संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ १६७
कामप्रयोगनिपुणाभिरहीनसंपदौदार्यरूपगुणशील- समन्विताभिः ॥९॥ संख्यातिगाभिरनिशं गृहकृत्यकर्मव्यग्रात्मकाभिरपि तत्परिचारिकाभिः । पुंभिश्च तद्गुणगणोचितरूपशोभैरुद्भासितैर्गृहचरैः परितः परीतम् ॥१०॥ सराजमार्गापणसौधसद्मसोपानदेवालयचत्वरेषु । पौरैरणेष्वार्थगुणैः समंतादध्यास्यमानं परिपूर्णकामै ॥११॥ अनेकरत्नोज्ज्वलितैर्विचित्रैः प्रासादसंघैरतुलैरसंख्यैः । रथाश्वमातंगखरोष्ट्रगोजायोग्यैरनेकेरपि मंदिरैश्च ॥१२॥ नरेंद्रसामंतनिषादिसादिपदातिसेनापतिनायकानाम् । विप्रादिकानां रथिसारथीनां गृहैस्तथा मागधबंदिनां च ॥१३॥ विविक्तरथ्यापणचित्रचत्वरैरनेकवस्तुक्रयविक्रयैश्च । महाधनोपस्करसाधुनिर्मितैर्गृहैश्च शुभ्रैर्गणिकाजनानाम् ॥१४॥
वीणा के तारों से निकले हुए स्वर के समान परम मञ्जुल और सौम्य गाने के योग्य गन्धवों के समुच्च एवं मधुर निनाद से भाषण करने वाली वे सब नारियां थीं। वीणा के वादन में परम प्रवीण पाणि की अँगुलियों के द्वारा गम्भीर चक्र के चटु बाद में निरत एवं वे समस्त नारियाँ समुत्सुक थीं ।८। वे समस्त नारियाँ यौवन के मद से अधिक अलस और अत्यधिक प्रगल्भ भावों वाली थीं। तथा वे सब आकुलित एवं कामुक अर्थात् कामकेली की वासना से संयुत मनों वाली थीं। कामवासना से रचनात्मक प्रयोग करने में वे वारी बहुत ही निपुण थीं। तथा परिपूर्ण सम्पदा-उदारता-रूप-गुण और शील स्वभाव से समन्वित थीं ।९। संख्या को भी अतिक्रमण करने वाले अर्थात् बहुत ही अधिक घर के कर्मों में बहुत संलग्न रहने पर भी अपने प्राणी पतियों की परिचर्या करने वाली थीं। वह पुर उन नारियों के गुणगणों के लायक ही रूप और शोभा वाले—उद्भासित और सभी ओर से गृहों में सञ्चरण करने वाले पुरुषों से घिरा हुआ था ।१०। वह नगर राजमार्ग, आपण सौध-सोपान-देवालयों के अंगनों