संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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।३२-३३। उन कञ्चुकियों के द्वारा दर्शक जनों के समूहों को अलग दूर में हटा दिया गया था जिस समय में राजा ने अन्दर प्रवेश किया था । सचिव-गण बड़े ही आदर से राजा के पदार्पण करने के लिये हाथों से सङ्केत कर रहे थे । भीतर नगर की कामिनियां विद्यमान थी जो राजा का अर्चन प्रदीपदधि-दर्पण-गन्ध-पुष्प-दूर्वा और अक्षत आदि से विशेष रूप से कर रही थीं ।३४। फिर राजा उस राजभवन के अन्दर से लीला के सहित बहुमान पूर्वक आनन्दित होता हुआ निकला था । वहाँ पर सम वयस्क उन पुर की युवतियों के द्वारा अनेक प्रकार के रत्नों के प्रवेक रुचि के जाल से विराजमान बहुत ही शीघ्र एक उपवेशन करने के लिए आसन निवेशित किया गया था ।३५।
सूक्ष्मोत्तरच्छदमुदारयशा मनोज्ञमध्यारुरोह कनकोत्तर-
विष्टरं तम् ।
तस्मिन्गृहे नृप तदीयपुरंध्रिवर्गः स्वासीनमाशु नृपतिं
विविधार्हणाभिः ॥३६॥
वाद्यादिभिस्तदनु भूषणगंधपुष्पवस्त्राद्यलंकृतिभिरग्र्य-
मुदं ततान ।
तस्मिन्तशेषदिवसोचितकर्म सर्वं निर्वर्त्य हैहयपतिः
स्वमतानुसारम् ॥३७॥
नाना विधायलयनमंविचित्रकेलीसंप्रक्षितैर्दिनमशेषमलं
निनाय ।
कृत्वा दिनांतसमयोचितकर्म चैव राजा स्वमंत्रि-
सचिवानुगतः समंतात् ॥३८॥
आसन्नभृत्यकरसंस्थितदीपकोघसंशांतसंतमसमाशु सदः
प्रपेदे ।
तत्रासने समुपविश्य पुरोधमंत्रिसामंतनायकशतैः
समुपास्यमानः ॥३९॥
अन्वास्त राजसमितौ विविधैर्विनोदैर्हृष्टः सुरेंद्र इव
देवगणैरुपेतः ।