भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की मांग ] [ २०७

स्वर्ग में सब कुछ प्राप्त किया करते हैं उसी भाँति उन्होंने सैनिकों ने भी सुखों के उपभोगों के द्वारा सम्पूर्ण आनन्दप्रद पदार्थों की प्राप्ति की थीं। इस रीति से वे जो उस नृपति के अनुगामी थे वे सब अनेक प्रकार के समुचित सुखों के अनुभव से समाश्वस्त हो गये थे ।४४। वे सब परस्पर में एक दूसरे से कह रहे थे कि अपने घर और धन आदि के द्वारा क्या साधन किया जाता है अर्थात् अपने घरों में यहां से अधिक क्या यहां के समान भी कोई साधन प्राप्त नहीं होते हैं। हम सब तो अब यहां पर निवास करना चाहते हैं। फिर उस राजा ने भी शर्वरी का जो भी कुछ विधान था उसे पूर्ण करके वह भी अपने निवास के भवन में दिव्य शय्या पर पहुँच गये थे। जो शय्या रत्नों के समुदाय के प्रकाश से अतीव शोभित थी और परमोत्तम थी हे नरेन्द्र ! निश्चिन्त होकर चिरकाल पर्यन्त निद्रा के सुख का सेवन किया था ।४५।


कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की मांग

वसिष्ठ उवाच—
स्वपंतमेत्य राजानं सूतमागधबंदिनः ।
प्रबोधयितुमव्यग्रा जगुरुच्चैर्निशात्यये ॥१॥

वीणावेणुरवोन्मिश्रकलतालततानुगम् ।
समस्तश्रुतिसुश्राव्यप्रशस्तमधुरस्वरम् ॥२॥

स्निग्धकंठाः सुविस्पष्टमूर्च्छनाग्रामसूचितम् ।
जगुर्गेयं मनोहारि तारमंद्रलयान्वितम् ॥३॥

ऊचुश्च तं महात्मानं राजानं सूतमागधाः ।
स्वपंतं विविधा वाचो बुबोधयिषवः शनैः ॥४॥

पश्यायमस्तमभ्येति राजेंद्रेंदुः पराजितः ।
विवर्द्धमानया नूनं तव वक्त्रांबुजश्रिया ॥५॥

द्रष्टुं त्वदाननांभोजं समुत्सुक इवाधुना ।
तमांसि भिदन्नादित्यः संप्राप्तो ह्युदयं विभो ॥६॥

राजन्नखिलशीतांशुवंशमौलिशिखामणे ।
निद्रपाशं महाबुद्धे प्रतिबुध्यस्व सांप्रतम् ॥७॥