संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकार्तवीर्य का जमदग्नि आश्रम में आगमन ] [ १६३
शक्ति से मेरा आतिथ्य करने की सामर्थ्य रखते हैं तो भी यह उचित नहीं है और आप मुझे मेरी नगरों की ओर गमन करने की आज्ञा देने के योग्य हैं। अन्य प्रकार से अर्थात् यदि मैं ठहर भी जाऊँ तो हे मुनि श्रेष्ठ ! ये सैनिक बड़े ही दुष्ट स्वभाव वाले हैं। इनके द्वारा तपस्वियों के नियमों क्षय करने वाली बहुत ही अधिक आप लोगों को पीड़ा हो जायगी ।५१। वसिष्ठ जी ने कहा—इस तरह से जब राजा के द्वारा मुनिवर से कहा गया था तो उन महामुनि ने राजा से कहा था कि आप कुछ क्षण के लिए यहाँ पर विराजमान तो रहिए ।५२-५३। मैं आपका समस्त अनुगामियों के ही सहित पूरा आतिथ्य सत्कार सम्पन्न कर दूँगा। इतना राजा से कहकर उस महा- मुनि ने दोग्ध्री धेनु को बुलाकर उससे कहा था कि यह राजा आज मेरे अतिथि के स्वरूप में समागत हो गये हैं ।५४। जब यह यहाँ पर समागत हो गये हैं तो इसी कारण से आप इनका आज पूर्णतया सत्कार करिए। इस रीति से मुनि के द्वारा कही हुई उस दोग्ध्री ने महामुनि के गौरव के कारण पूर्णरूप से राजा का आतिथेय किया था और जो-जो भी राजा के आतिथ्य के योग्य पदार्थ थे वे सभी बहुत शीघ्र दोहन करके उपस्थित कर दिये थे ।५५। इसके अनन्तर उस सुरभि के प्रभाव से उस श्रेष्ठ मुनि का आश्रम सुरराज के सद्म के समान वैभवों के अनेक भेदों के द्वारा ऐसा न सोचने के योग्य स्वरूप वाला हो गया था कि जो अन्य किसी के भी द्वारा साध्य नहीं हो सकता है ।५६।
अनेकरत्नोज्ज्वलचित्रहेमप्रकाशमालापरिवीतमुच्चैः । पूर्णेन्दुशुभ्राभ्रविषक्तशृंगैः प्रासादसंघैः परिवीतमंतः ॥५७ कांस्यारकूटारसिताग्रहेमदुर्वर्णसौधोपलदारुमृद्भिः । पृथग्विभिन्नैर्भवनैरनेकः सद्भासितं नेत्रमनोभिरामैः ॥५८ महार्हरत्नोज्ज्वलहेमवेदिका निष्कूटसोपानकुटीविटंकैः । तुलाकपाटार्गलकुड्यदेहली निशांतशाला- जिरशोभितंभृं शम् ।।५६ वलभ्यलिन्दांगणचारुतोरणैरदभ्रपर्यन्तचतुष्किकादिभिः । कुड्येषु संशोभित दिव्यरत्नैर्विचित्रचित्रैः परिशोभमानैः ॥६० उच्चावचै रत्नवरैर्विचित्रसुवर्णसिंहासनपीठिकाद्यैः ।