भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स्वीकार करनी चाहिए अर्थात् उस धेनु को आप ग्रहण कर लीजिए। यदि यह कार्य आपको पसन्द हो तो इसको अपने अनुजीवियों के द्वारा कहलवा देना चाहिए। ३७। इस प्रकार से मैं भी इसको नहीं जानता हूँ। किन्तु यह सब आपका कथन अयुक्त है। चाहे कितनी ही आपत्ति क्यों न उपस्थित हो जावे, ऐसे आपत्काल में भी ब्राह्मणों के धन का कभी भी आहरण नहीं करना चाहिए। मेरा मन परम शङ्कित रहा करता है। ३८। इस रीति से जिस समय में राजा कह रहा था उस समय में राजा के पुरोहित ने राजा से यह कहा था—हे भूपते ! मतिमानों में परम श्रेष्ठ गर्ग मुनि ने ऐसे कर्म की निन्दा करते हुए यही कहा था। ३६। आपत्ति काल में भी कभी ब्राह्मणों के धन का किसी भी तरह से अपहरण नहीं करना चाहिए। इस लोक में ब्रह्मस्व के समान अन्य कुछ भी दुर्जर अर्थात् बुरा कर्म नहीं होता है। ४०। हे हैहय ! विष भी मारक होता है किन्तु वह अपने उपभोक्ता को ही जो कि उसका लक्ष्य भूत है मारता है किन्तु ब्राह्मणों का धन रूपी पावक मूल के सहित सम्पूर्ण कुल को भस्मीभूत कर दिया करता है। ४१। हे पार्थिव ! लोक में यह बड़ा भारी आश्चर्य से संयुत है कि ब्रह्मस्व अनिवार्य रूप से महान् दुर्जर विष है। यह तो केवल ग्रहण करने वाले को ही नहीं प्रत्युत उसके सभी पुत्र-पौत्र आदि का विनाश कर देने वाला है और विपाक में महान कटु होता है। ४२।

ऐश्वर्यमूढं हि मनः प्रभूणामसदात्मनाम् ।
किन्नामासन्न कुरुते नेत्रासद्विप्रलोभितम् ॥४३
वेदान्यस्त्वामृते कोऽन्यो विना दानान्नृपोत्तम ।
आदानं चितयानो हि ब्राह्मणेष्वभिवाञ्छति ॥४४
ईदृशंत्वं महाबाहो कर्म सज्जननिन्दितम् ।
मा कृथास्तद्धि लोकेषु यशोहानिकरं तव ॥४५
वंशे महति जातस्त्वं वदान्यानां महीभुजाम् ।
यशांसि कर्मणानेन सांप्रतं मा व्यनीनशः ॥४६
अहोऽनुजीविनः किञ्चिद्भर्तारं व्यसनार्णवे ।
तत्प्रसादसमुन्नद्धा मज्जयन्त्यनयोन्मुखाः ॥४७
श्रिया विकुर्वन्पुरुषकृत्यर्चित्ये विचेतनः ।