भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एवं हि वदतस्तस्य स्वामिश्रेयस्करं वचः । आक्षिप्य मन्त्री राजानमिदं भूयो ह्यभाषत ॥५१ ब्राह्मणोऽयं स्वजातीयहितमेव समीक्षते । महांति राजकार्याणि द्विजैत्तुं न शक्यते ॥५२ राज्ञैव राजकार्याणि वेद्यानि स्वमनीषया । विना वै भोजनादाने कार्यं विप्रो न विदति ॥५३ ब्राह्मणो नावमंतव्यो वंदनीयश्च नित्यशः । प्रतिसंग्रहणीयश्च नाधिकं साधितं क्वचित् ॥५४ तस्मात्स्वीकृत्य तां धेनुं प्रयाहि स्वपुरं नृप । नोचेद्राज्यं परित्यज्य गच्छत्व तपसे वनम् ॥५५ क्षमावत्त्वं ब्राह्मणानां दण्डः क्षत्रस्य पार्थिव । प्रसह्य हरणे वापि नाधर्मस्ते भविष्यति ॥५६

इस कारण से हे राजशार्दूल ! आप इस मूढ के न्याय मार्ग में मत चलिए और इस दुष्ट बुद्धि वाले मन्त्री के मत के अनुसार असत् करने के लिये आप कभी भी योग्य नहीं होते हैं ।५०। इस रीति से अपने स्वामी के कल्याण करने वचनों को जब वह पुरोहित कह रहा था तो उसकी बात को काट कर वह मन्त्री फिर राजा से यह बोला था ।५१। हे राजन् ! यह पुरोहित तो जाति का ब्राह्मण है और यह सर्वदा अपनी ही जाति का हित चाहा करता है । राजा के कार्य तो बहुत महान् हुआ करते हैं जो कि विप्रों के द्वारा कभी भी जाने नहीं जा सकते हैं ।५२। राजाओं के कार्य तो राजा के ही द्वारा जानने के योग्य हुआ करते हैं । विप्र केवल भोजन और दान ग्रहण के अतिरिक्त अपनी बुद्धि से अन्य नृपोचित कार्य को नहीं जानता है ।५३। मैं ब्राह्मणों की किसी भी रीति से निन्दा नहीं करता हूँ प्रत्युत मेरा यही मत है कि कभी भी ब्राह्मण का अपमान नहीं करना चाहिए और ब्राह्मण की नित्य ही वन्दना करनी चाहिए । इसका प्रति संग्राहण भी करना उचित है किन्तु इसके द्वारा कहीं पर भी किसी कार्य को साधित नहीं करे ।५४। हे नृप ! इस कारण से आप उस मुनि की होमधेनु को स्वीकार करके अर्थात् अपने अधिकार में लेकर ही फिर अपने नगर में गमन करिए । यदि यह कार्य नहीं करना चाहते हैं और ऐसे अद्भुत पदार्थ का भी त्याग कर