भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

कहीं भी नहीं होता है ।५८। वह तपोधन धन वाला ऋषि तो परम शान्त स्वभाव वाला है और हे नृप ! वह आप में प्रीति रखने वाला भी है । इस कारण से जब भी आपके द्वारा याचना उससे की जायगी तो वह सब प्रकार से उस धेनु को दे देगा ।५९। अथवा यह भी होसकता है कि वह कुछ अधिक इच्छा रखता होवे तो अन्य गौ और सुवर्ण आदि जो-जो भी उसका अभीप्सित हो वह बहुत-सा धन एकत्रित करके उसको दे दिया जावे तो वह इस सबके बदले में उस धेनु का प्रतिदान अवश्य ही कर देगा ।६०। मेरी बुद्धि तो यही है कि भूति की अभिलाषा रखने वाले राजा के द्वारा ऐसे महान् रत्न की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए । आप इस विचारणीय विषय में कैसा अपना मत रखते हैं ? ।६१। राजा ने मन्त्री के मत का श्रवण करके कहा था—हे मन्त्रिन् ! आप ही वहाँ गमन कीजिए और विशेष रूप से उस विप्र को प्रसन्न कीजिए तथा जो भी कुछ उसका अभिवाञ्छित हो उस सबको उसे प्रदान करके उस धेनु को यहाँ पर ले आइए ।६२। वसिष्ठजी ने कहा—इस रीति से जब राजा के द्वारा कहा गया था तो वह मन्त्री भाग्य के विधान से प्रेरित होकर शीघ्र ही वापिस होकर जमदग्नि मुनि के आश्रम में चला गया था ।६३।

गते तु नृपतौ तस्मिन्नकृतव्रणसंयुतः ।
समिदानयनार्थाय रामोऽपि प्रययौ वनम् ।।६४
ततः स मंत्री सबलः समासाद्य तदाश्रमम् ।
प्रणम्य मुनिशार्दूलमिदं वचनमब्रवीत् ।।६५

चन्द्रगुप्त उवाच—

ब्रह्मन्नृपतिनाऽज्ञप्तं राजा तु भुवि रत्नभाक् ।
रत्नभूता च धेनुः सा भुवि दोग्ध्रीष्वनुत्तमा ।।६६
तस्माद्रत्नं सुवर्णं वा मूल्यमुक्त्वा यथोचितम् ।
आदाय गोरत्नभूतां धेनुं मे दातुमर्हसि ।।६७

जमदग्निउवाच—

होमधेनुरियं मह्यं न दातव्या हि कस्यचित् ।
राजा वदान्यः स कथं ब्रह्मस्वमभिवाञ्छति ।।६८