भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१७० । [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रणाममकरोद्भक्तया शर्वाय भुवि भार्गवः ॥३ उत्थायोत्थाय देवेशं प्रणम्य शिरसासकृत् । कृतांजलिपुटो रामस्तुष्टाव च जगत्पतिम् ॥४ राम उवाच-नमस्ते देवदेवेश नमस्ते परमेश्वर । नमस्ते जगतो नाथ नमस्ते त्रिपुरान्तक ॥५ नमस्ते सकलाध्यक्ष नमस्ते भक्तवत्सल । नमस्ते सर्वभूतेश नमस्ते वृषभध्वज ॥६ नमस्ते सकलाधीश नमस्ते करुणाकर । नमस्ते सकलावास नमस्ते नीललोहि ॥७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—इसके अनन्तर उसकी भक्ति भाव से प्रसन्न आत्मा वाले जगत् के स्वामी समस्त मरुद्गणों के सहित उसके समक्ष में प्रत्यक्ष रूप में हो गये थे ।१। तीन नेत्रों के धारण करने वाले चन्द्रशेखर और वृषभेन्द्र के वाहन वाले और करोड़ों भूतगणों से समन्वित देवों के भी देवेश्वर भगवान् शम्भु का राम ने दर्शन किया था ।२। शम्भु का दर्शन प्राप्त होते ही अत्यन्त हर्ष से समाकुलित लोचनों वाले राम ने सम्भ्रम के साथ उठकर (उस भार्गव ने) भूमि में पड़कर भक्तिभाव से भगवान् शर्व के लिए प्रणाम किया था।३। बारम्बार उठ उठकर शिर के बल से अनेक बार प्रणाम करके उन जगत् के स्वामी देवेश्वर को हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की थी ।४। राम ने कहा—हे परमेश्वर ! आप तो देवों के भी देव हैं। आपकी सेवा में मेरा बार-बार प्रणिपात है। आप तो जगत् के नाथ हैं। हे त्रिपुरासुर के हनन करने वाले ! आपके लिए मेरा बारम्बार प्रणाम है ।५। हे भक्तों पर प्यार करने वाले ! आप तो इस सम्पूर्ण विश्व के अध्यक्ष हैं। आपकी सेवा में मेरा अनेक बार प्रणाम स्वीकृत होवे । हे सब भूतों के स्वामिन् ! हे वृषभध्वज ! आपके लिए मेरा प्रणाम है ।६। हे करुणानिधि ! आप तो सबके अधीश हैं। हे नील लोहित ! आप सबमें निवास करने वाले हैं। आपकी चरण-सेवा में मेरा बारम्बार प्रणिपात स्वीकार होवे ।७।

नमः सकलदेवारिगणनाशाय शूलिने । कपालिने नमस्तुभ्यं सर्वलोकैकपालिने ॥८