भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 204

२०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वसिष्ठ जी ने कहा—जिस समय में राजा शयन कर रहे थे और प्रातःकालीन गाने का समय हो गया था। तो सूत—मागध और वन्दीगण वहाँ पर आकर उपस्थित हो गये थे। निशा के अवमान में उन्होंने अव्यग्र होते हुए राजा को प्रबोध कराने के लिये समुच्च स्वर से गायन किया था ।१। वह उनका गान वीणा-वेणु की ध्वनि से मिला हुआ मधुर और ताल के विस्तार के अनुरूप था तथा समस्तों के श्रवण करने में सुश्राव्य था और परम प्रशस्त एवं मधुर स्वर वाला था ।२। उनका कण्ठ बहुत ही स्निग्ध था। ऐसे उन्होंने विशेष रूप से सुस्पष्ट मूर्च्छना और ग्राम से संयुत था। तार (अत्युच्च) और मन्द्र लव से समन्वित बहुत ही मन को हरण करने वाला गान उन्होंने गाया था ।३। राजा को जगाने की इच्छा रखने वाले उन सूतों और मागधों ने सोते हुए उस महान् आत्मा वाले राजा से धीरे-धीरे कहा था ।४। हे राजेन्द्र ! इस समय में यह चन्द्र पराजित होकर अस्त को प्राप्त हो रहा है क्योंकि आपकी बढ़ी हुई मुख कमल की शोभा से इसका पराजय हो गया है। अब आप प्रबुद्ध होकर इसका अवलोकन कीजिए ।५। हे विभो ! इस समय में आपके मुख कमल को देखने के लिये बहुत ही उत्सुक की भाँति अन्धकारों का भेदन करता हुआ सूर्य देव उदय को प्राप्त हो गये हैं ।६। हे राजन् ! आप तो समस्त चन्द्र वंश के प्रमुखों में भी सर्व शिरोमणि हैं। अब आप अपनी निद्रा का त्याग कर जाग्रत हो जाइये ।

इति तेषां वचः शृण्वन्बुध्यत महीपतिः । क्षीराब्धौ शेषशयनाद्यथापंकजलोचनः ।।८ विनिद्राक्षः समुत्थाय कर्म नैत्यकमादरात् । चकारावहितः सम्यग्जयादिकमशेषतः ।।९ देवतामभिवंद्येष्टां यां दिव्यस्रग्गंधभूषणः । कृत्वा दूर्वांजनादर्शमंगल्यालम्बनानि च ।।१० दत्त्वा दानानि चार्थिभ्यो नत्वा गोब्राह्मणानपि । निष्क्रम्य च पुरातस्मादुपतस्थे च भास्करम् ।।११ तावदभ्याययुः सर्वे मंत्रिसामंतनायकाः । रचितांजलयो राजन्निमुञ्च नृपसत्तमम् ।।१२ ततः स तैः परिवृतः समुपैत्य तपोनिधिम् ।