भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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[शैवास्त्र की प्राप्ति ] [ १५५

निरूपण कर लीजिए। मैं तो सब प्रकार से मित्र आदि के भरण पोषण के ही कार्य में निरत रहा करता हूँ ।७७।

सत्यज्य पितरं वृद्धं विनिहत्य च मातरम् । भूत्वा तु धार्मिकस्त्वं तु तपश्चर्तुंमिहागतः ॥७८ ये तु मूलविदस्तेषां विस्पष्टं यत्र दर्शनम् । यथाजिह्मं भवेन्नात्र वचसापि समीहितुम् ॥७९ अहं तु सम्यग्जानामि तव वृत्तमशेषतः । तस्मादलं ते तपसा निष्फलेन भृगूद्वह ॥८० सुखमिच्छसि चेत्त्यक्त्वा कायक्लेशशंकरं तपः । याहि राम त्वमन्यत्र यत्र वा न विदुर्जनाः ॥८१

अब अपने कर्मों की ओर दृष्टिपात करिए। आपने अपने परम वृद्ध पिता का परित्याग कर दिया है और अपनी आपको जन्म देकर अपने स्तनों के दुग्ध से पोषण करने वाली माता का विहनन कर दिया है। यह बुरे से बुरा कर्म करके भी आप परम धार्मिक बनकर तपश्चर्या करने के लिए यहाँ पर समागत हो गये हैं ।७८। जो लोग उनके मूल के ज्ञाता हैं उनको विस्पष्ट दर्शन होता है। यह जिह्वा से कहकर वचनों के द्वारा समीहित करने का विषय यहाँ पर नहीं है ।७९। मैं तो आपका सम्पूर्ण आचरण भली भाँति जानता हूँ और मुझे पूर्ण उसका ज्ञान है। हे भृगूद्वह ! इस कारण से यह आपका तप निष्फल है। इसे व्यर्थ मत करो ।८०। भाई अपना सुख चाहते हो तो इस काया को क्लेशित करने वाले तप का त्याग कर दीजिए। हे राम ! अब आप किसी भी अन्य स्थान में चले जाइए जहाँ पर कि कोई भी मनुष्य आपको न जान सकें ।७१।


॥ शैवास्त्र की प्राप्ति ॥

वसिष्ठ उवाच—इत्युक्तस्तेन भूपाल रामो मतिमतां वरः । निरूप्य मनसा भूयस्तमुवाचाभिविस्मितम् ॥१ राम उवाच—कस्त्वं ब्रूहि महाभाग न वै प्राकृतपूरुषः । इन्द्रस्येवानुभावेन वपुरालक्ष्यते तव ॥२