संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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थे । वहाँ पर वह राजा वहाँ की वनिताओं के द्वारा अब्जन रत्न सार मुक्ताओं से अनुपद् प्रकीर्यमाण हो रहा था ।२५-२६-२७। वह अवनिपति इस प्रकार की विशद वृत्तियों से चारों ओर विशेष रूप से भ्राजित हुआ था जैसे मन्दराचल चन्द्रमा की किरणों के समुदाय से शोभाशाली हुआ करता है। उस समय अत्यन्त उदार और लोकों में चिन्तन न करने के योग्य ब्राह्मणों की तपश्चर्या का भी अवलोकन राजा ने किया था जो कि अन्य लोकों में महादुर्लभ और स्पृहणीय शोभा से समन्वित थी ।२८।
पश्यन्विशामधिपतिः पुरसंपदं तामुच्चैः शशंस मनसा श्वचसेव राजन् । मेने च हैहयपतिर्भुवि दुर्लभैयं शास्त्री मनोहरतरा सहिता हि संपत् ॥२६
अस्याः शतांशतुलनामपि नोपगंतुं विप्रश्रियं प्रभवतीति सुराचितायाः । मध्येपुरं पुरजनोपचितां विभूतिमालोकयन्सह पुरोहितमंत्रिसार्थैः ॥३०
गच्छन्स्वपार्श्वचरदर्शितवर्णसौधो लेभे मुदं पुरजनैः परिपूज्यमानः । राजा ततो मुनिवरोपचितां सपर्यामात्मानुरूपमिह सानुचरी लभस्व ॥३१
इत्यश्रमेण नृपतिर्विनिवर्त्तयित्वा स्वार्थं प्रकल्पितगृहा- भिमुखो जगाम । पौरैः समेत्य विविधाणपाणिभिश्च मार्गे मुदा विरचितांः अन्जिभिः समंतात् ॥३२
संभावितोऽप्यनुपदं जयशब्दघोषैस्तुर्यारवैश्च बधिरीकृतदिग्विभागः । कक्षांतराणि नृपतिः शनकैरतीत्य त्रीणि क्रमेण च ससंभ्रमकंचुकीनि ॥३३