संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १६१
सैनिकों सहित राजा ने तरुवरों के समूह से मण्डित उस सरिता के तट पर विश्राम किया था। फिर उन विन्ध्याचल के गहन वन से अपने नगर में जाने के लिये राजा निकल दिया था। वहाँ से गमन करते हुए ही उसने नर्मदा के तट पर समाश्रित एक आश्रम का दर्शन दिया था ।४१-४२।
आश्रमं पुण्यशीलस्य जमदग्नेर्महात्मनः ।
ततो निवृत्त्य सैन्यानि दूरेऽवस्थाप्य पार्थिवः ॥४३
परिचारैः कतिपयैः सहितोऽयात्तदाश्रमम् ।
गत्वा तदाश्रमं रम्यं पुरोहितसमन्वितः ॥४४
उपेत्य मुनिशार्दूलं ननाम शिरसा नृपः ।
अभिनंद्याशिषा तं वै जमग्निर्नृपोत्तमम् ॥४५
पूजयामास विधिवदर्घपाद्यासनादिभिः ।
संभावयित्वा तां पूजां विहितां मुनिना तदा ॥४६
निषसादासने शुभ्रे पुरस्तस्य महामुनेः ।
तमासीनं नृपवरं कुशासनगतो मुनिः ॥४७
पप्रच्छ कुशलप्रश्नं पुत्रमित्रादिबंधुषु ।
सह संकथयंस्तेन राज्ञा मुनिवरोत्तमः ॥४८
स्थित्वा नातिचिरं कालमातिथ्यार्थं न्यमंत्रयत् ।
ततः स राजा सुप्रीतो जमदग्निमभाषत ॥४९
वह एक महान् आत्मा वाले और पुण्यशील जमदग्नि मुनि का आश्रम था। राजा ने वहाँ से लौटकर कुछ दूरी पर अपनी सेनाओं को अब स्थापित कर दिया था ।४३। अपने साथ में कतिपय परिचारकों को लेकर ही वह उस आश्रम में गया। पुरोहित के सहित ही राजा ने उस परम रम्य आश्रम में गमन किया था ।४४। राजा ने वहाँ पर पहुँच कर उस मुनिशार्दूल के चरणों में शिर झुकाकर प्रणाम किया था। जमदग्नि ने उस श्रेष्ठ राजा का आशीर्वचनों के द्वारा अभिनन्दन किया था ।४५। मुनि ने अर्घ्य-पाद्य और आसन आदि के द्वारा उस राजा का अर्चन किया था। उस समय में मुनि के द्वारा की हुई पूजा को स्वीकार किया था ।४६। फिर राजा उन महामुनि के सामने परम शुभ्र आसन पर विराजमान हो गया था। जब राजा अपने