भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ २०५

यातश्चिरं विविधवाद्यविनोदनृत्तोप्रेक्षाप्रवृत्तहसनादिः कथाप्रसंगः ।।४०
आसांचकार गणिकाजननर्महासक्रीडाविलास-
परितोषितचित्तवृत्तिः ।
इत्थं विशामधिपतिर्भृशमानिशार्द्धं नानाविहार-
विभवानुभवैरनेकः ।।४१
स्थित्वानुगान्य रपतीनपि तन्निवासं प्रस्थाप्य वासभवनं स्वयमप्ययासीत् ।
तद्राजसैन्यमखिलं निजवीर्यशौर्यसंपत्प्रभावमहिमानुगुणं गृहेषु ।।४२

वह उदार यश वाला राजा बहुत ही बारीक वस्त्र का छादन जिस पर हो रहा था और नीचे सुवर्ण का विष्टर जिसमें था ऐसे उस परम-मनोहर आसन पर अध्यासिन हो गये थे। हे नृप ! उस गृह में उसकी पुरन्ध्रियों के समुदाय ने अपने आसन पर शीघ्र ही समासीन राजा का अनेक पूजन के उपचारों से अर्चन किया था ।३६। इसके उपरान्त वाद्यों के वादन आदि के द्वारा और भूषण—गन्ध—पुष्प—वस्त्र आदि अलकृतियों से राजा का विशेष आनन्द बढ़ा दिया था। वहाँ पर सम्पूर्ण दिन में होने वाले समुचित कर्म से निवृत्त होकर उस हैहयपति ने अपने मत के अनुसार पूरे दिवस को व्यतीत किया था ।३७। वहाँ पर उस राजा का पूरा दिन अनेक तरह के आलयन-नर्मवचन-विचित्र आनन्द केलियों और भली भाँति प्रेक्षण आदि के समाचरण से व्यतीत हुआ था। फिर जब सन्ध्या का समय हो गया तो उसने दिनान्त में होने वाले उचित कर्मों से निवृत्ति प्राप्त की थी और फिर वह राजा सभी ओर से अपने मन्त्रीगण और सचिवों से अनुगत हो गया था ।३८। समीप में वर्त्तमान भृत्यों के करों में अनेक प्रदीप संस्थित थे जिनसे रात्रिका परम गहन अन्धकार शान्त हो गया था। उस समय में राजा अपनी सभा में प्राप्त हो गया था। वहाँ पर वह अपने आसन पर विराजमान हो गया था और सैकड़ों पुरोहित—मन्त्री—सामन्त और नायकों के द्वारा समुपासित हो रहा था ।३९। उस राज सभा में नानाभाँति के विनोदों से वह परम हर्षित होकर बैठा हुआ था जिस तरह देवगणों से