संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकार्तिकेय द्वारा कामधेनु की मांग ] [ २०९
ननाम पादयोस्तस्य किरीटेनार्कवर्चसा ॥१३॥
आशीर्भिरभिनन्द्याथ राजानं मुनिपुंगवः ।
प्रश्रयावनतं साम्ना समुवाचास्यतामिति ॥१४॥
इस प्रकार के उन मागध बन्दियों के वचनों का श्रवण करके वह महीपति क्षीर सागर में शेषभाग की शय्या के पंकज लोचन भगवान् नारायण के समान ही प्रति बुद्ध हो गये थे ।८। निद्रा से रहित नेत्रों वाला होकर फिर उस नृपति ने परम सावधान होते हुए जय आदिक जो सम्पूर्ण दैनिक कर्म थे उनको किया था और बहुत ही समादर पूर्वक सम्पन्न किये थे ।६। फिर उस राजा ने अपने अभीष्ट गो देवता की अभिवन्दना करके वह स्वयं दिव्य गन्ध-माला और भूषणों से समन्वित हुआ था और समस्त माङ्गल्य दूर्वा-अञ्जन और आदर्श आदि अवलम्बनों को ग्रहण किया था ।१०। उसने लोभी याचकगण वहाँ पर समुपस्थित हुए थे उनको दान दिया था—गौ और ब्राह्मणों को प्रणाम किया था तथा उस पुर से बाहिर निकल कर भगवान् भुवन भास्कर का उपस्थान किया था ।११। उसी समय में तब तक सभी मन्त्री, समस्त और नायक वहाँ पर आ गये थे । उन्होंने अपनी करों की अञ्जलयों को जोड़कर हे राजन् ! उस नृपों में श्रेष्ठ के लिए अभिवादन किया था ।१२। इसके उपरान्त उन सबके साथ सबसे संयुत वह राजा तप के निधि मुनिवर के समीप में उपस्थित हुआ था और अपने मस्तक को झुकाकर निज शिर पर सूर्य के वर्चस वाला किरीट पहिने हुए था महामुनि के चरणों में प्रणिपात किया था ।१३। मुनियों में परम श्रेष्ठ उस मुनीन्द्र ने इसके अनन्तर आशीर्वादों के द्वारा राजा का अभिनन्दन किया था और जो विनम्रता से नीचे की ओर अवनत हो रहा था उस राजा से परम शान्ति पूर्ण वचन से कहा था आप यहाँ पर बैठ जाइये ।१४।
तमासीनं नरपति महर्षिः प्रीतमानसः ।
उवाच रजनी व्युष्टा सुखेन तव किं नृप ॥१५॥
अस्माकमेव राजेन्द्रवने वन्येन जीवताम् ।
शक्यं मृगसधर्माणं येम केनापि वर्तितुम् ॥१६॥
अरण्ये नागराणां तु स्थितिरत्यंतदुःसहा ।
अनभ्यस्तं हि राजेन्द्र ननु सर्वं हि दुष्करम् ॥१७॥