संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
विधिवत्कृतमैत्रेषु सन्निवृत्य सरित्तटात् । आश्रमं प्रति गच्छत्सु मुनिमुख्येषु कर्मिषु ॥१२ प्रत्येकं वीरपत्नीषु व्यग्रासु गृहकर्मसु । होमार्थं मुनिकल्पाभिर्दुह्यमानासु धेनुषु ॥१३ स्थाने मुनिकुमारेषु तं दोहं हि नयत्सु च । अग्निहोत्राकुले जाते सर्वभूतसुखावहे ॥१४
अब उस वेला की अद्भुत छटा का वर्णन किया जाता है—उस समय में चारों ओर अरुण अंशुओं वाली और तारागण की द्युति का हरण करने वाली बन्धूक पुष्पों की अरुणता से आकाश मण्डल संरज्यमान हो रहा था ।८। विकसित केतकी के वनों की पंक्तियों के द्वारा मद को समुद्भूत करते हुए तथा कुमुदों से युक्त सरोवरों का स्पर्श करने वाला प्रातः काल का सुन्दर एवं सुख स्पर्श वायु वहन कर रहा था ।६। पक्षीगण उस समय में नर्मदा के तट पर उगे हुए तरुवरों के नीड़ों के आश्रमों में अपनी समाकुल और मन तथा कानों को परम सुख प्रदान करने वाली वाणियां बोल रहे थे ।१०। नर्मदा का तट तीर्थ है उस तीर्थ में उतर कर पापों के हरण करने वाले उस जल में मुनिवृन्द निरन्तर ब्रह्म अर्थात् वेद वचनों का गान कर रहे थे ।११। विधि-विधान के साथ नित्यानुष्ठान करके नर्मदा नदी के तीर से वापिस लौट कर कर्मों के करने वाले प्रमुख मुनिगण अपने-अपने आश्रमों की ओर गमन कर रहे थे ।१२। प्रत्येक वीरों की पत्नियां अपने-अपने गृहों के आवश्यक कर्मों में उस समय में संलग्न हो रही थीं । सर्वथा मुनियों के ही सदृश बहुत सी मुनि पत्नियां होम कर्म के सम्पादन करने के लिए धेनुओं का दोहन कर रही थीं ।१३। मुनियों के कुमार दोहन किये हुए दुग्ध को समुचित स्थानों पर पहुँचा रहे थे तथा समस्त प्राणियों को सुख का आवाहन करने वाले होम के होने पर अग्निहोत्र में सभी समाकुल हो रहे थे ।१४।
विकसत्सु सरोजेषु गायत्सु भ्रमरेषु च । वाशत्सु नीडान्निष्पत्य पतात्रिषु समंततः ॥१५ अनतिव्यग्रमत्तेभतुरंगरथगामिनाम् । गात्राह्लादविवर्द्धिन्यां वेलायां मंदवायुना ॥१६ इच्छत्सु चाश्रमोपांतं प्रसूनजलहारिषु ।