भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

१७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

वाला न होवे ।३७। वसिष्ठ जी ने कहा- भगवान् शंकर ने कहा था कि जो भी तुमने चाहा है, सभी तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायगी । इसके उपरान्त उन्होंने पूर्ण अस्त्र और शस्त्र भी हे नृप ! मन्त्रों के सहित क्रम से परम प्रसन्न होते हुए राम के लिये प्रदान कर दिये थे ।३८। भगवान् शंकर ने प्रयोग करने के और संहार करने के साथ चार प्रकार के अस्त्रों के समुदाय को प्रसाद से परिपूर्ण होकर राम को ग्रहण करा दिया था ।३६। भगवान् शंकर ने असङ्ग वेग से समन्वित-शुभ्र रङ्ग वाले अश्वों से युक्त और सुन्दर ध्वजा वाले उत्तम रथ-धनुष और अक्षर शर राम के लिए दिये थे ।४०। एक ऐसा धनुष भी दिया था जो भेदन करने के अयोग्य-जीर्ण न होने वाला-परम सुदृढ़ ज्या (प्रत्यञ्चा) वाला और विजय करने वाला था । तथा सभी प्रकार के शस्त्रों के घात को सहन करने वाला-परम अद्भुत महाधन सम्पन्न एक कवच भी प्रदान किया था ।४१। हे नराधिप ! इसके अतिरिक्त भगवान् शंकर ने उस अपने परम भक्त राम के लिए युद्धों में अजेय होना-भूलोक में अनुपम शूर वीरता और अपनी ही इच्छा से प्राणों के धारण करने में शक्ति भी प्रदान की थी ।४२।

ख्यातिं च बीजमन्त्रेण तन्नाम्नां सर्वलौकिकीम् ।
तपःप्रभावं च महत्प्रददौ भार्गवाय सः ॥४३
भक्तिं चात्मनि रामाय दत्वा राजन्यथोचिताम् ।
सहितः सकलैर्भूश्चामरैश्चन्द्रशेखरः ॥४४
तेनैव वपुषा शंभुः क्षिप्रमंतरधाद्धरः ।
कृतकृत्यस्ततो रामो लब्ध्वा सर्वमभीप्सितम् ॥४५
अदृश्यतां गते शर्वे महोदरमुवाच ह ।
महोदर मदर्थे त्वमिदं सर्वमशेषतः ॥४६
रथचापादिकं तावत्परिरक्षितुमर्हसि ।
यदा कृत्यं ममैतेन तदानीं त्वं मया स्मृतः ।
रथचापादिकं सर्वं प्रहिणु त्वं मदंतिकम् ॥४७
वसिष्ठ उवाच-तथेत्युक्त्वा गते तस्मिन्भृगुवर्यो महोदरे ।
कृतकृत्यो गुरुजनं द्रष्टुं गंतुमियेष सः ॥४८

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १७७

गच्छन्नथ तदासौ तु हिमाद्रिवनगह्वरे । विवेश कंदरं रामो भाविकर्मप्रचोदितः ॥४६॥

उन प्रभु शिव ने भार्गव के लिए उसके नाम बीजमन्त्र के द्वारा सम्पूर्ण लोक में होने वाली ख्याति और महान् तप का प्रभाव दिया था ।४३। समस्त भूतगण और देवगण के सहित भगवान् चन्द्रशेखर ने हे राजन् ! अपने में यथोचित होने वाली भक्ति भी राम को प्रदान की थी ।४४। फिर उसी शरीर के द्वारा ही भगवान् शिव शीघ्र ही अन्तर्हित हो गये थे । फिर वह राम भी अपना सम्पूर्ण अभीप्सित प्राप्त करके कृतकृत्य हो गया था ।४५। भगवान् शंकर के अदृश्य हो जाने पर राम ने महोदर से कहा था । हे महोदर ! इन वस्तुओं को पूर्ण रूप से आप मेरे लिये अपने अधिकार में रखिए ।४६। आप ही इन रथ और चाप आदि की परीक्षा करने के लिए परम योग्य होते हैं । जिस समय में इन समस्त सामग्रियों से मुझे कार्य होगा उसी समय में मेरे द्वारा आप का स्मरण किया जायगा । तब रथ और चाप आदि सब सामान आप मेरे समीप में भेज दीजिएगा ।४७। वसिष्ठ जी ने कहा—महोदर ने कहा था कि मैं इसी प्रकार से सब कार्य करूँगा—यह कहकर उस महोदर के वहाँ से चले जाने पर भृगुवर राम कृत कृत्य हो गया था और फिर उसने अपने गुरुजन के दर्शन प्राप्त करने की इच्छा की थी । ।४८। उस समय में गमन करते हुए आगे आने वाले कर्मों के करने के लिए प्रेरित होकर परम गहन हिमवान् के वन में एक कन्दरा थी उस में राम ने प्रवेश किया था ।४६।

स तत्र ददृशे बालं धृतप्राणमनुद्रुतम् । व्याघ्रेण विप्रतनयं रुदंतं भीतभीतवत् ॥५०॥ दृष्ट्वानुकंपहृदयस्तत्परित्राणकातरः । तिष्ठतिष्ठेति तं व्याघ्रं वदन्नुच्चैरथान्वयात् ॥५१॥ तमनुद्रुत्य वेगेन चिरादिव भृगूद्वहः । आससाद वने घोरं शार्दूलमतिभीषणम् ॥५२॥ व्याघ्रेणानुद्रुतः सोऽपि पलायन्वनगह्वरे । निपपात द्विजसुतस्त्रस्तः प्राणभयातुरः ॥५३॥ रामोऽपि क्रोधरक्ताक्षो विप्रपुत्रपरीप्सया ।

१७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तृणमलं समादाय कुशास्त्रेणाभ्यमंत्रयत् ॥५४ तावत्तरक्षुलवानाद्रवत्पतितं द्विजम् । दृष्ट्वा ननाद रुभृशं रोदसी कम्पयन्निव ॥५५ दग्ध्वा त्वस्त्राग्निना व्याघ्रं प्रहरन्तं नखांकुरैः । अकृतव्रणमेवाशु मोक्षयामास तं द्विजम् ॥५६

वहाँ पर उस राम ने एक ब्राह्मण के पुत्र को देखा था जो बालक अवस्था का था और एक व्याघ्र उसके पीछे आते हुए खदेड़ रहा था जिसके कारण वह प्राण तो धारण किये हुए था किन्तु अत्यन्त डरे हुए की भाँति रुदन कर रहा था ।५। अपने हृदय में दया का भाव रखने वाला राम उसके परित्राण करने के लिए बहुत ही कातर हो गया था । उसने उस बालक के पीछे दौड़कर आते हुए व्याघ्र से बहुत ऊँची आवाज में 'ठहर जा-ठहर जा'—यह कहते हुए वह उस व्याघ्र के पीछे चल दिया था ।५१। बड़े ही वेग से उसके पीछे प्रभावित होकर उस भृगुकुल के उद्वहन करने वाले राम ने जैसे कुछ विलम्ब हो गया हो उस वन में अत्यन्त भयानक और घोर उस शार्दूल के पास अपनी पहुँच कर ली थी ।५२। उस परम गहन-गम्भीर वन में जिसके पीछे व्याघ्र दौड़ा चला आ रहा था वह ब्राह्मण का पुत्र अपने प्राणों की हानि के भय से बहुत ही आतुर होता हुआ अत्यधिक डरा हुआ था और दौड़ते हुए वह वहाँ पर भूमि में गिर गया था ।५३। राम भी ब्राह्मण के पुत्र की रक्षा की इच्छा से क्रोध से लाल नेत्रों वाला हो गया था और फिर उसने तृण मूल को ग्रहण कर कुशास्त्र से अभिमन्त्रित किया था ।५४। उसी समय के बीच में उस बलवान् व्याघ्र ने उस गिरे हुए द्विज पुत्र पर आक्रमण कर दिया था । उस दृश्य को देखकर राम ने अत्यन्त अधिक ध्वनि भूमि और आकाश को कँपाते हुए की थी अर्थात् घोरगर्जना की थी जिससे मानो भूमि और अन्तरिक्ष भी कम्पित हो गये थे ।५५। अपने नखों के अंकुरों द्वारा प्रहार करते हुए व्याघ्र को अस्त्राग्नि से भस्मीभूत करके उस विप्र सुत को छुड़ा दिया था जिसके शरीर में शीघ्रता से कोई बाघ के नखों से व्रण नहीं हो पाये थे ।५६।

सोऽपि ब्रह्माग्निनिर्दग्धदेहः पाप्मा नभस्तले । गान्धर्वं वपुरास्थाय राममाहेति सादरम् ॥५७ विप्रशापेन भो पूर्वमहं प्राप्तस्तरक्षुताम् ।

परशुराम द्वारा द्विज-सुत_रक्षण ] [ १७६

गच्छामि मोचितः शापात्त्वयाऽहमधुना दिवम् ॥५८ इत्युक्त्वा तु गते तस्मिन्नामो वेगेन विस्मितः । पतितं द्विजपुत्रं तं कृपया व्यपपद्यत ॥५६ माभैरेवं वदन्वाणीमारादेव द्विजात्मजम् । परामृशत्तदंगानि शनैरुज्जीवयन्नृप ॥६० रामेणोत्थापितश्चैवं स तदोन्मील्य लोचने । विलोकयन्ददर्शग्रे भृगुश्रेष्ठमवस्थितम् ॥६१ भस्मीकृतं च शार्दूलं दृष्ट्वा विस्मयमागतः । गतभीराह कस्त्वं भोः कथं वेह समागतः ॥६२ केन चायं निहंतुं मामुद्यतो भस्मसात्कृतः । तरक्षुर्भीषणाकारः साक्षान्मृत्यु रिवापरः ॥६३

वह व्याघ्र भी महा पापी ब्रह्माग्नि से दग्ध शरीर वाला आकाश में एक गन्धर्व का शरीर धारण करके बड़े ही आदर के साथ राम से बोला था ।५७। हे राम ! एक विप्र के शाप से पूर्व में इस तरक्षु के स्वरूप को प्राप्त करने वाला हुआ था । इस समय में आपके द्वारा उस शाप से छुड़ाया गया मैं अब स्वर्गलोक में गमन कर रहा हूँ ।५८। इतना ही कहकर बड़े वेग से उसके चले जाने पर राम को बड़ा विस्मय हुआ था और फिर दया के वशी-भूत होकर वह उस भूमि पर पड़े हुए द्विज पुत्र के पास पहुँचा था ।५६। हे नृप ! समीप में ही उस द्विज के पुत्र से 'डरो मत'—यह वाणी बोलते हुए धीरे-धीरे उसको उज्जीवित करते हुए उस बालक के अङ्गों को सहलाया ।६०। इस प्रकार से राम के द्वारा उठाये हुए उसने उस समय में अपने नेत्रों को खोला था । इधर-उधर अवलोकन करते हुए उसने अपने सामने अव-स्थित भृगुकुल में परम श्रेष्ठ राम को देखा था ।६१। और अपने समीप में ही भस्मीभूत शार्दूल को देखकर उस बालक को बड़ा भारी विस्मय हुआ था । जब उसका भय बिल्कुल समाप्त हो गया था तो उसने राम से कहा था—आप कौन हैं अथवा यहाँ पर आप कैसे समागत हुए हैं ? ।६२। और मुझको मारने के लिए उद्यत यह शार्दूल किसके द्वारा निर्दग्ध करके भस्मी-भूत कर दिया गया है ? यह तरक्षु तो महा भीषण आकार वाला साक्षात् दूसरे काल के ही सदृश था ।६३।

१८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भयसंमूढमनसो ममाद्यापि महामते ।
हतेऽपि तस्मिन्नखिला भान्ति वै तन्मया दिशः ॥६४
त्वामेव मन्ये सकलं पिता माता सुहृद्गुरुः ।
परमापदमापन्नं त्वं मां समुपजीवयन् ॥६५
आसीन्मुनिवरः कश्चिच्छांतो नाम महातपाः ।
पुत्रस्तस्यास्नितीर्थार्थी शालग्राममयासिषम् ॥६६
तस्मात्सं प्रस्थितश्शैलं दिदृक्षुर्गंधमादनम् ।
नानामुनिगणैर्जुष्टं पुण्यं बदरिकाश्रमम् ॥६७
गंतुकामोऽपहायाहं पंथानं तु हिमाचले ।
प्रविशन्गहनं रम्यं प्रदेशालोककाकुलम् ॥६८
दिशं प्राचीं समुद्दिश्य क्रोशमात्रमयासिषम् ।
ततो दिष्टवशेनार्हं प्राद्रवं भयपीडितः ॥६९
पतितश्च त्वया भूयो भूमेरुत्थापितोऽधुना ।
पित्रैव नितरां पुत्रः प्रेम्णात्यर्थं दयालुना ।
इत्येष मम वृत्तांतः साकल्येनोदितस्तव ॥७०

हे महती मति वाले ! अधिक भय के कारण संमूढ मन वाले मुझे अभी भी उसके मृत हो जाने पर भी समस्त दिशाएँ उसी से परिपूर्ण प्रतीत हो रही हैं अर्थात् सभी ओर मुझे वह ही दिखलाई दे रहा है ।६४। मुझे तो इस समय में ऐसा भान हो रहा है और मैं आपको ही अपना माता-पिता-सुहृद् और गुरु सब कुछ मानता हूँ क्योंकि मैं तो परमाधिक आपदा में फँस चुका था और आपने ही मुझको भली-भांति जीवन दान दिया है ।६५। कोई एक महान तपस्वी शान्त नामधारी श्रेष्ठ मुनि थे । मैं उनका ही पुत्र हूँ। मैं तीर्थाटन के प्रयोजन वाला शालग्राम के लिए गया था ।६६। वहाँ से मैंने फिर प्रस्थान किया था और मैं गन्धामादन पर्वत के देखने की इच्छा वाला हो गया था । अनेक महामुनियों के समुदायों के द्वारा सेवित परम पुनीत बदरिकाश्रम को गमन करने की कामना वाला मैं हो गया था । फिर हिमवान् जैसे महा विशाल पर्वत में समुचित मार्ग को छोड़कर परम रम्य और प्रदेश के आलोकन में आकुल गहन वन में प्रवेश कर रहा था ।६७-६८। पूर्व

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १८१

दिशा कर उद्देश्य करके एक कोश भर हो गया था। वहाँ पर भाग्य के वशीभूत होकर मैं भय से उत्पीड़ित होकर भाग दिया था ।६६। मैं फिर भूमि पर गिर गया था। आपने कृपा करके इस समय मैं फिर मुझे भूमि से उठाया था। दयालु आपने पिता की ही भाँति मेरे पर कृपा की थी जैसे पिता अपने पुत्र पर अत्यधिक प्रेम किया करता है। मेरा यही इतना वृत्तान्त है जो कि मेरे द्वारा पूर्ण रूप से आपके समक्ष में कह दिया गया है ।७०।

वसिष्ठ उवाच—इति पृष्टस्तदा तेन स्ववृत्तांतमशेषतः ।
कथयामास राजेंद्र रामस्तस्मै यथाक्रमम् ॥७१
ततस्तौ प्रीतिसंयुक्तौ कथयंतौ परस्परम् ।
स्थित्वा नाति चिरं कालमथ गंतुमियेष सः ॥७२
अन्वीयमानस्तेनाथ रामस्तस्माद्गुहामुखात् ।
निष्क्रम्यावसथं पित्रोः स प्रतस्थे मुदान्वितः ॥७३
अकृतव्रण एवासौ व्याघ्रेण भुवि पातितः ।
रामेण रक्षितश्चाभूद्यस्माद्व्याघ्रं विनिघ्नता ॥७४
तस्मात्तदेव नामास्य बभूव प्रथितं भुवि ।
विप्रपुत्रस्य राजेंद्र तदेतत्सोऽकृतव्रणः ॥७५
तदा प्रभृति रामस्य छायेवातपगा भुवि ।
बभूव मित्रमत्यर्थं सर्वावस्थासु पार्थिव ॥७६
स तेनानुगतो राजन्भृगोरासाद्य सन्निधिम् ।
दृष्ट्वा ख्यातिं च सोऽभ्येत्य विनयेनाभ्यवादयत् ॥७७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—हे राजेन्द्र ! उस समय में इस प्रकार से उस विप्रसुत के द्वारा पूछे गये रामने कहकर सुना दिया था ।७१। इसके अनन्तर वे दोनों परस्पर में प्रीति से समन्वित होकर वार्त्तालाप करते रहे थे। अत्यधिक कालतक वहाँ न ठहरकर उसने गमन करने की इच्छा की थी ।७२। राम भी उसके पश्चात् उसी के पीछे गमन करने वाला हो गया था और उस गुफा के मुख से निकलकर बड़े आनन्द के साथ अपने माता-पिता के निवास स्थान की ओर उसने भी प्रस्थान कर दिया था ।७३। व्याघ्र के द्वारा भूमि में गिरा भी दिया गया था तो भी उसके देह में कोई भी कहीं

१८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पर व्रण नहीं हुआ था । उस विनिहनन करने वाले व्याघ्र से वह राम के द्वारा सुरक्षित हुआ था ।७४। हे राजेन्द्र ! इसी कारण से इसका नाम भूमण्डल में प्रथित हो गया था फिर उस विप्र के पुत्र का अकृत व्रण ही नाम पड़ गया था ।७५। हे पार्थिव ! तभी से लेकर आतप के पीछे गमन करने वाली छाया के ही समान वह भूमि में सभी प्रकार की अवस्थाओं में उसका अत्यधिक प्रिय मित्र हो गया था ।७६। हे राजन् भृगु की सन्निधि को प्राप्त करके वह उसी के साथ अनुगत हो गया था और ख्याति को देखकर वह सामने उपस्थित हुआ था तथा विनय के साथ उसने अभिवादन किया था ।७७।

स ताभ्यां प्रियमाणाभ्यामाशीर्भिरभिनंदितः । दिनानि कतिचित्तत्र न्यवसत्तत्प्रियेप्सया ॥७८ ततस्तयोरनुमते च्यवनस्य महामुनेः । आश्रमं प्रतिचक्राम शिष्यसंघैः समावृतम् ॥७९ नियंत्रितांतः करणं तं च संशांतमानसम् । सुकन्या चापि तद्भार्यामवंदत महामनाः ॥८० ताभ्यां च प्रीतियुक्ताभ्यां रामः समभिनंदितः । और्वाश्रमं समापेदे द्रष्टुकामस्तपोनिधिम् ॥८१ तं चाभिवाद्य मेधावी तेन च प्रतिनंदितः । उवास तत्र तत्प्रीत्या दिनानि कतिचिन्नृप ॥८२ विसृष्टस्तेन शनकैऋँ चीकभवनं मुदा । प्रतस्थे भार्गवः श्रीमानकृतव्रणसंयुतः ॥८३ अवंवत पितुः पित्रोर्नत्वा पादौ पृथक् पृथक् । तौ च तं नृपसंहर्षाच्चाशिषा प्रत्यनन्दताम् ॥८४

परमप्रीति से समन्वित उन दोनों के द्वारा वह आशीर्वचनों से अभिनन्दित किया गया था । उसके प्रिय करने की अभिलाषा से उसने वहाँ पर कुछ दिन तक निवास किया था ।७८। इसके उपरान्त उन दोनों की अनुमति से शिष्यों के समुदायों से समावृत महामुनि च्यवन के आश्रम की ओर वह चला गया था ।७९। उस महान मन वाले ने अपने अन्तः-करण को नियन्त्रण में रहने वाले और परम शान्त मन वाले उस महा मुनि की तथा सुकन्या

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १८३

नाम धारिणी जो उनकी भार्या थी उसकी वन्दना की थी ।८०। परम प्रीति से सुसम्पन्न उन दोनों के द्वारा राम का भली-भाँति अभिनन्दन किया गया था। तप की निधि का दर्शन करने की कामना वाले उसने और्व के आश्रम को प्राप्त किया था ।८१। हे नृप ! मेधावी राम ने उनका अभिवादन किया था और और्व महामुनि के द्वारा राम का अभिनन्दन किया गया था। वहाँ पर उनकी प्रीति होने से वह कतिपय दिनों तक रहा था ।८२। फिर धीरे से आनन्द के साथ उस मुनि के द्वारा राम की विदाई की गयी थी और अकृतव्रण के ही सहित श्रीमान् भार्गव ने वहाँ से प्रस्थान किया था ।८३। पिता के पिता-माता के चरणों में पृथक्-पृथक् वन्दना की थी। हे नृप ! उन दोनों ने उसका बड़े ही हर्ष से अभिनन्दन किया था ।८४।

पृष्टश्च ताभ्यामखिलं निजवृत्तमुदारधीः । कथयामास राजेंद्र यथावृत्तमनुक्रमात् ॥८५ स्थित्वा दिनानि कतिचित्तत्रापि तदनुज्ञया । जगामावसथं पित्रोर्मुदा परमया युतः ॥८६ अभ्येत्य पितरौ राजन्नासीनावाश्रमोत्तमे । अवंदत तयोः पादौ यथावद्भृगुनन्दनः ॥८७ पादप्रणामावनतं समुत्थाय च सादरम् । आश्लिष्य नेत्रसलिलेनैतदंतो पर्यषिंचताम् ॥८८ आशीर्भिरभिनन्द्यांके समारोप्य मुहुर्मुखम् । वीक्षंतौ तस्य चांगानि परिस्पृश्यापतुर्मुदम् ॥८९ अपृच्छतां च तौ रामं कालेनैतावता त्वया । किं कृतं पुत्र को वायं कुत्र वा त्वमुपस्थितः ॥९० कथं सह सकाशे त्वमास्थितो वात्र वागतः । त्वयैतदखिलं वत्स कथ्यतां तथ्यमावयोः ॥९१

फिर उन दोनों के द्वारा उदार बुद्धि वाले उससे अपना वृत्तान्त पूर्ण रूप से पूछा गया था। हे राजेन्द्र ! जो कुछ भी जिस तरह से हुआ था वह अनुक्रम के साथ राम ने कहा था ।८५। वहाँ पर भी कुछ दिन तक स्थित रहकर फिर उनकी अनुज्ञा से परम आनन्द से संयुक्त होकर माता-पिता के

१८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

निवास स्थान को वह चला गया था ।८६। हे राजन् ! उस परमोत्तम आश्रम में माता-पिता विराजमान थे । उनके सामने उपस्थित होकर भृगुनन्दन ने उन दोनों के चरणों में यथोचित रीति से वन्दना की थी ।८७। उन्होंने अपने चरणों में मस्तक झुकाने वाले राम को आदर के साथ उठाकर आश्लेषण किया था और परमानन्दित होते हुए अपने वात्सल्य के कारण आये हुए प्रेमाश्रुओं से उसका परिषिञ्चन किया था ।८८। आशीर्वादों के द्वारा अभि-नन्दन करके उन्होंने अपनी गोद में बिठा लिया था और बारम्बार उस अपने पुत्र के मुख का अवलोकन करते हुए उसके अङ्गों का परिस्पर्श करके परमाधिक आनन्द को प्राप्त हुए थे ।८९। उन दोनों ने राम से पूछा था हे पुत्र ! इतने लम्बे समय तक आपने क्या किया था और यह दूसरा कौन तुम्हारे साथ में है तथा तुम कहाँ इतने समय पर्यन्त रहे थे ? ।६०। किस प्रकार से तुम सकाश में साथ समास्थित हुए थे अथवा यहाँ पर कहाँ से इस समय में समागत हुए थे ? हे वत्स ! आपको हम दोनों के सामने जो भी सत्य-सत्य हो वह सब बतला देना चाहिए ।६१।

—×—

कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन

वशिष्ठ उवाच–इति पृष्टस्तदा ताभ्यां रामो राजन्कृतांजलिः।
तयोरकथयत्सर्वमात्मना यदनुष्ठितम् ॥१
निदेशाद्वै कुलगुरोस्तपश्चरणमात्मनः ।
शंभोर्निदेशात्तीर्थानामटनं च यथाक्रमम् ॥२
तदाज्ञयैव दैत्यानां वधं चामरकारणात् ।
हरप्रसादादत्रापि ह्यकृतव्रणदर्शनम् ॥३
एतत्सर्वमशेषेण यदन्यच्चात्मना कृतम् ।
कथयामास तद्रामः पित्रोः संप्रीयमाणयोः ॥४
तौ च तेनोदितं सर्वं श्रुत्वा तत्कर्मविस्तरम् ।
हृष्टौ हर्षांतरं भूयो राजन्नाप्नुवतावुभौ ॥५
एवं पित्रोर्महाराज शुश्रूषां भृगुपुंगवः ।
प्रकुर्वंस्तद्विधेयात्मा भ्रातृणां चाविशेषतः ॥६

कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १८५

एतस्मिन्नेव काले तु कदाचिद्धैहयेश्वरः । इयेष मृगयां गंतुं चतुरंगबलान्वितः ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा—हे राजन् ! जब उस समय में इस प्रकार से राम से पूछा गया था तो उसने अपने दोनों करों को जोड़कर उन दोनों के समक्ष में वह सम्पूर्ण अपना घटित घटनाओं का इतिवृत्त कह दिया था जो भी कुछ अपने द्वारा अब तक किया था ।१। अपने कुलदेव की आज्ञा से अपनी तपश्चर्या का समाचरण तथा भगवान शम्भु के निर्देश से यथाक्रम तीर्थों का पर्यटन जो किया था—वह सभी कुछ निवेदित कर दिया था ।२। फिर शंकर की ही आज्ञा से देवों की सुरक्षा करने के कारण से जो दैत्यों का वध किया था वह भी सुना दिया था । यहाँ पर भी भगवान हर के प्रसाद से ही अकृत व्रण का दर्शन हुआ था ।३। यह सम्पूर्ण पूर्णतया जो हुआ था वह और जो अपने द्वारा कुछ भी किया गया था वह सब परम प्रसन्न माता-पिता के सामने राम ने कहकर सुना दिया था ।४। उन दोनों ने राम के द्वारा कहा हुआ सब उसके कर्मों का विस्तार श्रवण किया था और परम प्रसन्न हुए थे । हे राजन् ! फिर वे दोनों एक दूसरे हर्ष को भी प्राप्त हुए थे ।५। हे महाराज ! इस रीति से उस भृगुकुल में परम श्रेष्ठ राम ने अपने माता-पिता की शुश्रूषा करते हुए पूर्णतया उनके प्रति अपने कर्त्तव्य का सविनय पालन किया था और अपने भाइयों की भी सेवा उसी भाव से उसने की थी ।६। इसी समय में किसी वक्त हैहयेश्वर चतुरङ्गिणी सेना के सहित मृगया करने को गमन करने वाला हुआ था ।७।

संरज्यमाने गगने बंधूककुसुमारुणैः । ताराजालद्युतिहरैः समंतादरुणांशुभिः ॥८ मंदं वीजति प्रोद्भूतकेतकीवनराजिभिः । प्राभातिके गंधवहे कुमुदाकरसंस्पृशि ॥९ वयांसि नर्मदातीरतरुनीडाश्रयेषु च । व्याहरन्स्वाकुला वाचो मनः श्रोत्रसुखावहाः ॥१० नर्मदातीरतीर्थं तदवतीर्याघहारिणि । तत्तोये मुनिवृंदेषु गृणत्सु ब्रह्म शाश्वतम् ॥११

१८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विधिवत्कृतमैत्रेषु सन्निवृत्य सरित्तटात् । आश्रमं प्रति गच्छत्सु मुनिमुख्येषु कर्मिषु ॥१२ प्रत्येकं वीरपत्नीषु व्यग्रासु गृहकर्मसु । होमार्थं मुनिकल्पाभिर्दुह्यमानासु धेनुषु ॥१३ स्थाने मुनिकुमारेषु तं दोहं हि नयत्सु च । अग्निहोत्राकुले जाते सर्वभूतसुखावहे ॥१४

अब उस वेला की अद्भुत छटा का वर्णन किया जाता है—उस समय में चारों ओर अरुण अंशुओं वाली और तारागण की द्युति का हरण करने वाली बन्धूक पुष्पों की अरुणता से आकाश मण्डल संरज्यमान हो रहा था ।८। विकसित केतकी के वनों की पंक्तियों के द्वारा मद को समुद्भूत करते हुए तथा कुमुदों से युक्त सरोवरों का स्पर्श करने वाला प्रातः काल का सुन्दर एवं सुख स्पर्श वायु वहन कर रहा था ।६। पक्षीगण उस समय में नर्मदा के तट पर उगे हुए तरुवरों के नीड़ों के आश्रमों में अपनी समाकुल और मन तथा कानों को परम सुख प्रदान करने वाली वाणियां बोल रहे थे ।१०। नर्मदा का तट तीर्थ है उस तीर्थ में उतर कर पापों के हरण करने वाले उस जल में मुनिवृन्द निरन्तर ब्रह्म अर्थात् वेद वचनों का गान कर रहे थे ।११। विधि-विधान के साथ नित्यानुष्ठान करके नर्मदा नदी के तीर से वापिस लौट कर कर्मों के करने वाले प्रमुख मुनिगण अपने-अपने आश्रमों की ओर गमन कर रहे थे ।१२। प्रत्येक वीरों की पत्नियां अपने-अपने गृहों के आवश्यक कर्मों में उस समय में संलग्न हो रही थीं । सर्वथा मुनियों के ही सदृश बहुत सी मुनि पत्नियां होम कर्म के सम्पादन करने के लिए धेनुओं का दोहन कर रही थीं ।१३। मुनियों के कुमार दोहन किये हुए दुग्ध को समुचित स्थानों पर पहुँचा रहे थे तथा समस्त प्राणियों को सुख का आवाहन करने वाले होम के होने पर अग्निहोत्र में सभी समाकुल हो रहे थे ।१४।

विकसत्सु सरोजेषु गायत्सु भ्रमरेषु च । वाशत्सु नीडान्निष्पत्य पतात्रिषु समंततः ॥१५ अनतिव्यग्रमत्तेभतुरंगरथगामिनाम् । गात्राह्लादविवर्द्धिन्यां वेलायां मंदवायुना ॥१६ इच्छत्सु चाश्रमोपांतं प्रसूनजलहारिषु ।

कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १८७

स्वाध्यायदक्षैर्बहुभिरजिनांबरधारिभिः ॥१७ सम्यक् प्रयोज्यमानेषु मंत्रेषूच्चावचेषु च । प्रैषेषूच्चार्यमाणेषु हूयमानेषु वह्निषु ॥१८ यथावन्मंत्रतंत्रोक्तक्रियासु विततासु च । ज्वलदग्निशिखाकारे तमस्तपनतेजसि ॥१९ प्रतिहत्य दिशः सर्वा विवृण्वाने च मेदिनीम् । सवितुर्युदयं याति नैशे तमसि नश्यति ॥२० तारकासु विलीनासु काष्ठासु विमलासु च । कृतमैत्रादिको राजा मृगयां हैहयेश्वरः ॥२१

उस प्रातःकालीन वेला में सभी ओर कमल खिले उठे थे और विकसित पंकजों के ऊपर भ्रमरों के वृन्द गुञ्जार रहे थे । सभी ओर से अपने-अपने घोंसलों से पक्षीगण नीचे उतर कर अपना अशन कर रहे थे ।१५। उस समय में मन्द वायु वहन कर रही थी और सुमधुर बेला में जो भी विशेष व्यग्र नहीं थे ऐसे मदोन्मत्त हाथी-अश्व और रथों द्वारा गमन करने वालों के शरीर को आह्लाद का विवर्द्धन हो रहा था ।१६। बहुत से कर्मनिष्ठ जन पुष्प और तीर्थजल का आहरण करके अपने-अपने आश्रमों की ओर गमन कर रहे थे । वेदों के स्वाध्याय करने में परम दक्ष बहुत से मृगचर्मों के धारण करने वालों के द्वारा भली-भाँति उच्चावच मन्त्रों के प्रयोग किये जा रहे थे तथा प्रैषों का उच्चारण किया जा रहा था । अग्नि में आहुतियाँ दी जा रही थीं ।१७-१८। रीति के अनुसार मन्त्र शास्त्र और तन्त्रशास्त्र में वर्णित क्रियाओं का विस्तार हो रहा था । जलती हुई अग्नि की शिखा के आकार वाले तपन के तेज में समस्त दिशाओं में तप को प्रतिहत करके वसुन्धरा पर वह फैला हुआ था । सूर्यदेव के उदित हो जाने पर उस समय में रात्रि के समय का अन्धकार विनष्ट हो रहा था ।१९-२०। जिस समय में समस्त तारागण विलीन हो गये थे और सभी दिशाएँ एकदम स्वच्छ दिखलाई दे रही थीं । उस समय में हैहयेश्वर राजा प्रातःकालीन सब कृत्य पूर्ण करके शिकार करने के लिए चल दिया था ।२१।

निर्ययौ नगरात्तस्मात्पुरोहितसमन्वितः । बलैः सर्वैः समुदितैः सवाजिरथकुंजरैः ॥२२

१८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सचिवैः सहितः श्रीमान् सवयोभिश्च राजभिः । महता बलभारेण नमयन्वसुधातलंम् ॥२३ नादयन् रथघोषेण ककुभः सर्वतो नृपः । स्वबलौघपदक्षेपप्रक्षुण्णावनिरेणुभिः ॥२४ ययौ संच्छादयन्व्योम विमानशतसंकुलम् । संप्रविश्य वनं घोरं विंध्याद्रेर्बलसंचयैः ॥२५ भृशं विलोलयामास समंताद्राजसत्तमः । परिवार्य वनं तत्तु स राजा निजसैनिकैः ॥२६ मृगान्रानाविधान्हिंस्रान्निजघान शितैः शरैः । आकर्णकृष्टकोदंडयोधमुक्तैः शितेषुभिः ॥२७ निकृत्तगात्राः शार्दूला न्यपतन्भुवि केचन । उदग्रवेगपादातखड्गखंडितविग्रहाः ॥२८

रथ-हाथी और अश्वों से समन्वित समस्त सैनिकों से युक्त होकर अपने पुरोहित के साथ वह राजा हैहयेश्वर अपने नगर से शिकार करने के लिए निकल दिया था ।२२। अपने सभी सचिवों के साथ और वयोवृद्ध अन्य कितने ही राजाओं को साथ में लेकर श्रीमान् वह बड़ी भारी सेना के वीरों के भार से समस्त वसुधा को नीचे की ओर झुकाते हुए वह चल रहा था ।२३। वह राजा अपनी सेना के रथों के चलने की ध्वनि से सभी दिशाओं को गुञ्जित कर रहा था और अपनी सेना के समुदायों के सहित प्रवेश करके सैकड़ों विमानों (वायुयानों) से आकाश को संछादित करता हुआ वह राजा था । उस राजेश्वर ने अपने सैनिकों के द्वारा उस सम्पूर्ण वन घेरकर परमश्रेष्ठ नृप वे उस स्थल को अत्यन्त विलोलित कर दिया था ।२५-२६। उस नृप ने अपने कानों तक समाकृष्ट धनुषों की प्रत्यञ्चा वाले योद्धाओं के द्वारा छोड़े हुए तीक्ष्ण बाणों से वहाँ पर अनेक प्रकार के हिंस्रक पशुओं का हनन किया था ।२७। अतीव उदग्र वेग से युक्त पदातियों के खड्गों से खण्डित शरीर वाले जिनके शरीर के भाग कट गये हैं ऐसे कुछ शार्दूल यहाँ पर भूमि में गिर गये थे ।२८।

वराहयूथपाः केचिद्रुधिरार्द्रा धरामगुः । प्रचंडशाक्तिकोन्मुक्तशक्तिनिर्भिन्नमस्तकाः ॥२९

कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १८६

मृगौघाः प्रत्यपद्यंत पर्वता इव मेदिनीम् ।
नाराचा विद्धसर्वांगाः सिंहर्क्षरशभादयः ॥३०
वसुधामन्वकीर्यंत शोणिताद्रीः समंततः ।
एवं सवागुरैः कैश्चित्पतद्भिः पतितैरपि ॥३१
श्वभिश्चानुद्रुतैः कैश्चिद्धावमानैस्तथा मृगैः ।
आर्त्तैर्विक्रोशमानैश्च भीतैः प्राणभयातुरैः ॥३२
युगापाये यथात्यर्थं वनमाकुलमाबभौ ।
वराहसिंहशार्दूलश्वाविच्छशकुलानि च ॥३३
चमरीरुरुगोमायुगवयर्क्षवृकान्बहून् ।
कृष्णसारान्द्वीपिमृगानुक्तखड्गमृगानपि ॥३४
विचित्रांगान्मृगानन्यान्यंकूनपि च सर्वशः ।
बालान्स्तनंधयान्यूनः स्थविरान्मिथुनान्गणान् ॥३५

बहुत ही प्रचण्ड शक्तिशाली वीरों के द्वारा छोड़ी हुई शक्तियों से कटे हुए मस्तक वाले कुछ वराहों के यूथ रुधिर से लथपथ होकर पृथ्वी पर गिर गये थे ।२६। मृगों के समुदाय पर्वतों के ही समान भूमि पर पड़े हुए थे और सिंह-रीछ और शरभ आदिक धनुषों के तीरों से विद्ध समस्त अङ्गों वाले हो गये थे ।३०। इस प्रकार से कुछ सवागुर गिरते हुए और गिरे हुओं के द्वारा सभी ओर सम्पूर्ण पृथ्वी तल को रक्त से भीगी हुई करके अनुकीर्ण कर दिया था । कुछ मृग कुत्तों के द्वारा खदेड़े हुए होकर भाग रहे थे और और आर्त्त होकर चीखें मारते हुए प्राणों के भय से अति आतुर और भयभीत हो रहे थे ।३१-३२। जिस तरह से युग के अन्त समय में सर्वत्र विभीषिका से पूर्ण स्थिति हुआ करती है ठीक उस समय से अत्यन्त आतुर हो रहे थे जिसके कारण वह सम्पूर्ण वन समाकुल होकर शोभित हो रहा था ।३३। वहाँ पर चमरी-रुरु-गोमायु-गवय-रीछ और बहुत से वृक-कृष्णसार-द्वीपी-मृग रक्त खड्ग मृग-विचित्र अङ्गों वाले मृग और न्यंकु आदि सभी ओर मारे जा रहे थे जिनमें दूध पीने वाले बहुत से बहुत छोटे पशु थे और बालक वृद्ध तथा जवान पशुओं के जोड़े भी थे । वहाँ पर सभी का निहनन किया जा रहा था ।३४-३५।

१६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

निजघ्नुर्निशितैः शस्त्रैः शस्त्रवध्यान्हि सैनिकाः । एवं हत्वा मृगान् घोरान्हिंस्रप्रायानशेषतः ॥३६ श्रमेण महता युक्ता बभूवुर्नृपसैनिकाः । मध्ये दिनकरे प्राप्ते ससैन्यः स तदा नृपः ॥३७ नर्मदां घर्मसंतप्तः पितासुरगमच्छनैः । अवतीर्य ततस्तस्यास्तोये सबलवाहनः ॥३८ विजगाह शुभे राजा क्षुत्तृष्णापरिपीडितः । स्नात्वा पीत्वा च सलिलं स तस्याः सुखशीतलम् ॥३९ बिसांकुराणि शुभ्राणि स्वादूनि प्रजघास च । विक्रीड्य तोये सुचिरमुत्तीर्य सबलो नृपः ॥४० बिशश्राम च तत्तीरे तरुखंडोपमंडिते । आलंबमाने तिग्मांशौ ससैन्यः सानुगो नृपः ॥४१ निश्चक्राम पुरं गंतुं विंध्याद्रिवनगह्वरात् । स गच्छन्नेव ददृशे नर्मदा तीरमाश्रितम् ॥४२

राजा के सैनिकों ने शस्त्रों के द्वारा वध करने के जो भी पशु योग्य थे उन सबका पैने शस्त्रों से हनन कर दिया था । इस प्रकार से प्रायः हिंसा करने वाले महान घोर पशुओं का वहाँ पर पूर्ण रूप से हनन किया था ।३६। इस तरह से शिकार करने से शिकार करने से नृप के सैनिक बड़े भारी श्रम से थक गये थे । भुवन भास्कर सूर्यदेव मध्य में प्राप्त हो गये थे । उस समय दोपहरी के वक्त में राजा अपनी सेना के सहित सूर्यातप से बेचैन हो गया था ।३७। घाम से संतप्त होकर प्यासा राजा धीरे से नर्मदा के तट पर चला गया था और फिर वह उस नर्मदा के जल में सब वाहनों और संनिकों के सहित उतर गया था ।३८। भूख और प्यास से उत्पीड़ित राजा ने उस शुभ जल में अवगाहन किया था और उस नदी के परम शीतल जल में स्नान किया था और उसका पान भी किया था ।३९। अपनी समस्त सेना के सहित राजा ने उसके जल के भीतर उतर कर बहुत काल पर्यन्त विशेष रूप से जल-क्रीड़ा की थी तथा परम स्वादिष्ट शुभ्र विस के तन्तुओं का अशन भी किया था ।४०। जब सूर्यदेव आलम्बमाने हो गये थे तो सब अनुचरों और

कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १६१

सैनिकों सहित राजा ने तरुवरों के समूह से मण्डित उस सरिता के तट पर विश्राम किया था। फिर उन विन्ध्याचल के गहन वन से अपने नगर में जाने के लिये राजा निकल दिया था। वहाँ से गमन करते हुए ही उसने नर्मदा के तट पर समाश्रित एक आश्रम का दर्शन दिया था ।४१-४२।

आश्रमं पुण्यशीलस्य जमदग्नेर्महात्मनः ।
ततो निवृत्त्य सैन्यानि दूरेऽवस्थाप्य पार्थिवः ॥४३
परिचारैः कतिपयैः सहितोऽयात्तदाश्रमम् ।
गत्वा तदाश्रमं रम्यं पुरोहितसमन्वितः ॥४४
उपेत्य मुनिशार्दूलं ननाम शिरसा नृपः ।
अभिनंद्याशिषा तं वै जमग्निर्नृपोत्तमम् ॥४५
पूजयामास विधिवदर्घपाद्यासनादिभिः ।
संभावयित्वा तां पूजां विहितां मुनिना तदा ॥४६
निषसादासने शुभ्रे पुरस्तस्य महामुनेः ।
तमासीनं नृपवरं कुशासनगतो मुनिः ॥४७
पप्रच्छ कुशलप्रश्नं पुत्रमित्रादिबंधुषु ।
सह संकथयंस्तेन राज्ञा मुनिवरोत्तमः ॥४८
स्थित्वा नातिचिरं कालमातिथ्यार्थं न्यमंत्रयत् ।
ततः स राजा सुप्रीतो जमदग्निमभाषत ॥४९

वह एक महान् आत्मा वाले और पुण्यशील जमदग्नि मुनि का आश्रम था। राजा ने वहाँ से लौटकर कुछ दूरी पर अपनी सेनाओं को अब स्थापित कर दिया था ।४३। अपने साथ में कतिपय परिचारकों को लेकर ही वह उस आश्रम में गया। पुरोहित के सहित ही राजा ने उस परम रम्य आश्रम में गमन किया था ।४४। राजा ने वहाँ पर पहुँच कर उस मुनिशार्दूल के चरणों में शिर झुकाकर प्रणाम किया था। जमदग्नि ने उस श्रेष्ठ राजा का आशीर्वचनों के द्वारा अभिनन्दन किया था ।४५। मुनि ने अर्घ्य-पाद्य और आसन आदि के द्वारा उस राजा का अर्चन किया था। उस समय में मुनि के द्वारा की हुई पूजा को स्वीकार किया था ।४६। फिर राजा उन महामुनि के सामने परम शुभ्र आसन पर विराजमान हो गया था। जब राजा अपने

१६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

आसन पर उपविष्ट हो गये तो वे मुनिवर जमदग्नि एक कुशा के आसन पर संस्थित हो गये थे ।४७। महामुनि ने उस राजा के साथ संलाप करते हुए पुत्र-मित्र और बन्धु आदि के विषय में राजा से क्षेम-कुशल पूछा था ।४८। थोड़े ही समय तक स्थित होकर महामुनि ने अपना अतिथि-सत्कार करने के लिए राजा को निमन्त्रित किया था। इसके अनन्तर राजा परम प्रीतिमान् होकर जमदग्नि मुनि से बोला था ।४६।

महर्षे देहि मेऽनुज्ञां गमिष्यामि स्वकं पुरम् ।
समग्रवाहनबलो ह्यहं तस्मान्महामुने ।।५०
कर्तुं न शक्यमातिथ्यं त्वया वन्याशिना वने ।
अथवा त्वं तपः शक्त्या कर्तुमातिथ्यमद्य मे ।।५१
शक्नोष्यापि पुरीं गंतुं मामनुज्ञातुमर्हसि ।
अन्यथा चेत्खलैः सैन्यैरत्यर्थं मुनिसत्तम ।।५२
तपस्विनां भवेत्पीडा नियमक्षयकारिका ।

वसिष्ठ उवाच—

इत्येवमुक्तः स मुनिस्तं प्राह स्थीयतां क्षणम् ।।५३
सर्वं संपादयिष्येऽहमातिथ्यं सानुगस्य ते ।
इत्युक्त्वाहूय तां दोग्ध्रीमुवाचायं ममातिथिः ।।५४
उपागतस्त्वया तस्मात्क्रियतामद्य सत्कृतिः ।
इत्युक्ता मुनिना दोग्ध्री सातिथेयमशेषतः ।
दुदोह नृपतेराशु यद्योग्यं मुनिगौरवात् ।।५५
अथाश्रमं तत्सुरराजसद्मनिकाशमासीद्भृगुपुंगवस्य ।
विभूतिभेदैरविचिन्तरूपमनन्यसाध्यं सुरभिप्रभावात् ।।५६

हैहयेश्वर राजा ने महामुनि से प्रार्थना की थी कि हे महर्षे ! आप मुझे अपनी आज्ञा दीजिए । मैं अब अपने पुर को गमन करूँगा । हे महामुने ! कारण यह है कि मेरे साथ समस्त सेनाएँ वाहन भी हैं ।५०। इस वन में वन्य फल मूलों का अशन करने वाले आपके द्वारा आतिथ्य नहीं किया जा सकता है। अथवा यह भी हो सकता है कि आप अपनी तपश्चर्या की

कार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १६३

शक्ति से मेरा आतिथ्य करने की सामर्थ्य रखते हैं तो भी यह उचित नहीं है और आप मुझे मेरी नगरों की ओर गमन करने की आज्ञा देने के योग्य हैं। अन्य प्रकार से अर्थात् यदि मैं ठहर भी जाऊँ तो हे मुनि श्रेष्ठ ! ये सैनिक बड़े ही दुष्ट स्वभाव वाले हैं। इनके द्वारा तपस्वियों के नियमों क्षय करने वाली बहुत ही अधिक आप लोगों को पीड़ा हो जायगी ।५१। वसिष्ठ जी ने कहा—इस तरह से जब राजा के द्वारा मुनिवर से कहा गया था तो उन महामुनि ने राजा से कहा था कि आप कुछ क्षण के लिए यहाँ पर विराजमान तो रहिए ।५२-५३। मैं आपका समस्त अनुगामियों के ही सहित पूरा आतिथ्य सत्कार सम्पन्न कर दूँगा। इतना राजा से कहकर उस महा- मुनि ने दोग्ध्री धेनु को बुलाकर उससे कहा था कि यह राजा आज मेरे अतिथि के स्वरूप में समागत हो गये हैं ।५४। जब यह यहाँ पर समागत हो गये हैं तो इसी कारण से आप इनका आज पूर्णतया सत्कार करिए। इस रीति से मुनि के द्वारा कही हुई उस दोग्ध्री ने महामुनि के गौरव के कारण पूर्णरूप से राजा का आतिथेय किया था और जो-जो भी राजा के आतिथ्य के योग्य पदार्थ थे वे सभी बहुत शीघ्र दोहन करके उपस्थित कर दिये थे ।५५। इसके अनन्तर उस सुरभि के प्रभाव से उस श्रेष्ठ मुनि का आश्रम सुरराज के सद्म के समान वैभवों के अनेक भेदों के द्वारा ऐसा न सोचने के योग्य स्वरूप वाला हो गया था कि जो अन्य किसी के भी द्वारा साध्य नहीं हो सकता है ।५६।

अनेकरत्नोज्ज्वलचित्रहेमप्रकाशमालापरिवीतमुच्चैः । पूर्णेन्दुशुभ्राभ्रविषक्तशृंगैः प्रासादसंघैः परिवीतमंतः ॥५७ कांस्यारकूटारसिताग्रहेमदुर्वर्णसौधोपलदारुमृद्भिः । पृथग्विभिन्नैर्भवनैरनेकः सद्भासितं नेत्रमनोभिरामैः ॥५८ महार्हरत्नोज्ज्वलहेमवेदिका निष्कूटसोपानकुटीविटंकैः । तुलाकपाटार्गलकुड्यदेहली निशांतशाला- जिरशोभितंभृं शम् ।।५६ वलभ्यलिन्दांगणचारुतोरणैरदभ्रपर्यन्तचतुष्किकादिभिः । कुड्येषु संशोभित दिव्यरत्नैर्विचित्रचित्रैः परिशोभमानैः ॥६० उच्चावचै रत्नवरैर्विचित्रसुवर्णसिंहासनपीठिकाद्यैः ।

१६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स भक्ष्यभोज्यादिभिरन्नपानैरुपेतभांडोपगतैकदेशः ॥६१ गृहैरमर्त्योचिपसर्वसंपत्समन्वितैर्नेत्रमनोऽभिरामै । तस्याश्रमं संन्नगरोपमानं बभौ वधूभिश्च मनोहराभिः ॥६२

अब सुरभि की महिमा के आश्रम की जैसी परम विशाल शोभा हुई थी उसकी छटा का वर्णन किया जाता है--उस आश्रम के अन्दर का भाग नाना भाँति के रत्नों की देदीप्यमान द्युति से विचित्र हो गया था और सुवर्ण के चाकचिक्य से संयुत प्रकाश माला से घिरा हुआ था तथा पूर्ण चन्द्र के समान परम शुभ्र ओर अत्युच्च अन्तरिक्ष को छूने वाली शिखरों से समन्वित प्रासादों से चारों ओर परिपूर्ण वह आश्रम हो गया था ।५७। कांस्य-आरकूट-ताम्र-हेम-सुवर्णं सौधोपल-दारु और मृत्तिका के पृथक्-पृथक् और मिश्रित नेत्रों तथा मन को परम अभिराम प्रतीत होने वाले अनेक भवनों से वह आश्रम समुद्भासित हो गया था ।५८। उस महामुनि का वह आश्रम उस समय में महा मूल्यवान रत्नों से समुज्ज्वल था और हेम की वेदिका-निष्कूट-सोपान-कुटी और विटंककों से समन्वित था। तुला-कपाट-अर्गला-कुड्य (भीत)-देहली-निशान्तशाला-अजिर (आँगन) की शोभा से बहुत ही वह आश्रम संयुत था ।५९। वलभी-अलिन्द-अङ्गण और परम रम्य तोरणों से युक्त था तथा अदभ्र चतुष्किका आदि से विशोभित था। उस आश्रम में जो स्तम्भ बने हुए थे उनमें और जो दीवारें थीं उनमें परिशोभमान दिव्य रत्नों के विचित्र चित्र विद्यमान थे। इनसे उस आश्रम की अद्भुत शोभा हो रही थी ।६०। वह महामुनि का आश्रम छोटे व कीमती श्रेष्ठ रत्नों से युक्त था और उसमें अत्यद्भुत सुवर्ण के अनेक सिंहासन और पीठिका आदि निर्मित थे। उस आश्रम के एक देश में भक्ष्य और भोज्य-लेह्य-चोष्य आदि अशनोपयोगी पदार्थ वत्तंमान थे तथा अन्न-पानों से समुपेत भाण्ड भी वहाँ पर विद्यमान थे ।६१। उसमें ऐसे अनेक गृह बने हुए थे जो देवों के लायक सब प्रकार की नयनों और मन के परम रमणीक लगने वाली सम्पदा से समन्वित थे। वह मुनि का आश्रम सुरभि की महिमा से मनोहर बन्धुओं से सुन्दर नगर के समान परमशोभित हो रहा था ।६२।

—x—

जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ] [ १६५

॥ जमदग्नि द्वारा अतिथि सत्कार ॥

वसिष्ठ उवाच— तस्मिन्पुरे सन्तुलितामरेंद्रपुरीप्रभावे मुनिवर्यधेनुः । विनिर्यमे तेषु गृहेषु पश्चात्तद्योग्यनारीनरवृंदजातम् ॥१ विचित्रवेषाभरणप्रसूनगंधांशुकालंकृतविग्रहाभिः । सहावभावाभिरुदारचेष्टाश्रीकांतिसौंदर्यगुणान्विताभिः ॥२ मंदस्फुरद्दन्तमरीचिजालविद्योतिताननसरोजजितेंदुभाभिः । प्रत्यग्रयौवनभरासववल्गुगीभिः संमंथरकटाक्ष निरीक्षणाभिः ॥३ प्रीतिप्रसन्नहृदयाभिरतिप्रभाभिः शृङ्गारकल्पतरुपुष्पविभू- षिताभिः । देवांगनातुलितसौभगसौकुमार्यरूपाभिलाषमधुराकृति- रंजिताभिः ॥४ उत्तप्तहेमकलशोपमचारूपीनवक्षोरुहद्वयभरानतमध्यमाभिः । श्रोणीभराक्रमणखेदपरिश्रितासृगारक्तपावकरसारुणितां- घ्रिभूभिः ॥५ केयूरहारमणिकंकणहेमकंठसूत्रामलश्रवणमण्डलमंडिताभिः । स्रग्दामचुम्बितसकुन्तकेशपाशकांचीकलापपरिशिजित- नूपुराभिः ॥६ आमृष्टरोषपरिसांत्वननर्महासकेलीप्रियालपनभर्त्सनरोषणेषु । भावेषु पार्थिवनिजप्रियधैर्यबन्धसर्वापहारचतुरेषु कृतांतराभिः ॥७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—सन्तुलित महेन्द्र की नगरी के प्रभाव वाले उस पुर में मुनिवर की धेनु ने उन गृहों में इसके पश्चात् उनके ही योग्य नर-नारियों के समुदायों की रचना भी कर दी थी ॥१॥ अब जो नारीगणों का निर्माण उस पुर में किया था उनकी वेष-भूषा—रूप माधुर्य—सौन्दर्य