भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ २०१

तत्रत्यपौरवनितांजनरत्नसारमुक्ताभिरप्यनुपदं
प्रविकीर्यमाणः ॥२७
व्यभ्राजतावनिपतिर्विशदैः समंताच्छीतांशुरश्मि-
निकरैरिव मंदराद्रिः।

ब्राह्मीं तपः श्रियमुदारगणामचिंत्यां लोकेषु दुर्लभतरां
स्पृहणीयशोभाम् ॥२८

हमारे कुल गुरुदेव की यह आज्ञा हुई है कि हमारे द्वारा समुपादित आतिथ्य को राजा के द्वारा शीघ्र ही ग्रहण करना चाहिए। इसके पश्चात् राजा ने मुनिवर के द्वारा अनुज्ञा प्राप्त करके उस परम श्रेष्ठ नगर में प्रवेश किया था जोकि अपने ही लिए निर्मित किया गया था ॥२२। वह राजा अपनी सेना के समस्त सैनिकों के सहित उस नगर में प्रविष्ट हुआ था जो कि मुनि की होमधेनु की अत्यद्भुत शक्ति-सामर्थ्य का सूचक था और जो सभी प्रकार के उपभोगों का एक महान विशाल आगार था। अन्दर उस राजा ने भली-भाँति प्रवेश करके सभी लोकों का सम्मोहन करने वाली उस नगर की समृद्धि का अभिसमीक्षण करके अत्यधिक प्रसन्नता प्राप्त की थी ॥२३। उस समय अपनी सेना के सहित परम दानी और महान् धीर उस राजा ने प्रीति से प्रसन्न वदन वाला होकर अत्यधिक विस्मय को प्राप्त किया था। देवों की स्त्रियों के नेत्ररूपी भ्रमरों के यूथों के द्वारा पान करने का एक मात्र पात्र समुचित एवं सुन्दर मूर्ति वाला जिस समय वहाँ गमन कर रहा था। अर्थात् गमन करते हुए देवाङ्गनाएँ अपने नयनों से उसकी सुन्दर मूर्ति का अवलोकन कर रही थी ॥२४। देवगणों के समुदाय के साथ उस राजा हैहयपति ने कुबेर की वसति में महेन्द्र के ही समान पुर के राज मार्ग में परम रमण किया था। राजमार्ग के द्वारा जब प्रस्थान कर रहा था उस समय में सौधों (विशाल महलों) पर स्थित होती हुई पौराङ्गनाओं ने चारों ओर से चन्दन के जल से सिक्त परम सुन्दर प्रसूनों और लाजाओं (खीलों) के प्रकर्रों से निरन्तर उस राजा के ऊपर वर्षा की थी। समागत अतिथि के अर्चन करने में परमाधिक समुत्सुक उस नगर वासियों की अङ्गनाओं के करकमलों से गिरी हुई खीलों की वर्षा हो रही थी। उस समय में होने वाले पङ्क (कीच) से सुगन्धित नन्दन वन में समुत्पन्न पुष्पों की राशियाँ बरसायीं जा रही थीं जिन पर सौरभ से संमोहित भ्रमर-गुञ्जार कर रहे