संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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समन्वित सुरेन्द्र होवे। इसके अनन्तर बहुत समय तक अनेक वाद्यों का वादन, आमोद-प्रमोद-नृत्य, और प्रेक्षण में प्रवृत्त हास्यविलास तथा कथाओं के प्रसङ्गों में वह प्रसक्त हो गया था ॥४०॥ वहाँ पर गणिकाजनों के साथ प्रणय प्रवर्धक नर्म वचन-हास-क्रीड़ा और विलास से उसने अपने चित्त की वृत्ति को परितोषित किया था। इस रीति से क्षत्रियों के स्वामी उस राजा ने भिक्षा के अर्धभाग को अत्यधिक रूप से अनेक प्रकार के विहार के वैभव के अनुभवों से व्यतीत किया था ॥४१॥ फिर उस राजा ने अपने अनुगामी नरपतियों को रवाना कर स्वयं भी वह अपने भवन में चला गया था। उससे राजा की सेना के जो सैनिक थे वे सभी उन गृहों में अपने शौर्यवीर्य-सम्पत्-प्रभाव और महिमा के ही अनुकूल प्राप्त करने वाले थे ॥४२॥
आत्मानुरूपविभवेषु महार्हवस्त्रस्रग्भूषणादिभिरनं मुदितं बभूव । सैन्यानि तानि नृपतेर्विविधान्नपानसद्भक्ष्यभोज्य- मधुमांसपयोघृतार्थ्यैः ॥४३
तृप्तान्यवाप्सुरखिलानि सुखोपभोगैस्तस्यां नरेंद्रपुरि देवगणा दिवीव । एवं तदा नरपतेरनुयायिनस्ते नानाविधोचितसुखानु- भवप्रतीताः ॥४४
अन्योन्यमूचुरिति गेहधनादिभिर्वा किं साध्यते वयमिहैव वसाम सर्वे । राजापि शार्वरविधानमथो विधाय निर्वर्त्य वासभवने शयनीयमग्र्यम् । अध्यास्य रत्ननिकरैरति शोभि भद्रं निद्रामसेवत नरेंद्र चिरं प्रतीतः ॥४५
वे सब सैनिक गण अपने स्वरूप के अनुरूप वैभवों में वेश कीमती वस्त्र-स्रक् और भूषण आदि के द्वारा अत्यधिक मुदित हुए थे। उस राजा के सैनिक विविध प्रकार के अन्न-पान-अच्छे भक्ष्य-भोज्य-मधु-मांस-पय और घृत आदि से परम तृप्त हो गये थे। उस नरेन्द्र की पुरी में जैसे देवगण