भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 207

कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की माँग ] [ २११

नैव चित्रं तव विभो शक्नोति तपसा भवान् ।
ध्रुवं कर्तुं हि लोकानामवस्थात्रितयं क्रमात् ॥२३
सुदृष्टा ते तपः सिद्धिर्महती लोकपूजिता ।
गमिष्यामि पुरीं ब्रह्मन्ननुजानातु मां भवान् ॥२४
वसिष्ठ उवाच—
इत्युक्तस्तेन स मुनिः कार्त्तवीर्येण सादरम् ।
संभावयित्वा नितरां तथेति प्रत्यभाषत ॥२५
मुनिना समनुज्ञातो विनिष्क्रम्य तदाश्रमात् ।
सैन्यैः परिवृतः सर्वैः संप्रतस्थे पुरीं प्रति ॥२६
स गच्छंश्चितयामास मनसा पथि पार्थिवः ।
अहोऽस्य तपसः सिद्धिर्लोकविस्मयदायिनी ॥२७
यया लब्धैदृशी धेनुः सर्वकामदुहां वरा ।
किं मे सकलराज्येन योगद्धर्या वाप्यनल्पया ॥२८

हे विभो ! इस जगती तल में आप जैसे महा पुरुषों के तपों के प्रभावों से ही निश्चित रूप से सर्वदा ब्राह्मणों के वर्चस् को नित्य ही धारण किया करते हैं ।२२। हे विभो ! इसमें कुछ भी विचित्रता नहीं है । आप अपने तप के द्वारा लोकों की क्रम से तीनों अवस्थाओं को ध्रुवकर सकते हैं ।२३। हमने आपको लोकों में पूजित महान् तप की सिद्धि भली भाँति देखती हैं । हे ब्रह्मन् ! मैं अब अपनी नगरी में जाऊँगा अतः आप मुझे गमन करने के लिए अपना आदेश प्रदान कीजिए ।२४। वसिष्ठ जी ने कहा—जल कार्त्त-वीर्य राजा के द्वारा जब इस प्रकार से उन महामुनि से सादर प्रार्थना की गयी थी तो मुनि ने बहुत कुछ सत्कार करके यही उत्तर दिया था कि यदि आप जाना ही चाहते हैं तो स्वेच्छया गमन कीजिए ।२५। उस महामुनि से अनुज्ञा प्राप्त करने वाले राजा ने उनके आश्रम से बाहिर निकल कर समस्त सेनाओं से परिवृत होते हुए अपनी पुरी की ओर प्रस्थान कर दिया था ।२६। मार्ग में गमन करने के समय में उस राजा ने अपने मन में विचार किया था कि ओहो ! इस मुनि की तपश्चर्या को कैसी अद्भुत शक्ति है जो सभी लोकों को विस्मय देने वाली है ।२७। जिस तपश्चर्या की सिद्धि से ऐसी

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २) · पृष्ठ 207, कुल 893 में से · BharatKosha