भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

१६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

छटा और कार्य कुशलता आदि का वर्णन किया जाता है—उन नारियों के विचित्र वेष थे और अद्भुत आभरण-प्रसून-गन्धादि से समलंकृत शरीर थे। तथा वे अपने हावभावों से समन्वित थीं और उदार चेष्टाएँ—श्री-कान्ति और सौन्दर्य आदि गुणगुण से युक्त थीं ।२। मन्द स्फुरण करने वाली दन्त पंक्ति की मरीचियों के जाल से विशेष रूप से द्योतित उनका मुख कमल तथा जिससे उन्होंने चन्द्र की आभा को भी पराजित कर दिया था । उनकी वाणी नूतन यौवन के भार से वल्गुता से संयुत थी तथा प्रेम पूर्वक धीमे कटाक्षों से संयुक्त उनका निरीक्षण था ।३। उनके वदन की प्रजा अत्यधिक थी और प्रीति की भाव-भङ्गी से वे परम प्रसन्न हृदयों वाली थीं तथा अपने श्रृङ्गार में कल्पतरु के परम सुन्दर सुमनों से विभूषित थीं । उनका परम सुरम्य सौभाग्य-सुकुमारता-रूप लावण्य-अभिलाषा शोर मधुर आकृति देवाङ्गना के समान ही थी जिनके कारण वे नारियाँ अतीव रञ्जित थीं ।४। तपे हुए सुवर्ण के कलशों के ही सदृश अत्यधिक सुन्दर—परपुष्ट उनके दोनों उरोज थे जिनके वहन करने के भार सो उन नारियों का मध्य भाग कुछ नीचे की ओर झुका हुआ था । उन नारियों के श्रोणियों का भार ऐसा था कि उसके वहन करने में उनको कुछ खेद होता था और खिन्नता के कारण से परिश्रित रुधिर से तथा लगे हुए पावक रस से उनके चरणों का भाग अरुणिमा से संयुत था ।५। केयूर-हार-मणियों के द्वारा विनिर्मित कंकण-सुवर्ण का कण्ठ सूत्र और विमल श्रवणों के भूषणों से वे नारियाँ विभूषित थीं । उनके कुन्तल केशपाशों में परम सुन्दर सुमनों की मालाएँ गुथी हुई थीं और करधनी में लगे हुए घूँघरों की तथा नूपुरों की ध्वनि से वे समायुक्त थीं ।६। आकृष्ट रोष की परिसान्त्वना में नर्म (प्रणयालाप)—हास-केली—और प्रिय आलाप करने में—भाषण और रोष तथा भर्त्सना में दक्ष एवं पार्थिव निजप्रिय धैर्यबन्ध सबके अपहार में कुशल भावों से वे नारियाँ अपने मन को लगाने वाली थीं ।७।

तन्त्रीस्वनोपमितमंजुलसौम्यगेयगंधर्वतारम्-
धुरारवभाषिणीभिः ।
वीणाप्रवीणतरपाणितलांगुलीभिर्गंभीर-
चक्रचटुवादरतोत्सुकाभिः ॥८
स्त्रीभिर्मदालसतराभिरतिप्रगल्भभावाभिराकुलिकामुक
मानसाभिः ।

जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ १६७

कामप्रयोगनिपुणाभिरहीनसंपदौदार्यरूपगुणशील- समन्विताभिः ॥९॥ संख्यातिगाभिरनिशं गृहकृत्यकर्मव्यग्रात्मकाभिरपि तत्परिचारिकाभिः । पुंभिश्च तद्गुणगणोचितरूपशोभैरुद्भासितैर्गृहचरैः परितः परीतम् ॥१०॥ सराजमार्गापणसौधसद्मसोपानदेवालयचत्वरेषु । पौरैरणेष्वार्थगुणैः समंतादध्यास्यमानं परिपूर्णकामै ॥११॥ अनेकरत्नोज्ज्वलितैर्विचित्रैः प्रासादसंघैरतुलैरसंख्यैः । रथाश्वमातंगखरोष्ट्रगोजायोग्यैरनेकेरपि मंदिरैश्च ॥१२॥ नरेंद्रसामंतनिषादिसादिपदातिसेनापतिनायकानाम् । विप्रादिकानां रथिसारथीनां गृहैस्तथा मागधबंदिनां च ॥१३॥ विविक्तरथ्यापणचित्रचत्वरैरनेकवस्तुक्रयविक्रयैश्च । महाधनोपस्करसाधुनिर्मितैर्गृहैश्च शुभ्रैर्गणिकाजनानाम् ॥१४॥

वीणा के तारों से निकले हुए स्वर के समान परम मञ्जुल और सौम्य गाने के योग्य गन्धवों के समुच्च एवं मधुर निनाद से भाषण करने वाली वे सब नारियां थीं। वीणा के वादन में परम प्रवीण पाणि की अँगुलियों के द्वारा गम्भीर चक्र के चटु बाद में निरत एवं वे समस्त नारियाँ समुत्सुक थीं ।८। वे समस्त नारियाँ यौवन के मद से अधिक अलस और अत्यधिक प्रगल्भ भावों वाली थीं। तथा वे सब आकुलित एवं कामुक अर्थात् कामकेली की वासना से संयुत मनों वाली थीं। कामवासना से रचनात्मक प्रयोग करने में वे वारी बहुत ही निपुण थीं। तथा परिपूर्ण सम्पदा-उदारता-रूप-गुण और शील स्वभाव से समन्वित थीं ।९। संख्या को भी अतिक्रमण करने वाले अर्थात् बहुत ही अधिक घर के कर्मों में बहुत संलग्न रहने पर भी अपने प्राणी पतियों की परिचर्या करने वाली थीं। वह पुर उन नारियों के गुणगणों के लायक ही रूप और शोभा वाले—उद्भासित और सभी ओर से गृहों में सञ्चरण करने वाले पुरुषों से घिरा हुआ था ।१०। वह नगर राजमार्ग, आपण सौध-सोपान-देवालयों के अंगनों

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में समस्त अर्थ गृहों वाले तथा परिपूर्ण कामनाओं से संयुत नागरिकों से चारों ओर अध्यास्यमान था अर्थात् परिगुणशाली पुरवासी सभी ओर निवास कर रहे थे ॥११॥ उस नगर में असंख्य-अनुपम और नाना भाँति के रत्नों से समुज्ज्वलित एवं विचित्र प्रासादों के समुदायों की अवस्थिति थी और वहाँ पर अनेक ऐसे मन्दिर थे जहाँ पर अनेक रथ-अश्व-हाथी खर-उष्ट्र और गौएँ विद्यमान थे ॥१२॥ उस नगर में चारों ओर नरेन्द्र सामन्त-निषाद सादी-पदाति-सेनापति और नायकों के तथा रथी-सारथी-मागध-वन्दीगण और विप्र प्रभृतियों के गृह बने हुए थे ॥१३॥ उस अनुपम नगर में विविक्त अर्थात् खुली हुईं रथ्याएँ थीं—सभी आपण थे जिनके चत्वर बहुत ही विचित्र थे। वहाँ पर अनेक प्रकार की वस्तुओं का क्रय और विक्रय हो रहा था। उस नगर में वारांगनाओं के परम शुभ्र गृहों के समूह विनिर्मित थे जिनके निर्माण करने में बहुत अधिक धन के व्यय से सब सामान भली-भाँति लगाये गये थे ॥१४॥

महार्हरत्नोज्ज्वलतुंगगोपुरैः सह श्वगृधव्रजनर्तनालयैः । चित्रैर्ध्वजैश्चापि पताकिकाभिः शुभ्रैः । पटंमण्डपिकाभिरुन्नतैः ॥१५॥ कल्हारकंजकुमुदोत्पलरेणुवासितैश्चक्राह्वहंसकुररीबक- सारसानाम् । नानारवाढ्यरमणीयतटाकवापीसरोवरैश्चापि जलोप- पन्नैः ॥१६॥ चूतप्रियालपनसाम्रमधूकजंबूलक्षैर्नवैश्च तरुभिश्च कृतालवालैः । पर्यंतरोषितमनोरमनागकेतकीपुन्नागचंपकवनैश्च पतत्रिजुष्टैः ॥१७॥ मंदारकुंदकरवीरमनोज्ञयूथिकाजात्यादिकैर्विविधपुष्प फलैश्च वृक्षैः । संलक्ष्यमाणपरितोपवनालिभिश्च संशोभितं जगति विस्मयनीयरूपैः ॥१८॥

जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ १६६

सर्वर्त्तुकप्रवरसौरभवायुमंदमंदप्रचारिगतिभर्त्सितघर्मकालम् । इत्थं सुरासुरमनोरमभोगसंपद्विस्पष्टमानविभवं नगरं नरेंद्र ॥१९॥ सौभाग्यभोगममितं मुनिहोमधेनुः सद्यो विधाय विनिवेदयदाशु तस्मै । ज्ञात्वा ततो मुनिवरो द्विजहोमधेन्वा संपादितं नरपते रुचिरातिथेयम् ॥२०॥ आहूय कंचन तदंतिकमात्मशिष्यं प्रास्थापयत्सगुण- शालिनमाशु राजन् । गत्वा विशामधिपतेस्तरसा समीपं सप्रश्रयं मुनिसुतस्तमिदं बभाषे ॥२१॥

उस सुरम्य नगर में बहुत ही मूल्यवान् रत्नों से उज्ज्वल एवं समुन्नत गोपुर बने हुए थे तथा श्वा-गृद्धों के समुदायों के बर्त्तन के आलय बने हुए थे। उसमें विचित्र ध्वजाएँ-पताकाएं और शुभ्र पटों से संयुत उन्नत मण्डपिकाएँ विनिर्मित थी ।१५। उस नगर में जल में भरे हुए अनेक तालाब-बावड़ी और सरोवर थे जिनमें अनेक प्रकार की रमणीक ध्वनि हो रही थी तथा वहाँ पर उनका जल कह्लार-कमल-कुमुद और उत्पलों की रेणु से सुवासित था और चक्रवाक-हंस-कुररी-बगुला तथा सारसों की ध्वनियां सुनाई दे रही थीं ।१६। उस नगर में अनेक प्रकार के वृक्ष लगे हुए थे जिनके आलवाल भी बने हुए थे । उन तरुवरों में आम्र-प्रियालपन-मधूक जम्बू और प्लक्ष के वृक्ष थे । वहाँ पर पर्वतों में परम सुन्दर नाग केतुकी पुन्नाग और चम्पक के वन थे जो पक्षियों के द्वारा सेवित थे अर्थात् जिन पर अनेक पक्षी निवास कर रहे थे ।१७। वह नगर अनेक तरह के वृक्षों से शोभित था जिनका स्वरूप जगत् परमाश्चर्य जनक था। वहाँ पर सुसंरक्षित चारों ओर उपवनों की पंक्तियाँ थीं एवं वहाँ अनेक मन्दार-कुन्द-करवीर-सुन्दर यूथिका और जाती आदि के पुष्पों तथा फलों वाले वृक्ष लगे हुए थे ।१८। हे नरेन्द्र ! उस नगर में समस्त ऋतुओं में श्रेष्ठ वसन्त में सुरभित वायु के मन्द-मन्द प्रचलन से घर्म के काल को भर्त्सित कर दिया गया था । इस प्रकार से वह नगर सुरासुरों की परम मनोरम भोगों की सम्पदा के

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विस्पष्टमान वैभव वाला था ।१९। उस मुनि की होम धेनु ने तुरन्त ही अमित सौभाग्य के भोग को करके शीघ्र ही उस महामुनीन्द्र की सेवा में कर दिया था। इसके अनन्तर उन मुनिश्रेष्ठ ने द्विज होम धेनु के द्वारा राजा का परम रुचिर आतिथेय-सम्पादित किया हुआ जान लिया था ।२०। फिर उस मुनींद्र ने अपने किसी गुणशाली शिष्य को बुलाकर हे राजन् ! शीघ्र ही हैययेश्वर के समीप में भेज दिया था। उस मुनि सुत ने शीघ्र वेग से विशों के अधिपति के समीप में गमन करके बहुत ही नम्रता से यह उससे यह कहा था ।२१।

आतिथ्यमस्मदुपपादितमाशु राज्ञासंभावनीयमिति नः कुलेदेशिकाज्ञा ।
राजा ततो मुनिवरेण कृताभ्यनुज्ञः संप्राविशत्पुरवरं स्वकृते कृतं तत् ॥२२॥

सर्वोपभोग्यनिलयं मुनिहोमधेनुसामर्थ्यसूचकमशेषबलैः समेतः ।
अन्तः प्रविश्य नगरर्द्धिमशेषलोकसंमोहिनीमभिसमीक्ष्य स राजवर्यः ॥२३॥

प्रीतिप्रसन्नवदनः सबलस्तु दानी धीरोऽपि विस्मयवाप भृशं तदानीम् ।
गच्छन्सुरस्त्रीनयनालियूथपानैकपात्रोचितचारुमूर्तिः ॥२४॥

रेमे स हैहयपतिः पुरराजमार्गे शक्रः कुबेरवसताविव सामरौघः ।
तं प्रस्थितं राजपथात्समंतात्पौरांगाश्चन्दनवारिसिक्तैः ॥२५॥

प्रसूनलाजाप्रकरैरजस्रमवीवृषन्सौधगताः सुहृद्यैः ।
अभ्यागतार्हणसमुत्सुकपौरकांता हस्तारविंदगलिताम-
ललाजवर्षैः ॥२६॥

कालेयपंकसुरभीकृतनन्दनोत्थशुभ्रप्रसूननिकरै-
रलिवृन्दगीतैः ।

जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ २०१

तत्रत्यपौरवनितांजनरत्नसारमुक्ताभिरप्यनुपदं
प्रविकीर्यमाणः ॥२७
व्यभ्राजतावनिपतिर्विशदैः समंताच्छीतांशुरश्मि-
निकरैरिव मंदराद्रिः।

ब्राह्मीं तपः श्रियमुदारगणामचिंत्यां लोकेषु दुर्लभतरां
स्पृहणीयशोभाम् ॥२८

हमारे कुल गुरुदेव की यह आज्ञा हुई है कि हमारे द्वारा समुपादित आतिथ्य को राजा के द्वारा शीघ्र ही ग्रहण करना चाहिए। इसके पश्चात् राजा ने मुनिवर के द्वारा अनुज्ञा प्राप्त करके उस परम श्रेष्ठ नगर में प्रवेश किया था जोकि अपने ही लिए निर्मित किया गया था ॥२२। वह राजा अपनी सेना के समस्त सैनिकों के सहित उस नगर में प्रविष्ट हुआ था जो कि मुनि की होमधेनु की अत्यद्भुत शक्ति-सामर्थ्य का सूचक था और जो सभी प्रकार के उपभोगों का एक महान विशाल आगार था। अन्दर उस राजा ने भली-भाँति प्रवेश करके सभी लोकों का सम्मोहन करने वाली उस नगर की समृद्धि का अभिसमीक्षण करके अत्यधिक प्रसन्नता प्राप्त की थी ॥२३। उस समय अपनी सेना के सहित परम दानी और महान् धीर उस राजा ने प्रीति से प्रसन्न वदन वाला होकर अत्यधिक विस्मय को प्राप्त किया था। देवों की स्त्रियों के नेत्ररूपी भ्रमरों के यूथों के द्वारा पान करने का एक मात्र पात्र समुचित एवं सुन्दर मूर्ति वाला जिस समय वहाँ गमन कर रहा था। अर्थात् गमन करते हुए देवाङ्गनाएँ अपने नयनों से उसकी सुन्दर मूर्ति का अवलोकन कर रही थी ॥२४। देवगणों के समुदाय के साथ उस राजा हैहयपति ने कुबेर की वसति में महेन्द्र के ही समान पुर के राज मार्ग में परम रमण किया था। राजमार्ग के द्वारा जब प्रस्थान कर रहा था उस समय में सौधों (विशाल महलों) पर स्थित होती हुई पौराङ्गनाओं ने चारों ओर से चन्दन के जल से सिक्त परम सुन्दर प्रसूनों और लाजाओं (खीलों) के प्रकर्रों से निरन्तर उस राजा के ऊपर वर्षा की थी। समागत अतिथि के अर्चन करने में परमाधिक समुत्सुक उस नगर वासियों की अङ्गनाओं के करकमलों से गिरी हुई खीलों की वर्षा हो रही थी। उस समय में होने वाले पङ्क (कीच) से सुगन्धित नन्दन वन में समुत्पन्न पुष्पों की राशियाँ बरसायीं जा रही थीं जिन पर सौरभ से संमोहित भ्रमर-गुञ्जार कर रहे

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थे । वहाँ पर वह राजा वहाँ की वनिताओं के द्वारा अब्जन रत्न सार मुक्ताओं से अनुपद् प्रकीर्यमाण हो रहा था ।२५-२६-२७। वह अवनिपति इस प्रकार की विशद वृत्तियों से चारों ओर विशेष रूप से भ्राजित हुआ था जैसे मन्दराचल चन्द्रमा की किरणों के समुदाय से शोभाशाली हुआ करता है। उस समय अत्यन्त उदार और लोकों में चिन्तन न करने के योग्य ब्राह्मणों की तपश्चर्या का भी अवलोकन राजा ने किया था जो कि अन्य लोकों में महादुर्लभ और स्पृहणीय शोभा से समन्वित थी ।२८।

पश्यन्विशामधिपतिः पुरसंपदं तामुच्चैः शशंस मनसा श्वचसेव राजन् । मेने च हैहयपतिर्भुवि दुर्लभैयं शास्त्री मनोहरतरा सहिता हि संपत् ॥२६

अस्याः शतांशतुलनामपि नोपगंतुं विप्रश्रियं प्रभवतीति सुराचितायाः । मध्येपुरं पुरजनोपचितां विभूतिमालोकयन्सह पुरोहितमंत्रिसार्थैः ॥३०

गच्छन्स्वपार्श्वचरदर्शितवर्णसौधो लेभे मुदं पुरजनैः परिपूज्यमानः । राजा ततो मुनिवरोपचितां सपर्यामात्मानुरूपमिह सानुचरी लभस्व ॥३१

इत्यश्रमेण नृपतिर्विनिवर्त्तयित्वा स्वार्थं प्रकल्पितगृहा- भिमुखो जगाम । पौरैः समेत्य विविधाणपाणिभिश्च मार्गे मुदा विरचितांः अन्जिभिः समंतात् ॥३२

संभावितोऽप्यनुपदं जयशब्दघोषैस्तुर्यारवैश्च बधिरीकृतदिग्विभागः । कक्षांतराणि नृपतिः शनकैरतीत्य त्रीणि क्रमेण च ससंभ्रमकंचुकीनि ॥३३

जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] | २०३

दूरप्रसारितपृथग्जनसंकुलानि सद्याविवेश
सचिवादरदत्तहस्तः ।
तत्र प्रदीपदधिदर्पणगन्धपुष्पदूर्वाक्षतादिभिरलं
पुरकामिनीभिः ॥३४
निर्याय राजभवनांतरात्तः सलीलमानन्दितो नरपति-
र्बहुमान पूर्वम् ।
ताभिः समाभिविनिवेशितमांशु नानारत्न-
प्रवेकरुचिजालविराजमानम् ॥३५

क्षत्रियों के अधिपति ने उस नगर की सम्पदा को देखकर हे राजन् ! वचनों की भांति मन में बहुत ही अधिक प्रशंसा की थी । और हैहयपति ने यह मान लिया था कि भूमण्डल में अधिक मनोहरु हित के सहित क्षत्रियों की सम्पदा ऐसी परम दुर्लभ है । अर्थात् क्षत्रियों की सम्पदा ऐसी कभी भी नहीं हो सकती है ।२६। सुरों के द्वारा समर्पित इस विप्रों की श्री के समक्ष में क्षत्रियों की श्री शतांश की भी तुलना प्राप्त करने में समर्थ नहीं होती है । पुर के मध्य में अपने पुरोहित और मन्त्रियों के साथ में जब उस पुर के निवासियों के द्वारा उपचित विभूतिका आलोकन किया था तब राजा के मन में विप्रश्री की महत्ता का ज्ञान हुआ था ।३०। जिस समय में राजा नगर में भीतर गमन कर रहा था उस समय में अपने पार्श्व में चरण करने वालों के द्वारा सौधों का वर्ग उसे दिखाया गया था तथा वहां के गुरुजनों के द्वारा सभी ओर से वह पूज्यमान हो रहा था और उसको विशेष आनन्द प्राप्त हुआ था । उस समय में राजा से निवेदन किया गया था कि आप अपने सभी अनुचरों के सहित अपने स्वरूप के अनुरूप मुनिवर के द्वारा इस सपर्या का लाभ प्राप्त कीजिए ।३१। फिर राजा अपने स्वार्थ को निर्वार्तित करके प्रकल्पित गृह की ओर अभिमुख होकर वहाँ से चला था। मार्ग में सभी ओर से अनेक प्रकार की पूजा की सामग्री हाथों में ग्रहण किये हुए पुरवासियों ने एकत्रित होकर अपने करों को जोड़कर उसका परमाधिक आतिथ्य सत्कार किया था और पद-पद पर जयकार के शब्दों के घोष से तथा सूर्य की ध्वनि से सभी दिशाओं को बधिर करते हुए उस राजा का नगर निवासियों ने विशेष सम्मान किया था । फिर राजा ने क्रम से तीन अन्य कक्षों का अतिक्रमण किया था जिनमें बड़े ही संभ्रम वाले कञ्चुकी वर्तमान थे ।

२०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

।३२-३३। उन कञ्चुकियों के द्वारा दर्शक जनों के समूहों को अलग दूर में हटा दिया गया था जिस समय में राजा ने अन्दर प्रवेश किया था । सचिव-गण बड़े ही आदर से राजा के पदार्पण करने के लिये हाथों से सङ्केत कर रहे थे । भीतर नगर की कामिनियां विद्यमान थी जो राजा का अर्चन प्रदीपदधि-दर्पण-गन्ध-पुष्प-दूर्वा और अक्षत आदि से विशेष रूप से कर रही थीं ।३४। फिर राजा उस राजभवन के अन्दर से लीला के सहित बहुमान पूर्वक आनन्दित होता हुआ निकला था । वहाँ पर सम वयस्क उन पुर की युवतियों के द्वारा अनेक प्रकार के रत्नों के प्रवेक रुचि के जाल से विराजमान बहुत ही शीघ्र एक उपवेशन करने के लिए आसन निवेशित किया गया था ।३५।

सूक्ष्मोत्तरच्छदमुदारयशा मनोज्ञमध्यारुरोह कनकोत्तर-
विष्टरं तम् ।
तस्मिन्गृहे नृप तदीयपुरंध्रिवर्गः स्वासीनमाशु नृपतिं
विविधार्हणाभिः ॥३६॥

वाद्यादिभिस्तदनु भूषणगंधपुष्पवस्त्राद्यलंकृतिभिरग्र्य-
मुदं ततान ।
तस्मिन्तशेषदिवसोचितकर्म सर्वं निर्वर्त्य हैहयपतिः
स्वमतानुसारम् ॥३७॥

नाना विधायलयनमंविचित्रकेलीसंप्रक्षितैर्दिनमशेषमलं
निनाय ।
कृत्वा दिनांतसमयोचितकर्म चैव राजा स्वमंत्रि-
सचिवानुगतः समंतात् ॥३८॥

आसन्नभृत्यकरसंस्थितदीपकोघसंशांतसंतमसमाशु सदः
प्रपेदे ।
तत्रासने समुपविश्य पुरोधमंत्रिसामंतनायकशतैः
समुपास्यमानः ॥३९॥

अन्वास्त राजसमितौ विविधैर्विनोदैर्हृष्टः सुरेंद्र इव
देवगणैरुपेतः ।

जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ २०५

यातश्चिरं विविधवाद्यविनोदनृत्तोप्रेक्षाप्रवृत्तहसनादिः कथाप्रसंगः ।।४०
आसांचकार गणिकाजननर्महासक्रीडाविलास-
परितोषितचित्तवृत्तिः ।
इत्थं विशामधिपतिर्भृशमानिशार्द्धं नानाविहार-
विभवानुभवैरनेकः ।।४१
स्थित्वानुगान्य रपतीनपि तन्निवासं प्रस्थाप्य वासभवनं स्वयमप्ययासीत् ।
तद्राजसैन्यमखिलं निजवीर्यशौर्यसंपत्प्रभावमहिमानुगुणं गृहेषु ।।४२

वह उदार यश वाला राजा बहुत ही बारीक वस्त्र का छादन जिस पर हो रहा था और नीचे सुवर्ण का विष्टर जिसमें था ऐसे उस परम-मनोहर आसन पर अध्यासिन हो गये थे। हे नृप ! उस गृह में उसकी पुरन्ध्रियों के समुदाय ने अपने आसन पर शीघ्र ही समासीन राजा का अनेक पूजन के उपचारों से अर्चन किया था ।३६। इसके उपरान्त वाद्यों के वादन आदि के द्वारा और भूषण—गन्ध—पुष्प—वस्त्र आदि अलकृतियों से राजा का विशेष आनन्द बढ़ा दिया था। वहाँ पर सम्पूर्ण दिन में होने वाले समुचित कर्म से निवृत्त होकर उस हैहयपति ने अपने मत के अनुसार पूरे दिवस को व्यतीत किया था ।३७। वहाँ पर उस राजा का पूरा दिन अनेक तरह के आलयन-नर्मवचन-विचित्र आनन्द केलियों और भली भाँति प्रेक्षण आदि के समाचरण से व्यतीत हुआ था। फिर जब सन्ध्या का समय हो गया तो उसने दिनान्त में होने वाले उचित कर्मों से निवृत्ति प्राप्त की थी और फिर वह राजा सभी ओर से अपने मन्त्रीगण और सचिवों से अनुगत हो गया था ।३८। समीप में वर्त्तमान भृत्यों के करों में अनेक प्रदीप संस्थित थे जिनसे रात्रिका परम गहन अन्धकार शान्त हो गया था। उस समय में राजा अपनी सभा में प्राप्त हो गया था। वहाँ पर वह अपने आसन पर विराजमान हो गया था और सैकड़ों पुरोहित—मन्त्री—सामन्त और नायकों के द्वारा समुपासित हो रहा था ।३९। उस राज सभा में नानाभाँति के विनोदों से वह परम हर्षित होकर बैठा हुआ था जिस तरह देवगणों से

२०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

समन्वित सुरेन्द्र होवे। इसके अनन्तर बहुत समय तक अनेक वाद्यों का वादन, आमोद-प्रमोद-नृत्य, और प्रेक्षण में प्रवृत्त हास्यविलास तथा कथाओं के प्रसङ्गों में वह प्रसक्त हो गया था ॥४०॥ वहाँ पर गणिकाजनों के साथ प्रणय प्रवर्धक नर्म वचन-हास-क्रीड़ा और विलास से उसने अपने चित्त की वृत्ति को परितोषित किया था। इस रीति से क्षत्रियों के स्वामी उस राजा ने भिक्षा के अर्धभाग को अत्यधिक रूप से अनेक प्रकार के विहार के वैभव के अनुभवों से व्यतीत किया था ॥४१॥ फिर उस राजा ने अपने अनुगामी नरपतियों को रवाना कर स्वयं भी वह अपने भवन में चला गया था। उससे राजा की सेना के जो सैनिक थे वे सभी उन गृहों में अपने शौर्यवीर्य-सम्पत्-प्रभाव और महिमा के ही अनुकूल प्राप्त करने वाले थे ॥४२॥

आत्मानुरूपविभवेषु महार्हवस्त्रस्रग्भूषणादिभिरनं मुदितं बभूव । सैन्यानि तानि नृपतेर्विविधान्नपानसद्भक्ष्यभोज्य- मधुमांसपयोघृतार्थ्यैः ॥४३

तृप्तान्यवाप्सुरखिलानि सुखोपभोगैस्तस्यां नरेंद्रपुरि देवगणा दिवीव । एवं तदा नरपतेरनुयायिनस्ते नानाविधोचितसुखानु- भवप्रतीताः ॥४४

अन्योन्यमूचुरिति गेहधनादिभिर्वा किं साध्यते वयमिहैव वसाम सर्वे । राजापि शार्वरविधानमथो विधाय निर्वर्त्य वासभवने शयनीयमग्र्यम् । अध्यास्य रत्ननिकरैरति शोभि भद्रं निद्रामसेवत नरेंद्र चिरं प्रतीतः ॥४५

वे सब सैनिक गण अपने स्वरूप के अनुरूप वैभवों में वेश कीमती वस्त्र-स्रक् और भूषण आदि के द्वारा अत्यधिक मुदित हुए थे। उस राजा के सैनिक विविध प्रकार के अन्न-पान-अच्छे भक्ष्य-भोज्य-मधु-मांस-पय और घृत आदि से परम तृप्त हो गये थे। उस नरेन्द्र की पुरी में जैसे देवगण

कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की मांग ] [ २०७

स्वर्ग में सब कुछ प्राप्त किया करते हैं उसी भाँति उन्होंने सैनिकों ने भी सुखों के उपभोगों के द्वारा सम्पूर्ण आनन्दप्रद पदार्थों की प्राप्ति की थीं। इस रीति से वे जो उस नृपति के अनुगामी थे वे सब अनेक प्रकार के समुचित सुखों के अनुभव से समाश्वस्त हो गये थे ।४४। वे सब परस्पर में एक दूसरे से कह रहे थे कि अपने घर और धन आदि के द्वारा क्या साधन किया जाता है अर्थात् अपने घरों में यहां से अधिक क्या यहां के समान भी कोई साधन प्राप्त नहीं होते हैं। हम सब तो अब यहां पर निवास करना चाहते हैं। फिर उस राजा ने भी शर्वरी का जो भी कुछ विधान था उसे पूर्ण करके वह भी अपने निवास के भवन में दिव्य शय्या पर पहुँच गये थे। जो शय्या रत्नों के समुदाय के प्रकाश से अतीव शोभित थी और परमोत्तम थी हे नरेन्द्र ! निश्चिन्त होकर चिरकाल पर्यन्त निद्रा के सुख का सेवन किया था ।४५।


कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की मांग

वसिष्ठ उवाच—
स्वपंतमेत्य राजानं सूतमागधबंदिनः ।
प्रबोधयितुमव्यग्रा जगुरुच्चैर्निशात्यये ॥१॥

वीणावेणुरवोन्मिश्रकलतालततानुगम् ।
समस्तश्रुतिसुश्राव्यप्रशस्तमधुरस्वरम् ॥२॥

स्निग्धकंठाः सुविस्पष्टमूर्च्छनाग्रामसूचितम् ।
जगुर्गेयं मनोहारि तारमंद्रलयान्वितम् ॥३॥

ऊचुश्च तं महात्मानं राजानं सूतमागधाः ।
स्वपंतं विविधा वाचो बुबोधयिषवः शनैः ॥४॥

पश्यायमस्तमभ्येति राजेंद्रेंदुः पराजितः ।
विवर्द्धमानया नूनं तव वक्त्रांबुजश्रिया ॥५॥

द्रष्टुं त्वदाननांभोजं समुत्सुक इवाधुना ।
तमांसि भिदन्नादित्यः संप्राप्तो ह्युदयं विभो ॥६॥

राजन्नखिलशीतांशुवंशमौलिशिखामणे ।
निद्रपाशं महाबुद्धे प्रतिबुध्यस्व सांप्रतम् ॥७॥

२०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वसिष्ठ जी ने कहा—जिस समय में राजा शयन कर रहे थे और प्रातःकालीन गाने का समय हो गया था। तो सूत—मागध और वन्दीगण वहाँ पर आकर उपस्थित हो गये थे। निशा के अवमान में उन्होंने अव्यग्र होते हुए राजा को प्रबोध कराने के लिये समुच्च स्वर से गायन किया था ।१। वह उनका गान वीणा-वेणु की ध्वनि से मिला हुआ मधुर और ताल के विस्तार के अनुरूप था तथा समस्तों के श्रवण करने में सुश्राव्य था और परम प्रशस्त एवं मधुर स्वर वाला था ।२। उनका कण्ठ बहुत ही स्निग्ध था। ऐसे उन्होंने विशेष रूप से सुस्पष्ट मूर्च्छना और ग्राम से संयुत था। तार (अत्युच्च) और मन्द्र लव से समन्वित बहुत ही मन को हरण करने वाला गान उन्होंने गाया था ।३। राजा को जगाने की इच्छा रखने वाले उन सूतों और मागधों ने सोते हुए उस महान् आत्मा वाले राजा से धीरे-धीरे कहा था ।४। हे राजेन्द्र ! इस समय में यह चन्द्र पराजित होकर अस्त को प्राप्त हो रहा है क्योंकि आपकी बढ़ी हुई मुख कमल की शोभा से इसका पराजय हो गया है। अब आप प्रबुद्ध होकर इसका अवलोकन कीजिए ।५। हे विभो ! इस समय में आपके मुख कमल को देखने के लिये बहुत ही उत्सुक की भाँति अन्धकारों का भेदन करता हुआ सूर्य देव उदय को प्राप्त हो गये हैं ।६। हे राजन् ! आप तो समस्त चन्द्र वंश के प्रमुखों में भी सर्व शिरोमणि हैं। अब आप अपनी निद्रा का त्याग कर जाग्रत हो जाइये ।

इति तेषां वचः शृण्वन्बुध्यत महीपतिः । क्षीराब्धौ शेषशयनाद्यथापंकजलोचनः ।।८ विनिद्राक्षः समुत्थाय कर्म नैत्यकमादरात् । चकारावहितः सम्यग्जयादिकमशेषतः ।।९ देवतामभिवंद्येष्टां यां दिव्यस्रग्गंधभूषणः । कृत्वा दूर्वांजनादर्शमंगल्यालम्बनानि च ।।१० दत्त्वा दानानि चार्थिभ्यो नत्वा गोब्राह्मणानपि । निष्क्रम्य च पुरातस्मादुपतस्थे च भास्करम् ।।११ तावदभ्याययुः सर्वे मंत्रिसामंतनायकाः । रचितांजलयो राजन्निमुञ्च नृपसत्तमम् ।।१२ ततः स तैः परिवृतः समुपैत्य तपोनिधिम् ।

कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की मांग ] [ २०९

ननाम पादयोस्तस्य किरीटेनार्कवर्चसा ॥१३॥
आशीर्भिरभिनन्द्याथ राजानं मुनिपुंगवः ।
प्रश्रयावनतं साम्ना समुवाचास्यतामिति ॥१४॥

इस प्रकार के उन मागध बन्दियों के वचनों का श्रवण करके वह महीपति क्षीर सागर में शेषभाग की शय्या के पंकज लोचन भगवान् नारायण के समान ही प्रति बुद्ध हो गये थे ।८। निद्रा से रहित नेत्रों वाला होकर फिर उस नृपति ने परम सावधान होते हुए जय आदिक जो सम्पूर्ण दैनिक कर्म थे उनको किया था और बहुत ही समादर पूर्वक सम्पन्न किये थे ।६। फिर उस राजा ने अपने अभीष्ट गो देवता की अभिवन्दना करके वह स्वयं दिव्य गन्ध-माला और भूषणों से समन्वित हुआ था और समस्त माङ्गल्य दूर्वा-अञ्जन और आदर्श आदि अवलम्बनों को ग्रहण किया था ।१०। उसने लोभी याचकगण वहाँ पर समुपस्थित हुए थे उनको दान दिया था—गौ और ब्राह्मणों को प्रणाम किया था तथा उस पुर से बाहिर निकल कर भगवान् भुवन भास्कर का उपस्थान किया था ।११। उसी समय में तब तक सभी मन्त्री, समस्त और नायक वहाँ पर आ गये थे । उन्होंने अपनी करों की अञ्जलयों को जोड़कर हे राजन् ! उस नृपों में श्रेष्ठ के लिए अभिवादन किया था ।१२। इसके उपरान्त उन सबके साथ सबसे संयुत वह राजा तप के निधि मुनिवर के समीप में उपस्थित हुआ था और अपने मस्तक को झुकाकर निज शिर पर सूर्य के वर्चस वाला किरीट पहिने हुए था महामुनि के चरणों में प्रणिपात किया था ।१३। मुनियों में परम श्रेष्ठ उस मुनीन्द्र ने इसके अनन्तर आशीर्वादों के द्वारा राजा का अभिनन्दन किया था और जो विनम्रता से नीचे की ओर अवनत हो रहा था उस राजा से परम शान्ति पूर्ण वचन से कहा था आप यहाँ पर बैठ जाइये ।१४।

तमासीनं नरपति महर्षिः प्रीतमानसः ।
उवाच रजनी व्युष्टा सुखेन तव किं नृप ॥१५॥
अस्माकमेव राजेन्द्रवने वन्येन जीवताम् ।
शक्यं मृगसधर्माणं येम केनापि वर्तितुम् ॥१६॥
अरण्ये नागराणां तु स्थितिरत्यंतदुःसहा ।
अनभ्यस्तं हि राजेन्द्र ननु सर्वं हि दुष्करम् ॥१७॥

२१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वनवासपरिक्लेशं भावान्यत्सानुगोऽसकृत् । आप्तस्तु भवतो नूनं सा गौरवसमुन्नतिः ॥१८॥ इत्युक्तस्तेन मुनिना स राजा प्रीतिपूर्वकम् । प्रहसन्निव तं भूयो वचनं प्रत्यभाषत ॥१९॥ ब्रह्मन्किमनया ह्युक्त्या दृष्टस्ते यादृशो महान् । अस्माभिर्महिमा येन विस्मितं सकलं जगत् ॥२०॥ भवत्प्रभावसंजातविभवाहृतचेतसः । इतो न गंतुमिच्छंति सैनिका मे महामुनि ॥२१॥

जब राजा वहाँ पर आसीन हो गये थे तब बड़े ही प्रीतियुक्त मन वाले महर्षि ने उस नरपति से कहा था—हे नृप ! कहिए क्या आपकी रात्रि तो सुख पूर्वक व्यतीत हुई है ? ।१५। हे राजेन्द्र ! इस वन में पशु के ही समान धर्म वाले हमारा तो वन में समुत्पन्न वस्तुओं से ही जीवन यापन होता है और जिस-किसी भी प्रकार से वृत्ति की जा सकती है ।१६। ऐसे महारण्य में जो नगरों में निवास करने वाले हैं उनकी स्थिति तो बहुत ही दुःसह हुआ करती है । हे राजन् ! कारण यही है कि नागरिक पुरुषों का ऐसे अरण्य-जीवन का कभी कभी अभ्यास नहीं होता है और यह सब महान कठिन ही होता है ।१७। आपने इस वनवास के परिक्लेश को अपने समस्त अनुगामियों के साथ में अनेक बार प्राप्त किया है । निश्चय ही आपके लिए यह गौरव ही समुन्नति है ।१८। इस रीति से जब यह उस राजा से मुनिवर ने कहा था तो उस राजा ने प्रीति के साथ कुछ मुस्कराते हुए पुनः उस मुनिवर को इसका उत्तर दिया था ।१९। राजा ने मुनिवर से कहा था—हे ब्रह्मन् ! आपको इस उक्ति से क्या है अर्थात् आपने जो यह कथन किया है उसका क्या अभिप्राय है समझ में नहीं आता है । हम लोगों ने तो आपकी जो महान् महिमा स्वयं अपने नेत्रों से देखी है वह तो परम अद्भुत है और उससे तो सम्पूर्ण जगत को ही बड़ा विस्मय होता है ।२०। हे महामुने ! आपके तप के प्रभाव से जो यहाँ पर महान वैभव समुत्पन्न हुआ है उससे प्रभावित चित्त वाले ये मेरे सभी सैनिक तो यहाँ से अन्यत्र गमन करने की इच्छा नहीं करते हैं ।२१।

त्वादृशानां जगंतीह प्रभावंस्तपसां विभो । ध्रियंते सर्वदा नूनमचिंत्यं ब्रह्मवर्चसम् ॥२२॥

कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की माँग ] [ २११

नैव चित्रं तव विभो शक्नोति तपसा भवान् ।
ध्रुवं कर्तुं हि लोकानामवस्थात्रितयं क्रमात् ॥२३
सुदृष्टा ते तपः सिद्धिर्महती लोकपूजिता ।
गमिष्यामि पुरीं ब्रह्मन्ननुजानातु मां भवान् ॥२४
वसिष्ठ उवाच—
इत्युक्तस्तेन स मुनिः कार्त्तवीर्येण सादरम् ।
संभावयित्वा नितरां तथेति प्रत्यभाषत ॥२५
मुनिना समनुज्ञातो विनिष्क्रम्य तदाश्रमात् ।
सैन्यैः परिवृतः सर्वैः संप्रतस्थे पुरीं प्रति ॥२६
स गच्छंश्चितयामास मनसा पथि पार्थिवः ।
अहोऽस्य तपसः सिद्धिर्लोकविस्मयदायिनी ॥२७
यया लब्धैदृशी धेनुः सर्वकामदुहां वरा ।
किं मे सकलराज्येन योगद्धर्या वाप्यनल्पया ॥२८

हे विभो ! इस जगती तल में आप जैसे महा पुरुषों के तपों के प्रभावों से ही निश्चित रूप से सर्वदा ब्राह्मणों के वर्चस् को नित्य ही धारण किया करते हैं ।२२। हे विभो ! इसमें कुछ भी विचित्रता नहीं है । आप अपने तप के द्वारा लोकों की क्रम से तीनों अवस्थाओं को ध्रुवकर सकते हैं ।२३। हमने आपको लोकों में पूजित महान् तप की सिद्धि भली भाँति देखती हैं । हे ब्रह्मन् ! मैं अब अपनी नगरी में जाऊँगा अतः आप मुझे गमन करने के लिए अपना आदेश प्रदान कीजिए ।२४। वसिष्ठ जी ने कहा—जल कार्त्त-वीर्य राजा के द्वारा जब इस प्रकार से उन महामुनि से सादर प्रार्थना की गयी थी तो मुनि ने बहुत कुछ सत्कार करके यही उत्तर दिया था कि यदि आप जाना ही चाहते हैं तो स्वेच्छया गमन कीजिए ।२५। उस महामुनि से अनुज्ञा प्राप्त करने वाले राजा ने उनके आश्रम से बाहिर निकल कर समस्त सेनाओं से परिवृत होते हुए अपनी पुरी की ओर प्रस्थान कर दिया था ।२६। मार्ग में गमन करने के समय में उस राजा ने अपने मन में विचार किया था कि ओहो ! इस मुनि की तपश्चर्या को कैसी अद्भुत शक्ति है जो सभी लोकों को विस्मय देने वाली है ।२७। जिस तपश्चर्या की सिद्धि से ऐसी

२१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

समस्त इच्छाओं की पूर्ति करने वाली धेनुओं से भी परमश्रेष्ठ धेनु प्राप्त की है। इस मेरे सम्पूर्ण राज्य के महान् वैभव से भी क्या हो सकता है और अनल्प योग की ऋद्धि से भी कुछ नहीं हो सकता है। अर्थात् इस मेरे महान् विशाल राज्य का वैभव तथा योग द्वारा ऋद्धि का वैभव भी इसके सामने तुच्छ है ।२८।

गोरत्नभूता यदिदं धेनुर्मु निवरे स्थिता । अनयोत्पादिता नूनं संपत्स्वर्गसदामपि ॥२६ ऋद्धमैन्द्रमपि व्यक्तं पदं त्रैलोक्यपूजितम् । अस्या धेनोरहं मन्ये कलां नार्हति षोडशीम् ॥३० इत्येवं चिंतयानं तं पश्चादभ्येत्य पार्थिवम् । चन्द्रगुप्तोऽब्रवीन्मंत्री कृतांजलिपुटस्तदा ॥३१ किमर्थं राजशार्दूल पुरीं तिगमिष्यसि । रक्षितेन च राज्येन पुर्या वा कि फलं तव ॥३२ गोरत्नभूता नृपतेर्याविद्ध नूनं चालये । वर्त्तते नार्द्धमपि ते राज्यं शून्यं तव प्रभो ॥३३ अन्यच्च दृष्टमाश्चर्यं मया राजञ्छृणुष्व तत् । भवनानि मनोज्ञानि मनोज्ञाश्च तथा स्त्रियः ॥३४ प्रसादा विविधाकारा धनं चादृष्टसंक्षयम् । धेनो तस्यां क्षणेनैव विलीनं पश्यतो मम ॥३५

कारण यही है कि समस्त धेनुओं में रत्न के सदृश यह धेनु इस मुनिवर के समीप में संस्थित है। इसके ही द्वारा स्वर्ग में निवास करने वालों की भी सम्पदा उत्पादित की गयी है यह निश्चित है ।२६। यह माना जाता है कि महेन्द्र का पद अर्थात् स्थान परम ऋद्धियों से परिपूर्ण है तथा यह तीनों लोकों में पूजित होता है क्योंकि सर्वतोभाव से यह परम समृद्ध होता है किन्तु मैं तो ऐसा मानता हूँ कि वह इन्द्र का वैभव भी इस धेनु की शक्ति से समुत्पादित वैभव के सामने सोलहवाँ भाग भी नहीं है ।३०। राजा इसी प्रकार से अपने मन में चिन्तन कर रहा था उस राजा के पीछे से आकर मन्त्री चन्द्रगुप्त ने उस समय में हाथ जोड़कर उस राजा से कहा था ।३१। हे राज शार्दूल ! आप किस लिए अपनी पूरी की ओर गमन कर रहे हैं ?

कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की मांग ] [ २१३

आपका राज्य और पुरी तो परम सुरक्षित है अतः वहां पर पुरी में गमन करने से क्या फल होगा ? अर्थात् इसी समय वहाँ गमन व्यर्थ ही है ।३२। हे प्रभो ! यह रत्नभूता गो जब तक आप सरीखे राजा के घर में न होवे तब तक आपका सम्पूर्ण राज्य इसके वैभव के सामने आधा भी नहीं है और यों ही कहना उचित है कि आपका पूरा राज्य एक प्रकार से शून्य हीं है ।३३। हे राजन् ! मैंने एक और भी महान् आश्चर्य देखा था, उसका भी आप श्रवण कीजिए । उस धेनु ने अपनी अद्भुत शक्ति से बड़े-बड़े मनोज्ञ भवन समुत्पादित किये थे वे सब और परम सुन्दरी स्त्रियाँ जो थीं तथा अनेक भाँति के आकार-प्रकार वाले जो महल अर्थात् विशाल भवन थे एवं जो कभी भी क्षीण होने वाला नहीं देखा गया था वह धन सभी कुछ एक ही क्षण में उसी धेनु में मेरे देखते-देखते विलीन हो गये थे ।३४-३५।

तत्तपोवनमेवासीदिदानीं राजसत्तम । एवंप्रभावा सा यस्य तस्य किं दुर्लभं भवेत् ॥३६ तस्माद्रत्नार्हसत्त्वेन स्वीकर्त्तव्या हि गौस्त्वया । यदि तेऽनुमतं कृत्यमाख्येयमनुजीविभिः ॥३७ राजोवाच—एवमेवाहमप्येनां न जानामीत्यसांप्रतम् । ब्रह्मस्वं नापहर्त्तव्यमिति मे शङ्कते मनः ॥३८ एवं ब्रुवंतं राजानमिदमाह पुरोहितः । गर्गो मतिमतां श्रेष्ठो गर्हयन्निव भूपते ॥३९ ब्रह्मस्वं नापहर्त्तव्यमापद्यपि कथंचन । ब्रह्मस्वसदृशं लोके दुर्जरं नेह विद्यते ॥४० विषं हंत्युपयोक्तारं लक्ष्यभूतं तु हैहय । कुलं समूलं दहति ब्रह्मस्वारणिपावकः ॥४१ अनिवार्यमिदं लोके ब्रह्मस्वं दुर्जरं विषम् । पुत्रपौत्रान्तफलदं विपाककटु पार्थिव ॥४२

हे श्रेष्ठ राजन् ! इस समय में वही तपोवन था जिसमें इस रीति के प्रभाव वाली वह धेनु विद्यमान है । उस व्यक्ति को इस जगत् में क्या पदार्थ दुर्लभ है अर्थात् उस को कुछ भी दुर्लभ नहीं होता है ।३६। इस कारण से आप तो सभी रत्नों के रखने के योग्य बल-विक्रम वाले हैं । आपको यह गौ

२१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स्वीकार करनी चाहिए अर्थात् उस धेनु को आप ग्रहण कर लीजिए। यदि यह कार्य आपको पसन्द हो तो इसको अपने अनुजीवियों के द्वारा कहलवा देना चाहिए। ३७। इस प्रकार से मैं भी इसको नहीं जानता हूँ। किन्तु यह सब आपका कथन अयुक्त है। चाहे कितनी ही आपत्ति क्यों न उपस्थित हो जावे, ऐसे आपत्काल में भी ब्राह्मणों के धन का कभी भी आहरण नहीं करना चाहिए। मेरा मन परम शङ्कित रहा करता है। ३८। इस रीति से जिस समय में राजा कह रहा था उस समय में राजा के पुरोहित ने राजा से यह कहा था—हे भूपते ! मतिमानों में परम श्रेष्ठ गर्ग मुनि ने ऐसे कर्म की निन्दा करते हुए यही कहा था। ३६। आपत्ति काल में भी कभी ब्राह्मणों के धन का किसी भी तरह से अपहरण नहीं करना चाहिए। इस लोक में ब्रह्मस्व के समान अन्य कुछ भी दुर्जर अर्थात् बुरा कर्म नहीं होता है। ४०। हे हैहय ! विष भी मारक होता है किन्तु वह अपने उपभोक्ता को ही जो कि उसका लक्ष्य भूत है मारता है किन्तु ब्राह्मणों का धन रूपी पावक मूल के सहित सम्पूर्ण कुल को भस्मीभूत कर दिया करता है। ४१। हे पार्थिव ! लोक में यह बड़ा भारी आश्चर्य से संयुत है कि ब्रह्मस्व अनिवार्य रूप से महान् दुर्जर विष है। यह तो केवल ग्रहण करने वाले को ही नहीं प्रत्युत उसके सभी पुत्र-पौत्र आदि का विनाश कर देने वाला है और विपाक में महान कटु होता है। ४२।

ऐश्वर्यमूढं हि मनः प्रभूणामसदात्मनाम् ।
किन्नामासन्न कुरुते नेत्रासद्विप्रलोभितम् ॥४३
वेदान्यस्त्वामृते कोऽन्यो विना दानान्नृपोत्तम ।
आदानं चितयानो हि ब्राह्मणेष्वभिवाञ्छति ॥४४
ईदृशंत्वं महाबाहो कर्म सज्जननिन्दितम् ।
मा कृथास्तद्धि लोकेषु यशोहानिकरं तव ॥४५
वंशे महति जातस्त्वं वदान्यानां महीभुजाम् ।
यशांसि कर्मणानेन सांप्रतं मा व्यनीनशः ॥४६
अहोऽनुजीविनः किञ्चिद्भर्तारं व्यसनार्णवे ।
तत्प्रसादसमुन्नद्धा मज्जयन्त्यनयोन्मुखाः ॥४७
श्रिया विकुर्वन्पुरुषकृत्यर्चित्ये विचेतनः ।

कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की मांग ] [ २१५

तन्मतानुप्रवृत्तिश्च राजा सद्यो विषीदति ॥४८ अज्ञातनयनयो मंत्री राजानमनयांबुधौ। आत्मना सह दुर्बुद्धिलोंहनौरिव मज्जयेत् ॥४९

असत् आत्माओं वाले प्रभुओं का मन ऐश्वर्य की वृद्धि करने में महान् मूढ़ हुआ करता है। वे बहुधा नेत्रों से बुरे कर्मों को देखते हुए भी विशेष रूप से प्रलोभित उनका मन क्या-क्या असत् कर्म नहीं किया करता है अर्थात् ऐसे बहुत से बुरे कर्म हैं जिनको उनका मन करने में थोड़ा भी शङ्कित नहीं होकर किया करता है ॥४३॥ हे उत्तम नृप ! आपको छोड़कर अन्य ऐसा कौन है जो यह नहीं जानता है कि ब्राह्मणों को तो अपनी ओर से दान ही दिया जाता है। दान के देने के अतिरिक्त उनसे कुछ ग्रहण करना ब्राह्मणों के विषय में चाहता हो। तात्पर्य यही है कि आप ब्राह्मणों को दान देने के महत्व को भली भाँति जानते हैं और उनसे किसी वस्तु का ग्रहण नहीं किया जाता है यह भी अच्छी तरह से समझते हैं-इस विषय में आपके समान अन्य कोई भी ज्ञाता नहीं है ॥४४॥ हे महान् बाहुओं वाले ! आप तो इस तरह के पूर्ण ज्ञाता महा पुरुष हैं। फिर ऐसे सज्जनों के द्वारा विशेष निन्दित ऐसे कर्म को कभी मत करिए क्योंकि ऐसा बुरा कर्म लोक में आपके सुयश की हानि के ही करने वाला होगा ॥४५॥ हे राजन् ! आप महान् दानी राजाओं के वंश में समुत्पन्न हुए हैं। अतएव आपका विशाल यश है। अब इस असत् कर्म के द्वारा अपने यश का विनाश मत करिये ॥४६॥ अहो ! अर्थात् बड़े ही आश्चर्य की बात तो यह है कि ये अनुजीवी लोग जोकि अपने ही स्वामी के परम प्रसाद से समुच्च हो गये हैं वे ऐसी अनीति की ओर उन्मुख हो रहे हैं कि वे उसी अपने स्वामी व्यसनों के सागर में डुबा रहे हैं ॥४७॥ श्री सम्पन्नता होने के कारण से ऐसा मनुष्य ज्ञान शून्य हो गया है कि अचिन्तनीय पुरुष के कृत्य को भी करने के लिये उतारू हो जाता है। ऐसे मनुष्यों के मत के अनुसार प्रवृत्ति रखने वाला राजा तुरन्त ही दुःखों को भोगा करता है ॥४८॥ जो मन्त्री सुन्दर नीति को नहीं जानता है वह दुष्ट बुद्धि वाला मन्त्री लोहे की नौका की ही भाँति अपने राजा को भी अनीति के सागर में निमग्न करा दिया करता है ॥४९॥

तस्मात्त्वं राजशार्दूल मूढस्य नयवर्त्मनि । मतमस्य सुदुर्बुद्धे र्नानुवर्त्तितुमर्हसि ॥५०॥