भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

स भक्ष्यभोज्यादिभिरन्नपानैरुपेतभांडोपगतैकदेशः ॥६१ गृहैरमर्त्योचिपसर्वसंपत्समन्वितैर्नेत्रमनोऽभिरामै । तस्याश्रमं संन्नगरोपमानं बभौ वधूभिश्च मनोहराभिः ॥६२

अब सुरभि की महिमा के आश्रम की जैसी परम विशाल शोभा हुई थी उसकी छटा का वर्णन किया जाता है--उस आश्रम के अन्दर का भाग नाना भाँति के रत्नों की देदीप्यमान द्युति से विचित्र हो गया था और सुवर्ण के चाकचिक्य से संयुत प्रकाश माला से घिरा हुआ था तथा पूर्ण चन्द्र के समान परम शुभ्र ओर अत्युच्च अन्तरिक्ष को छूने वाली शिखरों से समन्वित प्रासादों से चारों ओर परिपूर्ण वह आश्रम हो गया था ।५७। कांस्य-आरकूट-ताम्र-हेम-सुवर्णं सौधोपल-दारु और मृत्तिका के पृथक्-पृथक् और मिश्रित नेत्रों तथा मन को परम अभिराम प्रतीत होने वाले अनेक भवनों से वह आश्रम समुद्भासित हो गया था ।५८। उस महामुनि का वह आश्रम उस समय में महा मूल्यवान रत्नों से समुज्ज्वल था और हेम की वेदिका-निष्कूट-सोपान-कुटी और विटंककों से समन्वित था। तुला-कपाट-अर्गला-कुड्य (भीत)-देहली-निशान्तशाला-अजिर (आँगन) की शोभा से बहुत ही वह आश्रम संयुत था ।५९। वलभी-अलिन्द-अङ्गण और परम रम्य तोरणों से युक्त था तथा अदभ्र चतुष्किका आदि से विशोभित था। उस आश्रम में जो स्तम्भ बने हुए थे उनमें और जो दीवारें थीं उनमें परिशोभमान दिव्य रत्नों के विचित्र चित्र विद्यमान थे। इनसे उस आश्रम की अद्भुत शोभा हो रही थी ।६०। वह महामुनि का आश्रम छोटे व कीमती श्रेष्ठ रत्नों से युक्त था और उसमें अत्यद्भुत सुवर्ण के अनेक सिंहासन और पीठिका आदि निर्मित थे। उस आश्रम के एक देश में भक्ष्य और भोज्य-लेह्य-चोष्य आदि अशनोपयोगी पदार्थ वत्तंमान थे तथा अन्न-पानों से समुपेत भाण्ड भी वहाँ पर विद्यमान थे ।६१। उसमें ऐसे अनेक गृह बने हुए थे जो देवों के लायक सब प्रकार की नयनों और मन के परम रमणीक लगने वाली सम्पदा से समन्वित थे। वह मुनि का आश्रम सुरभि की महिमा से मनोहर बन्धुओं से सुन्दर नगर के समान परमशोभित हो रहा था ।६२।

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