भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १८७

स्वाध्यायदक्षैर्बहुभिरजिनांबरधारिभिः ॥१७ सम्यक् प्रयोज्यमानेषु मंत्रेषूच्चावचेषु च । प्रैषेषूच्चार्यमाणेषु हूयमानेषु वह्निषु ॥१८ यथावन्मंत्रतंत्रोक्तक्रियासु विततासु च । ज्वलदग्निशिखाकारे तमस्तपनतेजसि ॥१९ प्रतिहत्य दिशः सर्वा विवृण्वाने च मेदिनीम् । सवितुर्युदयं याति नैशे तमसि नश्यति ॥२० तारकासु विलीनासु काष्ठासु विमलासु च । कृतमैत्रादिको राजा मृगयां हैहयेश्वरः ॥२१

उस प्रातःकालीन वेला में सभी ओर कमल खिले उठे थे और विकसित पंकजों के ऊपर भ्रमरों के वृन्द गुञ्जार रहे थे । सभी ओर से अपने-अपने घोंसलों से पक्षीगण नीचे उतर कर अपना अशन कर रहे थे ।१५। उस समय में मन्द वायु वहन कर रही थी और सुमधुर बेला में जो भी विशेष व्यग्र नहीं थे ऐसे मदोन्मत्त हाथी-अश्व और रथों द्वारा गमन करने वालों के शरीर को आह्लाद का विवर्द्धन हो रहा था ।१६। बहुत से कर्मनिष्ठ जन पुष्प और तीर्थजल का आहरण करके अपने-अपने आश्रमों की ओर गमन कर रहे थे । वेदों के स्वाध्याय करने में परम दक्ष बहुत से मृगचर्मों के धारण करने वालों के द्वारा भली-भाँति उच्चावच मन्त्रों के प्रयोग किये जा रहे थे तथा प्रैषों का उच्चारण किया जा रहा था । अग्नि में आहुतियाँ दी जा रही थीं ।१७-१८। रीति के अनुसार मन्त्र शास्त्र और तन्त्रशास्त्र में वर्णित क्रियाओं का विस्तार हो रहा था । जलती हुई अग्नि की शिखा के आकार वाले तपन के तेज में समस्त दिशाओं में तप को प्रतिहत करके वसुन्धरा पर वह फैला हुआ था । सूर्यदेव के उदित हो जाने पर उस समय में रात्रि के समय का अन्धकार विनष्ट हो रहा था ।१९-२०। जिस समय में समस्त तारागण विलीन हो गये थे और सभी दिशाएँ एकदम स्वच्छ दिखलाई दे रही थीं । उस समय में हैहयेश्वर राजा प्रातःकालीन सब कृत्य पूर्ण करके शिकार करने के लिए चल दिया था ।२१।

निर्ययौ नगरात्तस्मात्पुरोहितसमन्वितः । बलैः सर्वैः समुदितैः सवाजिरथकुंजरैः ॥२२