संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
निजघ्नुर्निशितैः शस्त्रैः शस्त्रवध्यान्हि सैनिकाः । एवं हत्वा मृगान् घोरान्हिंस्रप्रायानशेषतः ॥३६ श्रमेण महता युक्ता बभूवुर्नृपसैनिकाः । मध्ये दिनकरे प्राप्ते ससैन्यः स तदा नृपः ॥३७ नर्मदां घर्मसंतप्तः पितासुरगमच्छनैः । अवतीर्य ततस्तस्यास्तोये सबलवाहनः ॥३८ विजगाह शुभे राजा क्षुत्तृष्णापरिपीडितः । स्नात्वा पीत्वा च सलिलं स तस्याः सुखशीतलम् ॥३९ बिसांकुराणि शुभ्राणि स्वादूनि प्रजघास च । विक्रीड्य तोये सुचिरमुत्तीर्य सबलो नृपः ॥४० बिशश्राम च तत्तीरे तरुखंडोपमंडिते । आलंबमाने तिग्मांशौ ससैन्यः सानुगो नृपः ॥४१ निश्चक्राम पुरं गंतुं विंध्याद्रिवनगह्वरात् । स गच्छन्नेव ददृशे नर्मदा तीरमाश्रितम् ॥४२
राजा के सैनिकों ने शस्त्रों के द्वारा वध करने के जो भी पशु योग्य थे उन सबका पैने शस्त्रों से हनन कर दिया था । इस प्रकार से प्रायः हिंसा करने वाले महान घोर पशुओं का वहाँ पर पूर्ण रूप से हनन किया था ।३६। इस तरह से शिकार करने से शिकार करने से नृप के सैनिक बड़े भारी श्रम से थक गये थे । भुवन भास्कर सूर्यदेव मध्य में प्राप्त हो गये थे । उस समय दोपहरी के वक्त में राजा अपनी सेना के सहित सूर्यातप से बेचैन हो गया था ।३७। घाम से संतप्त होकर प्यासा राजा धीरे से नर्मदा के तट पर चला गया था और फिर वह उस नर्मदा के जल में सब वाहनों और संनिकों के सहित उतर गया था ।३८। भूख और प्यास से उत्पीड़ित राजा ने उस शुभ जल में अवगाहन किया था और उस नदी के परम शीतल जल में स्नान किया था और उसका पान भी किया था ।३९। अपनी समस्त सेना के सहित राजा ने उसके जल के भीतर उतर कर बहुत काल पर्यन्त विशेष रूप से जल-क्रीड़ा की थी तथा परम स्वादिष्ट शुभ्र विस के तन्तुओं का अशन भी किया था ।४०। जब सूर्यदेव आलम्बमाने हो गये थे तो सब अनुचरों और