संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दूरप्रसारितपृथग्जनसंकुलानि सद्याविवेश
सचिवादरदत्तहस्तः ।
तत्र प्रदीपदधिदर्पणगन्धपुष्पदूर्वाक्षतादिभिरलं
पुरकामिनीभिः ॥३४
निर्याय राजभवनांतरात्तः सलीलमानन्दितो नरपति-
र्बहुमान पूर्वम् ।
ताभिः समाभिविनिवेशितमांशु नानारत्न-
प्रवेकरुचिजालविराजमानम् ॥३५
क्षत्रियों के अधिपति ने उस नगर की सम्पदा को देखकर हे राजन् ! वचनों की भांति मन में बहुत ही अधिक प्रशंसा की थी । और हैहयपति ने यह मान लिया था कि भूमण्डल में अधिक मनोहरु हित के सहित क्षत्रियों की सम्पदा ऐसी परम दुर्लभ है । अर्थात् क्षत्रियों की सम्पदा ऐसी कभी भी नहीं हो सकती है ।२६। सुरों के द्वारा समर्पित इस विप्रों की श्री के समक्ष में क्षत्रियों की श्री शतांश की भी तुलना प्राप्त करने में समर्थ नहीं होती है । पुर के मध्य में अपने पुरोहित और मन्त्रियों के साथ में जब उस पुर के निवासियों के द्वारा उपचित विभूतिका आलोकन किया था तब राजा के मन में विप्रश्री की महत्ता का ज्ञान हुआ था ।३०। जिस समय में राजा नगर में भीतर गमन कर रहा था उस समय में अपने पार्श्व में चरण करने वालों के द्वारा सौधों का वर्ग उसे दिखाया गया था तथा वहां के गुरुजनों के द्वारा सभी ओर से वह पूज्यमान हो रहा था और उसको विशेष आनन्द प्राप्त हुआ था । उस समय में राजा से निवेदन किया गया था कि आप अपने सभी अनुचरों के सहित अपने स्वरूप के अनुरूप मुनिवर के द्वारा इस सपर्या का लाभ प्राप्त कीजिए ।३१। फिर राजा अपने स्वार्थ को निर्वार्तित करके प्रकल्पित गृह की ओर अभिमुख होकर वहाँ से चला था। मार्ग में सभी ओर से अनेक प्रकार की पूजा की सामग्री हाथों में ग्रहण किये हुए पुरवासियों ने एकत्रित होकर अपने करों को जोड़कर उसका परमाधिक आतिथ्य सत्कार किया था और पद-पद पर जयकार के शब्दों के घोष से तथा सूर्य की ध्वनि से सभी दिशाओं को बधिर करते हुए उस राजा का नगर निवासियों ने विशेष सम्मान किया था । फिर राजा ने क्रम से तीन अन्य कक्षों का अतिक्रमण किया था जिनमें बड़े ही संभ्रम वाले कञ्चुकी वर्तमान थे ।