भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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कार्तिकेय द्वारा कामधेनु की माँग ] [ २१९

मंत्र्युवाच- रत्नभाक्त्वेन नृपतिद्धे॑नुं ते प्रतिकांक्षति । गवायुतेन तस्मात्त्वं तस्मै तां दातुमर्हसि ॥६६॥

उस राजा के आश्रम से अपने पुर की ओर चले जाने पर राम भी आकृत व्रण के ही साथ में समिधाओं के लाने के लिए वन में चला गया था ।६४। इसके अनन्तर वह चन्द्रगुप्त नामधारी मन्त्री अपनी सेना के सहित जमदग्नि मुनि के आश्रम में पहुँच कर उसने मुनियों में शार्दूल के समान जमदग्नि के चरणों में प्रणाम करके वह वचन कहे थे ।६५। चन्द्रगुप्त ने कहा—हे ब्रह्मन् ! नृपति ने यह आज्ञा प्रदान की है कि इस भूमण्डल में राजा ही रत्नों का सेवन करने वाला होता है। इस भूमि में समस्त दोहन शील धेनुओं में अतीव उत्तम वह धेनु रत्नभूता है जो कि इस समय में आप के पास है ।६६। इस कारण से आप रत्न अथवा सुवर्ण जो भी समुचित हो उस धेनु का मूल्य बताकर ग्रहण कीजिए और गौओं में जो रत्नभूता धेनु है उसको आप मुझको प्रदान करने के योग्य होते हैं ।६७। जमदग्नि मुनि ने कहा—यह तो मेरी होम धेनु है अर्थात् समस्त होम की सामग्री देने वाली है अतएव मेरे द्वारा यह किसी के लिये भी देने के योग्य नहीं है। यह आपका स्वामी राजा तो बहुत ही बड़ा दानशील है फिर वह किस प्रकार से इस ब्रह्मस्व अर्थात् ब्राह्मण के धन को लेने की इच्छा कर रहा है ? ।६८। मन्त्री ने कहा—क्योंकि नृपति रत्नों का सेवन करने वाला होता है इसी भावना के कारण से वह आपकी रत्नभूता धेनु की आकांक्षा करता है। यों ही बिना किसी मूल्य के नहीं लेना चाहता है। आप दश सहस्र गौओं को ग्रहण करके इस कारण से उस धेनु को उस राजा के लिए देने के योग्य हैं ।६९।

जमदग्निरुवाच- क्रयविक्रययोर्नाहं कर्त्ता जातु कथंचन । हविर्धानीं च वै तस्मान्नोत्सहे दातुमंजसा ॥७०॥

मंत्र्युवाच-राज्यार्धेनाथ वा ब्रह्मन्सकलेनापि भूभृतः । देहि धेनुमिमामेकां तत्ते श्रेयो भविष्यति ॥७१॥

जमदग्निरुवाच-