संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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रहे हैं तो फिर सभी राज पाट को त्याग कर तप करने को वन में ही चले जाइए और पूर्ण त्यागी बन जाइए ।५५। इस प्रकार से क्षमावान् होना तो ब्राह्मणों का ही धर्म होता है । हे राजन् ! क्षत्रिय का धर्म तो दण्ड देना है । यदि बल पूर्वक भी उस धेनुरत्न का अपहरण करते हैं तो इसके करने में भी आपका कोई अधर्म नहीं होगा ।५६।
प्रसह्य हरणे दोषं यदि संपश्यसे नृप ।
दत्त्वा मूल्यं गवाश्वाद्यमृषेर्धेनुः प्रगृह्यताम् ॥५७
स्वीकर्तव्या हि सा धेनुस्त्वया त्वं रत्नभाग्यतः ।
तपोधनानां हि कुतो रत्नसंग्रहणादरः ॥५८
तपोधनबलः शांतः प्रीतिमान्स नृप त्वयि ।
तस्मात्ते सर्वथा धेनुं याचितः संप्रदास्यति ॥५९
अथ वा गोहिरण्याद्यं यदन्यदभिवाञ्छितम् ।
संगृह्य वित्तं विपुलं धेनुं तां प्रतिदास्यति ॥६०
अनुपेक्ष्यं महद्रत्नं राज्ञा वै भूतिमिच्छता ।
इति मे वर्त्तते बुद्धिः कथं वा मन्यते भवान् ॥६१
राजोवाच—गत्वा त्वमेव तं विप्रं प्रसाद्य च विशेषतः ।
दत्त्वा चाभीप्सितं तस्मै तां गामानय मंत्रिक ॥६२
वसिष्ठ उवाच—
एवमुक्तस्ततो राज्ञा स मंत्री विधिचोदितः ।
निवृत्य प्रययौ शीघ्रं जमदग्नेरथाश्रमम् ॥६३
हे नृप ! आप यदि बलात् उस धेनुरत्न के अपहरण करने में कोई दोष और अधर्म ही देखते हैं तो आप इसके बदले में अन्य गौ तथा अश्व आदि मूल्य के रूप में मुनि को देकर ऋषि की उस धेनु का ग्रहण कर लीजिए ।५७। मेरे इस सम्पूर्ण निवेदन करने का निष्कर्ष यही है कि आपके द्वारा उस धेनु को स्वीकार कर ही लेना चाहिए अर्थात् किसी भी रीति से उसको अपने अधिकार में ले ही लेना उचित है । इसका कारण यही है कि आप तो ऐसे रत्नों का सेवन करने वाले हैं। जो तप को ही अपना धन माना करते हैं ऐसे तपस्वियों को ऐसे रत्नों के संग्रहण करने का समादर