संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १८६
मृगौघाः प्रत्यपद्यंत पर्वता इव मेदिनीम् ।
नाराचा विद्धसर्वांगाः सिंहर्क्षरशभादयः ॥३०
वसुधामन्वकीर्यंत शोणिताद्रीः समंततः ।
एवं सवागुरैः कैश्चित्पतद्भिः पतितैरपि ॥३१
श्वभिश्चानुद्रुतैः कैश्चिद्धावमानैस्तथा मृगैः ।
आर्त्तैर्विक्रोशमानैश्च भीतैः प्राणभयातुरैः ॥३२
युगापाये यथात्यर्थं वनमाकुलमाबभौ ।
वराहसिंहशार्दूलश्वाविच्छशकुलानि च ॥३३
चमरीरुरुगोमायुगवयर्क्षवृकान्बहून् ।
कृष्णसारान्द्वीपिमृगानुक्तखड्गमृगानपि ॥३४
विचित्रांगान्मृगानन्यान्यंकूनपि च सर्वशः ।
बालान्स्तनंधयान्यूनः स्थविरान्मिथुनान्गणान् ॥३५
बहुत ही प्रचण्ड शक्तिशाली वीरों के द्वारा छोड़ी हुई शक्तियों से कटे हुए मस्तक वाले कुछ वराहों के यूथ रुधिर से लथपथ होकर पृथ्वी पर गिर गये थे ।२६। मृगों के समुदाय पर्वतों के ही समान भूमि पर पड़े हुए थे और सिंह-रीछ और शरभ आदिक धनुषों के तीरों से विद्ध समस्त अङ्गों वाले हो गये थे ।३०। इस प्रकार से कुछ सवागुर गिरते हुए और गिरे हुओं के द्वारा सभी ओर सम्पूर्ण पृथ्वी तल को रक्त से भीगी हुई करके अनुकीर्ण कर दिया था । कुछ मृग कुत्तों के द्वारा खदेड़े हुए होकर भाग रहे थे और और आर्त्त होकर चीखें मारते हुए प्राणों के भय से अति आतुर और भयभीत हो रहे थे ।३१-३२। जिस तरह से युग के अन्त समय में सर्वत्र विभीषिका से पूर्ण स्थिति हुआ करती है ठीक उस समय से अत्यन्त आतुर हो रहे थे जिसके कारण वह सम्पूर्ण वन समाकुल होकर शोभित हो रहा था ।३३। वहाँ पर चमरी-रुरु-गोमायु-गवय-रीछ और बहुत से वृक-कृष्णसार-द्वीपी-मृग रक्त खड्ग मृग-विचित्र अङ्गों वाले मृग और न्यंकु आदि सभी ओर मारे जा रहे थे जिनमें दूध पीने वाले बहुत से बहुत छोटे पशु थे और बालक वृद्ध तथा जवान पशुओं के जोड़े भी थे । वहाँ पर सभी का निहनन किया जा रहा था ।३४-३५।