संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जीवन्नाहं तु दास्यामि वासवस्यापि दुर्मते ।
गुरुणा याचितं किं ते वचसा नृपते पुनः ॥७२
मंत्र्युवाच—
त्वमेव स्वेच्छया राज्ञे देहि धेनुं सुहृत्तया ।
यथा बलेन नीतायां तस्यां त्वं किं करिष्यसि ॥७३
जमदग्निरुवाच—
दाता द्विजानां नृपतिः स यद्यप्याहरिष्यति ।
विप्रोऽहं किं करिष्यामि स्वेच्छावितरणं विना ॥७४
वसिष्ठ उवाच—
इत्येवमुक्तः संक्रुद्धः सः मंत्री पापचेतनः ।
प्रसह्य नेतुमारेभे मुनेस्तस्य पयस्विनीम् ॥७५
जमदग्नि मुनि ने कहा—भाई, मैं कभी भी किसी भी प्रकार से क्रय और विक्रय के करने वाला नहीं हूँ । वह धेनु तो मेरी हविर्धानी अर्थात् होम के लिये हवि के प्रदान करने वाली है ! इसलिए तुरन्त ही मैं उसको देने का उत्साह नहीं करता हूँ ।७०। मन्त्री ने फिर कहा—हे ब्रह्मन् ! आप उस राजा के आधे राज्य को ग्रहण करके अथवा सम्पूर्ण राज्य को लेकर भी इस एक धेनु को दे दीजिए । इससे आपका बहुत बड़ा कल्याण होगा ।७१। जमदग्नि ने कहा—हे दुष्ट मति वाले ! मैं जीवित रहते हुए इस राजा की तो बात ही क्या है देवेन्द्र को भी यह धेनु नहीं दूँगा । फिर आपके राजा के बड़े वचन से याचना करना तो सर्वथा व्यर्थ ही है । अर्थात् इससे कुछ भी लाभ नहीं है ।७२। मन्त्री ने कहा—आप ही सौहार्द्र की भावना से राजा के लिए उस धेनु को दे दीजिए—यही अच्छा है । और ऐसा आप नहीं करते हैं तो उसको बलपूर्वक ले लेने पर आप क्या करेंगे ? ।७३। जमदग्नि मुनि ने कहा—राजा तो ब्राह्मणों के लिए दान प्रदान करने वाला हुआ करता है । वही यदि ब्रह्मस्व का आहरण करता है तो मैं तो विप्र हूँ मैं स्वेच्छा से वितरण करने के बिना उसका क्या करूँगा ।७४। वसिष्ठ जी ने कहा—जब इस रीति से उस चन्द्रगुप्त मन्त्री से ऋषि के द्वारा कहा गया तो वह पाप पूर्ण ज्ञान वाला मन्त्री बहुत क्रोधित हो गया था । फिर उसने मुनि की उस पयस्विनी धेनु का बलपूर्वक अपहरण करना आरम्भ कर दिया था ।७५।