संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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छटा और कार्य कुशलता आदि का वर्णन किया जाता है—उन नारियों के विचित्र वेष थे और अद्भुत आभरण-प्रसून-गन्धादि से समलंकृत शरीर थे। तथा वे अपने हावभावों से समन्वित थीं और उदार चेष्टाएँ—श्री-कान्ति और सौन्दर्य आदि गुणगुण से युक्त थीं ।२। मन्द स्फुरण करने वाली दन्त पंक्ति की मरीचियों के जाल से विशेष रूप से द्योतित उनका मुख कमल तथा जिससे उन्होंने चन्द्र की आभा को भी पराजित कर दिया था । उनकी वाणी नूतन यौवन के भार से वल्गुता से संयुत थी तथा प्रेम पूर्वक धीमे कटाक्षों से संयुक्त उनका निरीक्षण था ।३। उनके वदन की प्रजा अत्यधिक थी और प्रीति की भाव-भङ्गी से वे परम प्रसन्न हृदयों वाली थीं तथा अपने श्रृङ्गार में कल्पतरु के परम सुन्दर सुमनों से विभूषित थीं । उनका परम सुरम्य सौभाग्य-सुकुमारता-रूप लावण्य-अभिलाषा शोर मधुर आकृति देवाङ्गना के समान ही थी जिनके कारण वे नारियाँ अतीव रञ्जित थीं ।४। तपे हुए सुवर्ण के कलशों के ही सदृश अत्यधिक सुन्दर—परपुष्ट उनके दोनों उरोज थे जिनके वहन करने के भार सो उन नारियों का मध्य भाग कुछ नीचे की ओर झुका हुआ था । उन नारियों के श्रोणियों का भार ऐसा था कि उसके वहन करने में उनको कुछ खेद होता था और खिन्नता के कारण से परिश्रित रुधिर से तथा लगे हुए पावक रस से उनके चरणों का भाग अरुणिमा से संयुत था ।५। केयूर-हार-मणियों के द्वारा विनिर्मित कंकण-सुवर्ण का कण्ठ सूत्र और विमल श्रवणों के भूषणों से वे नारियाँ विभूषित थीं । उनके कुन्तल केशपाशों में परम सुन्दर सुमनों की मालाएँ गुथी हुई थीं और करधनी में लगे हुए घूँघरों की तथा नूपुरों की ध्वनि से वे समायुक्त थीं ।६। आकृष्ट रोष की परिसान्त्वना में नर्म (प्रणयालाप)—हास-केली—और प्रिय आलाप करने में—भाषण और रोष तथा भर्त्सना में दक्ष एवं पार्थिव निजप्रिय धैर्यबन्ध सबके अपहार में कुशल भावों से वे नारियाँ अपने मन को लगाने वाली थीं ।७।
तन्त्रीस्वनोपमितमंजुलसौम्यगेयगंधर्वतारम्-
धुरारवभाषिणीभिः ।
वीणाप्रवीणतरपाणितलांगुलीभिर्गंभीर-
चक्रचटुवादरतोत्सुकाभिः ॥८
स्त्रीभिर्मदालसतराभिरतिप्रगल्भभावाभिराकुलिकामुक
मानसाभिः ।