशाला-अजिर (आँगन) की शोभा से बहुत ही वह आश्रम संयुत था ।५९। वलभी-अलिन्द-अङ्गण और परम रम्य तोरणों से युक्त था तथा अदभ्र चतुष्किका आदि से विशोभित था। उस आश्रम में जो स्तम्भ बने हुए थे उनमें और जो दीवारें थीं उनमें परिशोभमान दिव्य रत्नों के विचित्र चित्र विद्यमान थे। इनसे उस आश्रम की अद्भुत शोभा हो रही थी ।६०। वह महामुनि का आश्रम छोटे व कीमती श्रेष्ठ रत्नों से युक्त था और उसमें अत्यद्भुत सुवर्ण के अनेक सिंहासन और पीठिका आदि निर्मित थे। उस आश्रम के एक देश में भक्ष्य और भोज्य-लेह्य-चोष्य आदि अशनोपयोगी पदार्थ वत्तंमान थे तथा अन्न-पानों से समुपेत भाण्ड भी वहाँ पर विद्यमान थे ।६१। उसमें ऐसे अनेक गृह बने हुए थे जो देवों के लायक सब प्रकार की नयनों और मन के परम रमणीक लगने वाली सम्पदा से समन्वित थे। वह मुनि का आश्रम सुरभि की महिमा से मनोहर बन्धुओं से सुन्दर नगर के समान परमशोभित हो रहा था ।६२।
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जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ १६५
॥ जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ॥
वसिष्ठ उवाच— तस्मिन्पुरे सन्तुलितामरेंद्रपुरीप्रभावे मुनिवर्यधेनुः । विनिर्यमे तेषु गृहेषु पश्चात्तद्योग्यनारीनरवृंदजातम् ॥१ विचित्रवेषाभरणप्रसूनगंधांशुकालंकृतविग्रहाभिः । सहावभावाभिरुदारचेष्टाश्रीकांतिसौंदर्यगुणान्विताभिः ॥२ मंदस्फुरद्दन्तमरीचिजालविद्योतिताननसरोजजितेंदुभाभिः । प्रत्यग्रयौवनभरासववल्गुगीभिः संमंथरकटाक्ष निरीक्षणाभिः ॥३ प्रीतिप्रसन्नहृदयाभिरतिप्रभाभिः शृङ्गारकल्पतरुपुष्पविभू- षिताभिः । देवांगनातुलितसौभगसौकुमार्यरूपाभिलाषमधुराकृति- रंजिताभिः ॥४ उत्तप्तहेमकलशोपमचारूपीनवक्षोरुहद्वयभरानतमध्यमाभिः । श्रोणीभराक्रमणखेदपरिश्रितासृगारक्तपावकरसारुणितां- घ्रिभूभिः ॥५ केयूरहारमणिकंकणहेमकंठसूत्रामलश्रवणमण्डलमंडिताभिः । स्रग्दामचुम्बितसकुन्तकेशपाशकांचीकलापपरिशिजित- नूपुराभिः ॥६ आमृष्टरोषपरिसांत्वननर्महासकेलीप्रियालपनभर्त्सनरोषणेषु । भावेषु पार्थिवनिजप्रियधैर्यबन्धसर्वापहारचतुरेषु कृतांतराभिः ॥७
श्री वसिष्ठजी ने कहा—सन्तुलित महेन्द्र की नगरी के प्रभाव वाले उस पुर में मुनिवर की धेनु ने उन गृहों में इसके पश्चात् उनके ही योग्य नर-नारियों के समुदायों की रचना भी कर दी थी ॥१॥ अब जो नारीगणों का निर्माण उस पुर में किया था उनकी वेष-भूषा—रूप माधुर्य—सौन्दर्य
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छटा और कार्य कुशलता आदि का वर्णन किया जाता है—उन नारियों के विचित्र वेष थे और अद्भुत आभरण-प्रसून-गन्धादि से समलंकृत शरीर थे। तथा वे अपने हावभावों से समन्वित थीं और उदार चेष्टाएँ—श्री-कान्ति और सौन्दर्य आदि गुणगुण से युक्त थीं ।२। मन्द स्फुरण करने वाली दन्त पंक्ति की मरीचियों के जाल से विशेष रूप से द्योतित उनका मुख कमल तथा जिससे उन्होंने चन्द्र की आभा को भी पराजित कर दिया था । उनकी वाणी नूतन यौवन के भार से वल्गुता से संयुत थी तथा प्रेम पूर्वक धीमे कटाक्षों से संयुक्त उनका निरीक्षण था ।३। उनके वदन की प्रजा अत्यधिक थी और प्रीति की भाव-भङ्गी से वे परम प्रसन्न हृदयों वाली थीं तथा अपने श्रृङ्गार में कल्पतरु के परम सुन्दर सुमनों से विभूषित थीं । उनका परम सुरम्य सौभाग्य-सुकुमारता-रूप लावण्य-अभिलाषा शोर मधुर आकृति देवाङ्गना के समान ही थी जिनके कारण वे नारियाँ अतीव रञ्जित थीं ।४। तपे हुए सुवर्ण के कलशों के ही सदृश अत्यधिक सुन्दर—परपुष्ट उनके दोनों उरोज थे जिनके वहन करने के भार सो उन नारियों का मध्य भाग कुछ नीचे की ओर झुका हुआ था । उन नारियों के श्रोणियों का भार ऐसा था कि उसके वहन करने में उनको कुछ खेद होता था और खिन्नता के कारण से परिश्रित रुधिर से तथा लगे हुए पावक रस से उनके चरणों का भाग अरुणिमा से संयुत था ।५। केयूर-हार-मणियों के द्वारा विनिर्मित कंकण-सुवर्ण का कण्ठ सूत्र और विमल श्रवणों के भूषणों से वे नारियाँ विभूषित थीं । उनके कुन्तल केशपाशों में परम सुन्दर सुमनों की मालाएँ गुथी हुई थीं और करधनी में लगे हुए घूँघरों की तथा नूपुरों की ध्वनि से वे समायुक्त थीं ।६। आकृष्ट रोष की परिसान्त्वना में नर्म (प्रणयालाप)—हास-केली—और प्रिय आलाप करने में—भाषण और रोष तथा भर्त्सना में दक्ष एवं पार्थिव निजप्रिय धैर्यबन्ध सबके अपहार में कुशल भावों से वे नारियाँ अपने मन को लगाने वाली थीं ।७।
तन्त्रीस्वनोपमितमंजुलसौम्यगेयगंधर्वतारम्-
धुरारवभाषिणीभिः ।
वीणाप्रवीणतरपाणितलांगुलीभिर्गंभीर-
चक्रचटुवादरतोत्सुकाभिः ॥८
स्त्रीभिर्मदालसतराभिरतिप्रगल्भभावाभिराकुलिकामुक
मानसाभिः ।
जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ १६७
कामप्रयोगनिपुणाभिरहीनसंपदौदार्यरूपगुणशील- समन्विताभिः ॥९॥ संख्यातिगाभिरनिशं गृहकृत्यकर्मव्यग्रात्मकाभिरपि तत्परिचारिकाभिः । पुंभिश्च तद्गुणगणोचितरूपशोभैरुद्भासितैर्गृहचरैः परितः परीतम् ॥१०॥ सराजमार्गापणसौधसद्मसोपानदेवालयचत्वरेषु । पौरैरणेष्वार्थगुणैः समंतादध्यास्यमानं परिपूर्णकामै ॥११॥ अनेकरत्नोज्ज्वलितैर्विचित्रैः प्रासादसंघैरतुलैरसंख्यैः । रथाश्वमातंगखरोष्ट्रगोजायोग्यैरनेकेरपि मंदिरैश्च ॥१२॥ नरेंद्रसामंतनिषादिसादिपदातिसेनापतिनायकानाम् । विप्रादिकानां रथिसारथीनां गृहैस्तथा मागधबंदिनां च ॥१३॥ विविक्तरथ्यापणचित्रचत्वरैरनेकवस्तुक्रयविक्रयैश्च । महाधनोपस्करसाधुनिर्मितैर्गृहैश्च शुभ्रैर्गणिकाजनानाम् ॥१४॥
वीणा के तारों से निकले हुए स्वर के समान परम मञ्जुल और सौम्य गाने के योग्य गन्धवों के समुच्च एवं मधुर निनाद से भाषण करने वाली वे सब नारियां थीं। वीणा के वादन में परम प्रवीण पाणि की अँगुलियों के द्वारा गम्भीर चक्र के चटु बाद में निरत एवं वे समस्त नारियाँ समुत्सुक थीं ।८। वे समस्त नारियाँ यौवन के मद से अधिक अलस और अत्यधिक प्रगल्भ भावों वाली थीं। तथा वे सब आकुलित एवं कामुक अर्थात् कामकेली की वासना से संयुत मनों वाली थीं। कामवासना से रचनात्मक प्रयोग करने में वे वारी बहुत ही निपुण थीं। तथा परिपूर्ण सम्पदा-उदारता-रूप-गुण और शील स्वभाव से समन्वित थीं ।९। संख्या को भी अतिक्रमण करने वाले अर्थात् बहुत ही अधिक घर के कर्मों में बहुत संलग्न रहने पर भी अपने प्राणी पतियों की परिचर्या करने वाली थीं। वह पुर उन नारियों के गुणगणों के लायक ही रूप और शोभा वाले—उद्भासित और सभी ओर से गृहों में सञ्चरण करने वाले पुरुषों से घिरा हुआ था ।१०। वह नगर राजमार्ग, आपण सौध-सोपान-देवालयों के अंगनों
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में समस्त अर्थ गृहों वाले तथा परिपूर्ण कामनाओं से संयुत नागरिकों से चारों ओर अध्यास्यमान था अर्थात् परिगुणशाली पुरवासी सभी ओर निवास कर रहे थे ॥११॥ उस नगर में असंख्य-अनुपम और नाना भाँति के रत्नों से समुज्ज्वलित एवं विचित्र प्रासादों के समुदायों की अवस्थिति थी और वहाँ पर अनेक ऐसे मन्दिर थे जहाँ पर अनेक रथ-अश्व-हाथी खर-उष्ट्र और गौएँ विद्यमान थे ॥१२॥ उस नगर में चारों ओर नरेन्द्र सामन्त-निषाद सादी-पदाति-सेनापति और नायकों के तथा रथी-सारथी-मागध-वन्दीगण और विप्र प्रभृतियों के गृह बने हुए थे ॥१३॥ उस अनुपम नगर में विविक्त अर्थात् खुली हुईं रथ्याएँ थीं—सभी आपण थे जिनके चत्वर बहुत ही विचित्र थे। वहाँ पर अनेक प्रकार की वस्तुओं का क्रय और विक्रय हो रहा था। उस नगर में वारांगनाओं के परम शुभ्र गृहों के समूह विनिर्मित थे जिनके निर्माण करने में बहुत अधिक धन के व्यय से सब सामान भली-भाँति लगाये गये थे ॥१४॥
महार्हरत्नोज्ज्वलतुंगगोपुरैः सह श्वगृधव्रजनर्तनालयैः । चित्रैर्ध्वजैश्चापि पताकिकाभिः शुभ्रैः । पटंमण्डपिकाभिरुन्नतैः ॥१५॥ कल्हारकंजकुमुदोत्पलरेणुवासितैश्चक्राह्वहंसकुररीबक- सारसानाम् । नानारवाढ्यरमणीयतटाकवापीसरोवरैश्चापि जलोप- पन्नैः ॥१६॥ चूतप्रियालपनसाम्रमधूकजंबूलक्षैर्नवैश्च तरुभिश्च कृतालवालैः । पर्यंतरोषितमनोरमनागकेतकीपुन्नागचंपकवनैश्च पतत्रिजुष्टैः ॥१७॥ मंदारकुंदकरवीरमनोज्ञयूथिकाजात्यादिकैर्विविधपुष्प फलैश्च वृक्षैः । संलक्ष्यमाणपरितोपवनालिभिश्च संशोभितं जगति विस्मयनीयरूपैः ॥१८॥
जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ १६६
सर्वर्त्तुकप्रवरसौरभवायुमंदमंदप्रचारिगतिभर्त्सितघर्मकालम् । इत्थं सुरासुरमनोरमभोगसंपद्विस्पष्टमानविभवं नगरं नरेंद्र ॥१९॥ सौभाग्यभोगममितं मुनिहोमधेनुः सद्यो विधाय विनिवेदयदाशु तस्मै । ज्ञात्वा ततो मुनिवरो द्विजहोमधेन्वा संपादितं नरपते रुचिरातिथेयम् ॥२०॥ आहूय कंचन तदंतिकमात्मशिष्यं प्रास्थापयत्सगुण- शालिनमाशु राजन् । गत्वा विशामधिपतेस्तरसा समीपं सप्रश्रयं मुनिसुतस्तमिदं बभाषे ॥२१॥
उस सुरम्य नगर में बहुत ही मूल्यवान् रत्नों से उज्ज्वल एवं समुन्नत गोपुर बने हुए थे तथा श्वा-गृद्धों के समुदायों के बर्त्तन के आलय बने हुए थे। उसमें विचित्र ध्वजाएँ-पताकाएं और शुभ्र पटों से संयुत उन्नत मण्डपिकाएँ विनिर्मित थी ।१५। उस नगर में जल में भरे हुए अनेक तालाब-बावड़ी और सरोवर थे जिनमें अनेक प्रकार की रमणीक ध्वनि हो रही थी तथा वहाँ पर उनका जल कह्लार-कमल-कुमुद और उत्पलों की रेणु से सुवासित था और चक्रवाक-हंस-कुररी-बगुला तथा सारसों की ध्वनियां सुनाई दे रही थीं ।१६। उस नगर में अनेक प्रकार के वृक्ष लगे हुए थे जिनके आलवाल भी बने हुए थे । उन तरुवरों में आम्र-प्रियालपन-मधूक जम्बू और प्लक्ष के वृक्ष थे । वहाँ पर पर्वतों में परम सुन्दर नाग केतुकी पुन्नाग और चम्पक के वन थे जो पक्षियों के द्वारा सेवित थे अर्थात् जिन पर अनेक पक्षी निवास कर रहे थे ।१७। वह नगर अनेक तरह के वृक्षों से शोभित था जिनका स्वरूप जगत् परमाश्चर्य जनक था। वहाँ पर सुसंरक्षित चारों ओर उपवनों की पंक्तियाँ थीं एवं वहाँ अनेक मन्दार-कुन्द-करवीर-सुन्दर यूथिका और जाती आदि के पुष्पों तथा फलों वाले वृक्ष लगे हुए थे ।१८। हे नरेन्द्र ! उस नगर में समस्त ऋतुओं में श्रेष्ठ वसन्त में सुरभित वायु के मन्द-मन्द प्रचलन से घर्म के काल को भर्त्सित कर दिया गया था । इस प्रकार से वह नगर सुरासुरों की परम मनोरम भोगों की सम्पदा के
२०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विस्पष्टमान वैभव वाला था ।१९। उस मुनि की होम धेनु ने तुरन्त ही अमित सौभाग्य के भोग को करके शीघ्र ही उस महामुनीन्द्र की सेवा में कर दिया था। इसके अनन्तर उन मुनिश्रेष्ठ ने द्विज होम धेनु के द्वारा राजा का परम रुचिर आतिथेय-सम्पादित किया हुआ जान लिया था ।२०। फिर उस मुनींद्र ने अपने किसी गुणशाली शिष्य को बुलाकर हे राजन् ! शीघ्र ही हैययेश्वर के समीप में भेज दिया था। उस मुनि सुत ने शीघ्र वेग से विशों के अधिपति के समीप में गमन करके बहुत ही नम्रता से यह उससे यह कहा था ।२१।
आतिथ्यमस्मदुपपादितमाशु राज्ञासंभावनीयमिति नः कुलेदेशिकाज्ञा ।
राजा ततो मुनिवरेण कृताभ्यनुज्ञः संप्राविशत्पुरवरं स्वकृते कृतं तत् ॥२२॥
सर्वोपभोग्यनिलयं मुनिहोमधेनुसामर्थ्यसूचकमशेषबलैः समेतः ।
अन्तः प्रविश्य नगरर्द्धिमशेषलोकसंमोहिनीमभिसमीक्ष्य स राजवर्यः ॥२३॥
प्रीतिप्रसन्नवदनः सबलस्तु दानी धीरोऽपि विस्मयवाप भृशं तदानीम् ।
गच्छन्सुरस्त्रीनयनालियूथपानैकपात्रोचितचारुमूर्तिः ॥२४॥
रेमे स हैहयपतिः पुरराजमार्गे शक्रः कुबेरवसताविव सामरौघः ।
तं प्रस्थितं राजपथात्समंतात्पौरांगाश्चन्दनवारिसिक्तैः ॥२५॥
प्रसूनलाजाप्रकरैरजस्रमवीवृषन्सौधगताः सुहृद्यैः ।
अभ्यागतार्हणसमुत्सुकपौरकांता हस्तारविंदगलिताम-
ललाजवर्षैः ॥२६॥
कालेयपंकसुरभीकृतनन्दनोत्थशुभ्रप्रसूननिकरै-
रलिवृन्दगीतैः ।
जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ २०१
तत्रत्यपौरवनितांजनरत्नसारमुक्ताभिरप्यनुपदं
प्रविकीर्यमाणः ॥२७
व्यभ्राजतावनिपतिर्विशदैः समंताच्छीतांशुरश्मि-
निकरैरिव मंदराद्रिः।
ब्राह्मीं तपः श्रियमुदारगणामचिंत्यां लोकेषु दुर्लभतरां
स्पृहणीयशोभाम् ॥२८
हमारे कुल गुरुदेव की यह आज्ञा हुई है कि हमारे द्वारा समुपादित आतिथ्य को राजा के द्वारा शीघ्र ही ग्रहण करना चाहिए। इसके पश्चात् राजा ने मुनिवर के द्वारा अनुज्ञा प्राप्त करके उस परम श्रेष्ठ नगर में प्रवेश किया था जोकि अपने ही लिए निर्मित किया गया था ॥२२। वह राजा अपनी सेना के समस्त सैनिकों के सहित उस नगर में प्रविष्ट हुआ था जो कि मुनि की होमधेनु की अत्यद्भुत शक्ति-सामर्थ्य का सूचक था और जो सभी प्रकार के उपभोगों का एक महान विशाल आगार था। अन्दर उस राजा ने भली-भाँति प्रवेश करके सभी लोकों का सम्मोहन करने वाली उस नगर की समृद्धि का अभिसमीक्षण करके अत्यधिक प्रसन्नता प्राप्त की थी ॥२३। उस समय अपनी सेना के सहित परम दानी और महान् धीर उस राजा ने प्रीति से प्रसन्न वदन वाला होकर अत्यधिक विस्मय को प्राप्त किया था। देवों की स्त्रियों के नेत्ररूपी भ्रमरों के यूथों के द्वारा पान करने का एक मात्र पात्र समुचित एवं सुन्दर मूर्ति वाला जिस समय वहाँ गमन कर रहा था। अर्थात् गमन करते हुए देवाङ्गनाएँ अपने नयनों से उसकी सुन्दर मूर्ति का अवलोकन कर रही थी ॥२४। देवगणों के समुदाय के साथ उस राजा हैहयपति ने कुबेर की वसति में महेन्द्र के ही समान पुर के राज मार्ग में परम रमण किया था। राजमार्ग के द्वारा जब प्रस्थान कर रहा था उस समय में सौधों (विशाल महलों) पर स्थित होती हुई पौराङ्गनाओं ने चारों ओर से चन्दन के जल से सिक्त परम सुन्दर प्रसूनों और लाजाओं (खीलों) के प्रकर्रों से निरन्तर उस राजा के ऊपर वर्षा की थी। समागत अतिथि के अर्चन करने में परमाधिक समुत्सुक उस नगर वासियों की अङ्गनाओं के करकमलों से गिरी हुई खीलों की वर्षा हो रही थी। उस समय में होने वाले पङ्क (कीच) से सुगन्धित नन्दन वन में समुत्पन्न पुष्पों की राशियाँ बरसायीं जा रही थीं जिन पर सौरभ से संमोहित भ्रमर-गुञ्जार कर रहे
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थे । वहाँ पर वह राजा वहाँ की वनिताओं के द्वारा अब्जन रत्न सार मुक्ताओं से अनुपद् प्रकीर्यमाण हो रहा था ।२५-२६-२७। वह अवनिपति इस प्रकार की विशद वृत्तियों से चारों ओर विशेष रूप से भ्राजित हुआ था जैसे मन्दराचल चन्द्रमा की किरणों के समुदाय से शोभाशाली हुआ करता है। उस समय अत्यन्त उदार और लोकों में चिन्तन न करने के योग्य ब्राह्मणों की तपश्चर्या का भी अवलोकन राजा ने किया था जो कि अन्य लोकों में महादुर्लभ और स्पृहणीय शोभा से समन्वित थी ।२८।
पश्यन्विशामधिपतिः पुरसंपदं तामुच्चैः शशंस मनसा श्वचसेव राजन् । मेने च हैहयपतिर्भुवि दुर्लभैयं शास्त्री मनोहरतरा सहिता हि संपत् ॥२६
अस्याः शतांशतुलनामपि नोपगंतुं विप्रश्रियं प्रभवतीति सुराचितायाः । मध्येपुरं पुरजनोपचितां विभूतिमालोकयन्सह पुरोहितमंत्रिसार्थैः ॥३०
गच्छन्स्वपार्श्वचरदर्शितवर्णसौधो लेभे मुदं पुरजनैः परिपूज्यमानः । राजा ततो मुनिवरोपचितां सपर्यामात्मानुरूपमिह सानुचरी लभस्व ॥३१
इत्यश्रमेण नृपतिर्विनिवर्त्तयित्वा स्वार्थं प्रकल्पितगृहा- भिमुखो जगाम । पौरैः समेत्य विविधाणपाणिभिश्च मार्गे मुदा विरचितांः अन्जिभिः समंतात् ॥३२
संभावितोऽप्यनुपदं जयशब्दघोषैस्तुर्यारवैश्च बधिरीकृतदिग्विभागः । कक्षांतराणि नृपतिः शनकैरतीत्य त्रीणि क्रमेण च ससंभ्रमकंचुकीनि ॥३३