संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वनवासपरिक्लेशं भावान्यत्सानुगोऽसकृत् । आप्तस्तु भवतो नूनं सा गौरवसमुन्नतिः ॥१८॥ इत्युक्तस्तेन मुनिना स राजा प्रीतिपूर्वकम् । प्रहसन्निव तं भूयो वचनं प्रत्यभाषत ॥१९॥ ब्रह्मन्किमनया ह्युक्त्या दृष्टस्ते यादृशो महान् । अस्माभिर्महिमा येन विस्मितं सकलं जगत् ॥२०॥ भवत्प्रभावसंजातविभवाहृतचेतसः । इतो न गंतुमिच्छंति सैनिका मे महामुनि ॥२१॥
जब राजा वहाँ पर आसीन हो गये थे तब बड़े ही प्रीतियुक्त मन वाले महर्षि ने उस नरपति से कहा था—हे नृप ! कहिए क्या आपकी रात्रि तो सुख पूर्वक व्यतीत हुई है ? ।१५। हे राजेन्द्र ! इस वन में पशु के ही समान धर्म वाले हमारा तो वन में समुत्पन्न वस्तुओं से ही जीवन यापन होता है और जिस-किसी भी प्रकार से वृत्ति की जा सकती है ।१६। ऐसे महारण्य में जो नगरों में निवास करने वाले हैं उनकी स्थिति तो बहुत ही दुःसह हुआ करती है । हे राजन् ! कारण यही है कि नागरिक पुरुषों का ऐसे अरण्य-जीवन का कभी कभी अभ्यास नहीं होता है और यह सब महान कठिन ही होता है ।१७। आपने इस वनवास के परिक्लेश को अपने समस्त अनुगामियों के साथ में अनेक बार प्राप्त किया है । निश्चय ही आपके लिए यह गौरव ही समुन्नति है ।१८। इस रीति से जब यह उस राजा से मुनिवर ने कहा था तो उस राजा ने प्रीति के साथ कुछ मुस्कराते हुए पुनः उस मुनिवर को इसका उत्तर दिया था ।१९। राजा ने मुनिवर से कहा था—हे ब्रह्मन् ! आपको इस उक्ति से क्या है अर्थात् आपने जो यह कथन किया है उसका क्या अभिप्राय है समझ में नहीं आता है । हम लोगों ने तो आपकी जो महान् महिमा स्वयं अपने नेत्रों से देखी है वह तो परम अद्भुत है और उससे तो सम्पूर्ण जगत को ही बड़ा विस्मय होता है ।२०। हे महामुने ! आपके तप के प्रभाव से जो यहाँ पर महान वैभव समुत्पन्न हुआ है उससे प्रभावित चित्त वाले ये मेरे सभी सैनिक तो यहाँ से अन्यत्र गमन करने की इच्छा नहीं करते हैं ।२१।
त्वादृशानां जगंतीह प्रभावंस्तपसां विभो । ध्रियंते सर्वदा नूनमचिंत्यं ब्रह्मवर्चसम् ॥२२॥