भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

में समस्त अर्थ गृहों वाले तथा परिपूर्ण कामनाओं से संयुत नागरिकों से चारों ओर अध्यास्यमान था अर्थात् परिगुणशाली पुरवासी सभी ओर निवास कर रहे थे ॥११॥ उस नगर में असंख्य-अनुपम और नाना भाँति के रत्नों से समुज्ज्वलित एवं विचित्र प्रासादों के समुदायों की अवस्थिति थी और वहाँ पर अनेक ऐसे मन्दिर थे जहाँ पर अनेक रथ-अश्व-हाथी खर-उष्ट्र और गौएँ विद्यमान थे ॥१२॥ उस नगर में चारों ओर नरेन्द्र सामन्त-निषाद सादी-पदाति-सेनापति और नायकों के तथा रथी-सारथी-मागध-वन्दीगण और विप्र प्रभृतियों के गृह बने हुए थे ॥१३॥ उस अनुपम नगर में विविक्त अर्थात् खुली हुईं रथ्याएँ थीं—सभी आपण थे जिनके चत्वर बहुत ही विचित्र थे। वहाँ पर अनेक प्रकार की वस्तुओं का क्रय और विक्रय हो रहा था। उस नगर में वारांगनाओं के परम शुभ्र गृहों के समूह विनिर्मित थे जिनके निर्माण करने में बहुत अधिक धन के व्यय से सब सामान भली-भाँति लगाये गये थे ॥१४॥

महार्हरत्नोज्ज्वलतुंगगोपुरैः सह श्वगृधव्रजनर्तनालयैः । चित्रैर्ध्वजैश्चापि पताकिकाभिः शुभ्रैः । पटंमण्डपिकाभिरुन्नतैः ॥१५॥ कल्हारकंजकुमुदोत्पलरेणुवासितैश्चक्राह्वहंसकुररीबक- सारसानाम् । नानारवाढ्यरमणीयतटाकवापीसरोवरैश्चापि जलोप- पन्नैः ॥१६॥ चूतप्रियालपनसाम्रमधूकजंबूलक्षैर्नवैश्च तरुभिश्च कृतालवालैः । पर्यंतरोषितमनोरमनागकेतकीपुन्नागचंपकवनैश्च पतत्रिजुष्टैः ॥१७॥ मंदारकुंदकरवीरमनोज्ञयूथिकाजात्यादिकैर्विविधपुष्प फलैश्च वृक्षैः । संलक्ष्यमाणपरितोपवनालिभिश्च संशोभितं जगति विस्मयनीयरूपैः ॥१८॥