संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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निवास स्थान को वह चला गया था ।८६। हे राजन् ! उस परमोत्तम आश्रम में माता-पिता विराजमान थे । उनके सामने उपस्थित होकर भृगुनन्दन ने उन दोनों के चरणों में यथोचित रीति से वन्दना की थी ।८७। उन्होंने अपने चरणों में मस्तक झुकाने वाले राम को आदर के साथ उठाकर आश्लेषण किया था और परमानन्दित होते हुए अपने वात्सल्य के कारण आये हुए प्रेमाश्रुओं से उसका परिषिञ्चन किया था ।८८। आशीर्वादों के द्वारा अभि-नन्दन करके उन्होंने अपनी गोद में बिठा लिया था और बारम्बार उस अपने पुत्र के मुख का अवलोकन करते हुए उसके अङ्गों का परिस्पर्श करके परमाधिक आनन्द को प्राप्त हुए थे ।८९। उन दोनों ने राम से पूछा था हे पुत्र ! इतने लम्बे समय तक आपने क्या किया था और यह दूसरा कौन तुम्हारे साथ में है तथा तुम कहाँ इतने समय पर्यन्त रहे थे ? ।६०। किस प्रकार से तुम सकाश में साथ समास्थित हुए थे अथवा यहाँ पर कहाँ से इस समय में समागत हुए थे ? हे वत्स ! आपको हम दोनों के सामने जो भी सत्य-सत्य हो वह सब बतला देना चाहिए ।६१।
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कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन
वशिष्ठ उवाच–इति पृष्टस्तदा ताभ्यां रामो राजन्कृतांजलिः।
तयोरकथयत्सर्वमात्मना यदनुष्ठितम् ॥१
निदेशाद्वै कुलगुरोस्तपश्चरणमात्मनः ।
शंभोर्निदेशात्तीर्थानामटनं च यथाक्रमम् ॥२
तदाज्ञयैव दैत्यानां वधं चामरकारणात् ।
हरप्रसादादत्रापि ह्यकृतव्रणदर्शनम् ॥३
एतत्सर्वमशेषेण यदन्यच्चात्मना कृतम् ।
कथयामास तद्रामः पित्रोः संप्रीयमाणयोः ॥४
तौ च तेनोदितं सर्वं श्रुत्वा तत्कर्मविस्तरम् ।
हृष्टौ हर्षांतरं भूयो राजन्नाप्नुवतावुभौ ॥५
एवं पित्रोर्महाराज शुश्रूषां भृगुपुंगवः ।
प्रकुर्वंस्तद्विधेयात्मा भ्रातृणां चाविशेषतः ॥६