भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ] [ १६६

बहुत ही शोभा युक्त हो गया था जो कि रुद्र की शक्ति से समन्वित था। वह सूर्य की द्युति से दिन के ही समान देदीप्यमान हो गया था।७८। वह राम त्रिनेत्र प्रभु के द्वारा अनुज्ञा प्राप्त कर सब देवों के साथ हो युद्ध करने के लिए निश्चय करते हुए असुरों के हनन को वहाँ से चल दिया था।७६। हे राजन् ! इसके पश्चात् सम्पूर्ण त्रैलोक्य के विजय करने के लिए समुद्यत उन असुरों के साथ देवगणों का महान भयङ्कर युद्ध फिर हुआ था।८०। इसके उपरान्त महान बाहुओं वाले राम ने उस महान दारुण युद्ध में क्रुद्ध होकर उसी परशु से बड़े-बड़े असुरों का हनन किया था।८१। वज्र के सदृश प्रहारों से सहस्रों दैत्यों का संहार करते हुए राम ने परम क्रोधित होकर दूसरे काल के ही समान उस युद्ध क्षेत्र में सञ्चरण किया था।८२। प्रहार करने वालों में परम श्रेष्ठ राम ने समस्त दैत्यों का हनन करके एक ही क्षण में सुर शत्रुओं का नाश कर दिया था और देवों को परम हर्षित कर दिया था।८३। राम के द्वारा मारे जाते हुए सब दैत्यों और दानवों ने जो भी कुछ मरने से बच गये थे बहुत भय से युक्त होकर सभी ओर राम को ही देख रहे थे।८४। समस्त असुरों के समुदायों के निहत हो जाने पर और वहाँ से पूर्णतया सबके भाग जाने पर देवगणों ने राम को आमन्त्रित किया था और वे सब फिर स्वर्गलोक को चले गये थे।८५। राम भी दैत्यों का पूर्णतया निहनन करके सब देवों की अनुज्ञा प्राप्त करके तपश्चर्या में आसक्त मन वाले होते हुए अपने आश्रम में प्राप्त हो गये थे।८६। उस महामति राम ने भगवान् शम्भु की मृगों के हनन करने वाले व्याध की ही प्रतिमूर्ति बनाकर उस वशी ने उसी आश्रम में बहुत ही भक्ति के भाव से उसकी पूजा की थी।८७। पूजन पुष्प-गन्ध-सुन्दर नैवेद्य-अभिनन्दन और स्तोत्रों के द्वारा विधि पूर्वक किया गया था और परमाधिक प्रीति की प्राप्ति का थी।८८।

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॥ परशुराम द्वारा द्विज-सुत रक्षण ॥

वसिष्ठ उवाच ततस्तद्भक्तियोगेन स प्रीतात्मा जगत्पतिः ।
प्रत्यक्षमगमत्तस्य सर्वैः सह मरुद्गणैः ॥१
तं दृष्ट्वा देवदेवेशं त्रिनेत्रं चंद्रशेखरम् ।
वृषैवाहनं शम्भुं भूतकोटिसमन्वितम् ॥२
ससंभ्रमं समुत्थाय हर्षेणाकुललोचनः ।

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