संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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विस्पष्टमान वैभव वाला था ।१९। उस मुनि की होम धेनु ने तुरन्त ही अमित सौभाग्य के भोग को करके शीघ्र ही उस महामुनीन्द्र की सेवा में कर दिया था। इसके अनन्तर उन मुनिश्रेष्ठ ने द्विज होम धेनु के द्वारा राजा का परम रुचिर आतिथेय-सम्पादित किया हुआ जान लिया था ।२०। फिर उस मुनींद्र ने अपने किसी गुणशाली शिष्य को बुलाकर हे राजन् ! शीघ्र ही हैययेश्वर के समीप में भेज दिया था। उस मुनि सुत ने शीघ्र वेग से विशों के अधिपति के समीप में गमन करके बहुत ही नम्रता से यह उससे यह कहा था ।२१।
आतिथ्यमस्मदुपपादितमाशु राज्ञासंभावनीयमिति नः कुलेदेशिकाज्ञा ।
राजा ततो मुनिवरेण कृताभ्यनुज्ञः संप्राविशत्पुरवरं स्वकृते कृतं तत् ॥२२॥
सर्वोपभोग्यनिलयं मुनिहोमधेनुसामर्थ्यसूचकमशेषबलैः समेतः ।
अन्तः प्रविश्य नगरर्द्धिमशेषलोकसंमोहिनीमभिसमीक्ष्य स राजवर्यः ॥२३॥
प्रीतिप्रसन्नवदनः सबलस्तु दानी धीरोऽपि विस्मयवाप भृशं तदानीम् ।
गच्छन्सुरस्त्रीनयनालियूथपानैकपात्रोचितचारुमूर्तिः ॥२४॥
रेमे स हैहयपतिः पुरराजमार्गे शक्रः कुबेरवसताविव सामरौघः ।
तं प्रस्थितं राजपथात्समंतात्पौरांगाश्चन्दनवारिसिक्तैः ॥२५॥
प्रसूनलाजाप्रकरैरजस्रमवीवृषन्सौधगताः सुहृद्यैः ।
अभ्यागतार्हणसमुत्सुकपौरकांता हस्तारविंदगलिताम-
ललाजवर्षैः ॥२६॥
कालेयपंकसुरभीकृतनन्दनोत्थशुभ्रप्रसूननिकरै-
रलिवृन्दगीतैः ।