भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की मांग ] [ २१५

तन्मतानुप्रवृत्तिश्च राजा सद्यो विषीदति ॥४८ अज्ञातनयनयो मंत्री राजानमनयांबुधौ। आत्मना सह दुर्बुद्धिलोंहनौरिव मज्जयेत् ॥४९

असत् आत्माओं वाले प्रभुओं का मन ऐश्वर्य की वृद्धि करने में महान् मूढ़ हुआ करता है। वे बहुधा नेत्रों से बुरे कर्मों को देखते हुए भी विशेष रूप से प्रलोभित उनका मन क्या-क्या असत् कर्म नहीं किया करता है अर्थात् ऐसे बहुत से बुरे कर्म हैं जिनको उनका मन करने में थोड़ा भी शङ्कित नहीं होकर किया करता है ॥४३॥ हे उत्तम नृप ! आपको छोड़कर अन्य ऐसा कौन है जो यह नहीं जानता है कि ब्राह्मणों को तो अपनी ओर से दान ही दिया जाता है। दान के देने के अतिरिक्त उनसे कुछ ग्रहण करना ब्राह्मणों के विषय में चाहता हो। तात्पर्य यही है कि आप ब्राह्मणों को दान देने के महत्व को भली भाँति जानते हैं और उनसे किसी वस्तु का ग्रहण नहीं किया जाता है यह भी अच्छी तरह से समझते हैं-इस विषय में आपके समान अन्य कोई भी ज्ञाता नहीं है ॥४४॥ हे महान् बाहुओं वाले ! आप तो इस तरह के पूर्ण ज्ञाता महा पुरुष हैं। फिर ऐसे सज्जनों के द्वारा विशेष निन्दित ऐसे कर्म को कभी मत करिए क्योंकि ऐसा बुरा कर्म लोक में आपके सुयश की हानि के ही करने वाला होगा ॥४५॥ हे राजन् ! आप महान् दानी राजाओं के वंश में समुत्पन्न हुए हैं। अतएव आपका विशाल यश है। अब इस असत् कर्म के द्वारा अपने यश का विनाश मत करिये ॥४६॥ अहो ! अर्थात् बड़े ही आश्चर्य की बात तो यह है कि ये अनुजीवी लोग जोकि अपने ही स्वामी के परम प्रसाद से समुच्च हो गये हैं वे ऐसी अनीति की ओर उन्मुख हो रहे हैं कि वे उसी अपने स्वामी व्यसनों के सागर में डुबा रहे हैं ॥४७॥ श्री सम्पन्नता होने के कारण से ऐसा मनुष्य ज्ञान शून्य हो गया है कि अचिन्तनीय पुरुष के कृत्य को भी करने के लिये उतारू हो जाता है। ऐसे मनुष्यों के मत के अनुसार प्रवृत्ति रखने वाला राजा तुरन्त ही दुःखों को भोगा करता है ॥४८॥ जो मन्त्री सुन्दर नीति को नहीं जानता है वह दुष्ट बुद्धि वाला मन्त्री लोहे की नौका की ही भाँति अपने राजा को भी अनीति के सागर में निमग्न करा दिया करता है ॥४९॥

तस्मात्त्वं राजशार्दूल मूढस्य नयवर्त्मनि । मतमस्य सुदुर्बुद्धे र्नानुवर्त्तितुमर्हसि ॥५०॥