संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 181, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंकार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १८५
एतस्मिन्नेव काले तु कदाचिद्धैहयेश्वरः । इयेष मृगयां गंतुं चतुरंगबलान्वितः ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—हे राजन् ! जब उस समय में इस प्रकार से राम से पूछा गया था तो उसने अपने दोनों करों को जोड़कर उन दोनों के समक्ष में वह सम्पूर्ण अपना घटित घटनाओं का इतिवृत्त कह दिया था जो भी कुछ अपने द्वारा अब तक किया था ।१। अपने कुलदेव की आज्ञा से अपनी तपश्चर्या का समाचरण तथा भगवान शम्भु के निर्देश से यथाक्रम तीर्थों का पर्यटन जो किया था—वह सभी कुछ निवेदित कर दिया था ।२। फिर शंकर की ही आज्ञा से देवों की सुरक्षा करने के कारण से जो दैत्यों का वध किया था वह भी सुना दिया था । यहाँ पर भी भगवान हर के प्रसाद से ही अकृत व्रण का दर्शन हुआ था ।३। यह सम्पूर्ण पूर्णतया जो हुआ था वह और जो अपने द्वारा कुछ भी किया गया था वह सब परम प्रसन्न माता-पिता के सामने राम ने कहकर सुना दिया था ।४। उन दोनों ने राम के द्वारा कहा हुआ सब उसके कर्मों का विस्तार श्रवण किया था और परम प्रसन्न हुए थे । हे राजन् ! फिर वे दोनों एक दूसरे हर्ष को भी प्राप्त हुए थे ।५। हे महाराज ! इस रीति से उस भृगुकुल में परम श्रेष्ठ राम ने अपने माता-पिता की शुश्रूषा करते हुए पूर्णतया उनके प्रति अपने कर्त्तव्य का सविनय पालन किया था और अपने भाइयों की भी सेवा उसी भाव से उसने की थी ।६। इसी समय में किसी वक्त हैहयेश्वर चतुरङ्गिणी सेना के सहित मृगया करने को गमन करने वाला हुआ था ।७।
संरज्यमाने गगने बंधूककुसुमारुणैः । ताराजालद्युतिहरैः समंतादरुणांशुभिः ॥८ मंदं वीजति प्रोद्भूतकेतकीवनराजिभिः । प्राभातिके गंधवहे कुमुदाकरसंस्पृशि ॥९ वयांसि नर्मदातीरतरुनीडाश्रयेषु च । व्याहरन्स्वाकुला वाचो मनः श्रोत्रसुखावहाः ॥१० नर्मदातीरतीर्थं तदवतीर्याघहारिणि । तत्तोये मुनिवृंदेषु गृणत्सु ब्रह्म शाश्वतम् ॥११